HC में मेनका गांधी की अपील निरस्त, 51 साल पुरानी पुश्तैनी जमीन की जंग खत्म
Sanjay Dhiman | Jul 31, 2026, 23:35 IST
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला की 522 एकड़ पुश्तैनी जमीन मामले में अपील खारिज कर दी। कोर्ट के फैसले के बाद वीएम सिंह के नाम संपत्ति के नामांतरण का रास्ता साफ हो गया।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वरिष्ठ राजनेता मेनका गांधी और उनकी बहन अंबिका शुक्ला की अपील खारिज कर दी है। यह मामला भोपाल की करीब 522 एकड़ पुश्तैनी जमीन से जुड़ा हुआ था। कोर्ट के फैसले के बाद अब वीएम सिंह के नाम संपत्ति के राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण का रास्ता साफ हो गया है।
इस मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की युगलपीठ ने की। इसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल शामिल थे। कोर्ट ने दोनों रिट अपीलों को निरस्त करते हुए कहा कि पुराने पारिवारिक समझौते के आधार पर नामांतरण की प्रक्रिया में कोई कानूनी गलती नहीं हुई है।
यह पूरा विवाद साल 1975 से शुरू हुआ था। उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में परिवार की संपत्ति के बंटवारे को लेकर मुकदमा दाखिल किया गया था। मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।
बाद में परिवार के सदस्यों के बीच समझौता हुआ था। इसी समझौते के आधार पर 25 अगस्त 1993 को दिल्ली हाई कोर्ट ने डिक्री जारी की थी। इस फैसले को बाद में चुनौती भी दी गई थी।
हालांकि, साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की समझौता डिक्री को बरकरार रखा था। इसके बाद भी भोपाल की संपत्ति के राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने को लेकर विवाद बना रहा।
मामले में वीएम सिंह ने साल 2020 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। उन्होंने मांग की थी कि दिल्ली हाई कोर्ट की समझौता डिक्री के आधार पर भोपाल की संपत्ति का नामांतरण किया जाए।
इसके बाद तहसील स्तर पर नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इस कार्रवाई पर मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला ने आपत्ति दर्ज कराई।
उनका कहना था कि नामांतरण की कार्रवाई में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि वे परिवार के मूल सदस्यों की कानूनी वारिस हैं और उन्हें सुनवाई का पूरा मौका मिलना चाहिए था।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पारिवारिक समझौते और पुराने न्यायिक फैसलों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि समझौता डिक्री के बाद संबंधित संपत्ति को लेकर अपीलकर्ताओं के अधिकार समाप्त हो चुके थे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नामांतरण प्रक्रिया में उन्हें जरूरी पक्षकार नहीं माना जा सकता था। इसलिए तहसीलदार की कार्रवाई में कोई कानूनी खामी नहीं मिली।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना मालिकाना हक तय करने का अंतिम आधार नहीं होता। नामांतरण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जो उपलब्ध दस्तावेजों और अदालत के फैसलों के आधार पर की जाती है।
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 32 को लेकर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत तहसीलदार को अपने पुराने नामांतरण आदेश की मनमाने तरीके से समीक्षा करने की शक्ति नहीं मिलती।
हालांकि, अगर कोई नया तथ्य या नया आधार सामने आता है तो धारा 109 के तहत नया नामांतरण आवेदन किया जा सकता है।
कोर्ट ने वीएम सिंह की ओर से दिए गए आवेदन को इसी प्रक्रिया के तहत सही माना। अदालत ने तहसीलदार के आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं पाई।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद भोपाल की बहुचर्चित पुश्तैनी जमीन विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। करीब पांच दशक तक चले इस मामले में अब राजस्व रिकॉर्ड में वीएम सिंह के नाम दर्ज होने का रास्ता साफ हो गया है।
यह फैसला केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं है। यह मामला बताता है कि पारिवारिक संपत्ति विवादों में समझौता डिक्री और अदालत के पुराने फैसलों का कितना महत्व होता है।
मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला की ओर से दायर अपील खारिज होने के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार आगे बढ़ेगी।
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इस मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की युगलपीठ ने की। इसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल शामिल थे। कोर्ट ने दोनों रिट अपीलों को निरस्त करते हुए कहा कि पुराने पारिवारिक समझौते के आधार पर नामांतरण की प्रक्रिया में कोई कानूनी गलती नहीं हुई है।
1975 से चल रहा था जमीन का विवाद
बाद में परिवार के सदस्यों के बीच समझौता हुआ था। इसी समझौते के आधार पर 25 अगस्त 1993 को दिल्ली हाई कोर्ट ने डिक्री जारी की थी। इस फैसले को बाद में चुनौती भी दी गई थी।
हालांकि, साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की समझौता डिक्री को बरकरार रखा था। इसके बाद भी भोपाल की संपत्ति के राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने को लेकर विवाद बना रहा।
मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला ने जताई थी आपत्ति
इसके बाद तहसील स्तर पर नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इस कार्रवाई पर मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला ने आपत्ति दर्ज कराई।
उनका कहना था कि नामांतरण की कार्रवाई में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि वे परिवार के मूल सदस्यों की कानूनी वारिस हैं और उन्हें सुनवाई का पूरा मौका मिलना चाहिए था।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने यह भी कहा कि नामांतरण प्रक्रिया में उन्हें जरूरी पक्षकार नहीं माना जा सकता था। इसलिए तहसीलदार की कार्रवाई में कोई कानूनी खामी नहीं मिली।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना मालिकाना हक तय करने का अंतिम आधार नहीं होता। नामांतरण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जो उपलब्ध दस्तावेजों और अदालत के फैसलों के आधार पर की जाती है।
MP Land Revenue Code की धारा 32 पर भी कोर्ट की टिप्पणी
हालांकि, अगर कोई नया तथ्य या नया आधार सामने आता है तो धारा 109 के तहत नया नामांतरण आवेदन किया जा सकता है।
कोर्ट ने वीएम सिंह की ओर से दिए गए आवेदन को इसी प्रक्रिया के तहत सही माना। अदालत ने तहसीलदार के आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं पाई।
51 साल पुराने विवाद का हुआ अंत
यह फैसला केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं है। यह मामला बताता है कि पारिवारिक संपत्ति विवादों में समझौता डिक्री और अदालत के पुराने फैसलों का कितना महत्व होता है।
मेनका गांधी और अंबिका शुक्ला की ओर से दायर अपील खारिज होने के बाद अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार आगे बढ़ेगी।
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