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Photograph: (the sootr)
News In Short
- अमृत मिशन की राशि जल-सीवेज की बजाय बस सेवा पर कर दी खर्च
- घाटा भरने के नाम पर निजी ट्रांसपोर्टरों को भारी सब्सिडी
- बसें कागजों पर चलीं, कई रूट पर संचालन नहीं, बसें बेचकर मुनाफा
- निगरानी फेल, जुर्माने का अधिकार होते हुए भी कार्रवाई नहीं।
- एक कंपनी को लाभ, इंदौर-भोपाल में चार्टर्ड बस का सबसे ज्यादा अनुबंध।
NEWS IN DETAIL
BHOPAL.मध्यप्रदेश में शहरी नागरिकों को साफ पेयजल और मजबूत सीवेज व्यवस्था उपलब्ध करान के लिए शुरू हुआ अमृत मिशन अपनी राह से भटक गया। मिशन की करोड़ों रुपए की राशि सूत्र परिवहन सेवा के नाम पर निजी बस कारोबारियों को बांट दी। नतीजा यह हुआ कि कुछ ट्रांसपोर्टर मालामाल हो गए।
इसके उलट शहरों में रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते रहे। इंदौर का भागीरथपुरा कांड इसी व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गया। भागीरथपुरा में पेयजल लाइन में पानी और सीवेज साथ बहता रहा और 24 लोगों की जान चली गई।
नियमों के विपरीत किया प्रयोग
देशभर के 500 शहरों में लागू अमृत मिशन (पहला चरण) का मकसद जलापूर्ति, सीवेज सुधार, हरियाली बढ़ाना और प्रदूषण घटाने के लिए गैर-मोटर परिवहन को बढ़ावा देना था। लेकिन, मध्यप्रदेश में इस मिशन के भीतर ऐसा प्रयोग कर दिया गया, जिसका न नियमों में उल्लेख था और न ही मूल उद्देश्यों से कोई सीधा संबंध।
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ऐसे हुई ‘सूत्र परिवहन’ की एंट्री
बताया जाता है कि नगरीय प्रशासन विभाग ने अमृत मिशन में सूत्र परिवहन सेवा जोड़ने का ड्राफ्ट केंद्र सरकार को भेजा था। इसे ‘हब एंड स्पोक मॉडल’ नाम दिया गया। केंद्रीय मंत्रालय की अपेक्स समिति से मंजूरी मिलते ही योजना प्रदेश के 20 शहरों में लागू कर दी गई। यहीं से मिशन का फोकस पानी-सीवेज से हटकर बस संचालन पर आ गया। यानी प्रदेश में सूत्र परिवहन की एंट्री हो गई।
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असल खेल: 40% सब्सिडी, नाम दिया वीजीएफ
सूत्रों के मुताबिक, इस सूत्र परिवहन योजना का असली आकर्षण था 40 प्रतिशत वायबिलिटी गैप फंड (VGF)। यानी बस खरीद और संचालन में होने वाले घाटे की भरपाई सरकार करेगी। इसके लिए अलग-अलग कंपनियां बनाकर ट्रांसपोर्टरों से अनुबंध किए गए।
वीजीएफ शब्द को शॉर्ट फॉर्म में इतना गोपनीय रखा गया कि आमतौर पर अनुबंध पढ़ने वाला भी सब्सिडी की पूरी तस्वीर न समझ पाए। अनुबंध के अनुसार बस की लागत का 40% वीजीएफ चार समान किस्तों में मिलना था। हर दो साल में 25% और वह भी तभी, जब बसें तय रूट पर चल रही हों। लेकिन हकीकत इससे उलट निकली।
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बसें चलीं कागजों पर, मुनाफा जमीन पर
जिन रूटों पर बसें चलनी थीं, उनमें से कई पर बसें कभी चली ही नहीं। कई जगह कुछ महीने संचालन के बाद बसें खड़ी कर दी गईं। जैसे ही वीजीएफ की रकम हाथ आई, कई ट्रांसपोर्टरों ने बसें लागत से ज्यादा कीमत पर बेच दीं। तय रूट पर बस न चलाने पर परिवहन विभाग को 1500 सौ रुपए प्रतिदिन जुर्माना लगाने का अधिकार था, लेकिन अफसरों ने आंखें मूंदे रखीं।
एक कंपनी, सबसे ज्यादा फायदा
सूत्र परिवहन सेवा अंततः 8 नगरीय निकायों तक सिमट गई। इंदौर और भोपाल में अहमदाबाद की चार्टर्ड स्पीड प्राइवेट लिमिटेड सबसे बड़ी लाभार्थी बनकर उभरी। इंदौर की एआईसीटीएसएल में 163 और भोपाल की सिटी लिंक के तहत इसी कंपनी की 58 बसें अनुबंधित हुईं।
विज्ञापन और पास से भी कमाई
वीजीएफ के अलावा ट्रांसपोर्टरों को बसों पर विज्ञापन और बस पास से कमाई की खुली छूट मिली। इंदौर में अकेले विज्ञापन से 5.36 करोड़ और बस पास से करीब 90 करोड़ से ज्यादा की कमाई हुई, जिसमें 90% हिस्सा निजी कंपनी के खाते में गया। भोपाल में भी विज्ञापन, टिकट शेयर और स्मार्ट पास से करोड़ों की आमदनी दर्ज की गई।
सवाल उठे तो परमिट सरेंडर
सूत्र परिवहन और टैक्स वसूली को लेकर विधानसभा में सवाल उठाए गए। इसके बाद कई ट्रांसपोर्टरों ने आनन-फानन में अपने परमिट सरेंडर कर दिए, जिससे टैक्स और जवाबदेही से बचा जा सके।
अफसर भी असमंजस में
नगरीय प्रशासन और परिवहन विभाग के अधिकारी खुद जिम्मेदारी से बचते दिखे। नगरीय आवास एवं विकास विभाग के उप संचालक भविष्य खोबरागढ़े ने पहले दावा किया कि मिशन में इसका प्रावधान था। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि इसका फैैसला अपेक्स कमेटी ने लिया था। बसों के संचालन में गड़बड़ी को लेकर उन्होंने कहा कि इसकी निगरानी का जिम्मा परिवहन विभाग के पास है। वहीं,परिवहन आयुक्त विवेक शर्मा ने कहा कि सूत्र सेवा वह नहीं देखते। इस बारे में विभाग के अन्य अधिकारियों से बात की जाए।
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उप्र सरकार ने न शेयर दिया, न ठेका
सूत्रों के अनुसार, अमृत मिशन के तहत सूत्र परिवहन सेवा जैसा मॉडल उत्तर प्रदेश में लागू करने का प्रस्ताव भी रखा गया था। हालांकि तत्कालीन मायावती सरकार ने इसमें निजी कंपनियों की भागीदारी और सब्सिडी आधारित ढांचे को साफ तौर पर खारिज कर दिया।
राज्य सरकार ने शहरी परिवहन सेवा तो शुरू की, लेकिन पूरी जिम्मेदारी मध्यप्रदेश परिवहन निगम को ही सौंपी। खास बात यह रही कि बसों की खरीदी में किसी निजी कंपनी को न तो शेयर दिया गया और न ही कोई ठेका, बल्कि राज्यांश तक वहन नहीं किया गया, जिससे मॉडल पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहा।
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अमृत मिशन: सूत्र सेवा सब्सिडी और आय का विवरण
| विवरण / शहर | बसों की संख्या | वीजीएफ (सब्सिडी) / आय का विवरण |
| कुल लाभान्वित बसें | 517 | 268 करोड़ रुपए (कुल वीजीएफ राशि) |
| इंदौर | 310 | विज्ञापन आय: 5.36 करोड़ रुपए, बस पास आय:90 करोड़ रुपए |
| भोपाल | 153 | - |
| देवास | 38 | - |
| उज्जैन | 10 | - |
| खंडवा | 8 | - |
| बुरहानपुर | 8 | - |
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