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NEWS IN SHORT
- मेडिकल शिक्षकों की भर्ती में Higher Qualification तय करना संवैधानिक रूप से सही।
- MCI की योग्यता केवल न्यूनतम मानक, उससे ऊपर जाना प्रतिबंधित नहीं।
- चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद याचिका दायर करने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी।
- अस्सिटेंट प्रोफेसर्स को अंतरिम रूप से चयन प्रक्रिया में शामिल करने से इंकार।
- अगली सुनवाई के लिए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी।
NEWS IN DETAIL
क्या है पूरा मामला
भोपाल निवासी डॉ. सविता राठौर सहित 12 अन्य सहायक प्राध्यापकों ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका (WP No. 1963 of 2026) में राज्य सरकार द्वारा मेडिकल शिक्षकों की भर्ती के लिए निर्धारित की गई उच्च योग्यता (Higher Qualification) को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य सरकार ने भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) द्वारा निर्धारित मानकों से अधिक योग्यता तय कर दी है। इससे कई योग्य उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो रहे हैं।
हायर क्वालिफिकेशन तय करने का विरोध
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता हैरी बमोरिया ने अदालत के समक्ष दलील दी कि MCI द्वारा निर्धारित योग्यता पूरे देश में मेडिकल शिक्षकों की भर्ती के लिए एक समान और बाध्यकारी मानक है। उनका कहना था कि राज्य सरकार को इससे अधिक योग्यता तय करने का अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार उच्च योग्यता से अनुभवी और सेवा अवधि रखने वाले शिक्षक चयन से वंचित हो जाएंगे। यह प्रक्रिया न्यायसंगत नहीं है।
MCI की न्यूनतम अर्हता नहीं है अंतिम सीमा
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता नीलेश यादव ने याचिका का जोरदार विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि MCI द्वारा निर्धारित योग्यता केवल न्यूनतम अहर्ता है, न कि अंतिम सीमा। राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और बेहतर फैकल्टी सुनिश्चित करने के लिए उच्च मानक तय करे।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी नियम में यह नहीं कहा गया है कि न्यूनतम योग्यता से ऊपर जाना प्रतिबंधित है।
योग्यता बढ़ाने का मेडिकल बोर्ड को अधिकार
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया। उन्होंने न्यूनतम योग्यता विनियम, 1988 का विस्तार से उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह पूरी तरह स्पष्ट है। भर्ती करने वाला प्राधिकरण न्यूनतम योग्यता से ऊपर जा सकता है। वह Higher Qualification निर्धारित कर सकता है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में राज्य सरकार ने योग्यता को कम नहीं किया है, बल्कि मेडिकल शिक्षा के स्तर को ऊंचा करने के लिए मानक बढ़ाए हैं, जो कानूनन गलत नहीं है।
देरी से अदालत आने पर सवाल
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की समय-सीमा को लेकर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि उच्च योग्यता से संबंधित अधिसूचना 30 जून 2025 को ही जारी कर दी गई थी। इसके बाद भर्ती विज्ञापन 10 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित हुआ।
इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया शुरू हो जाने के काफी बाद 15 जनवरी 2026 को अदालत का रुख किया। कोर्ट ने माना कि इतनी देरी से याचिका दायर करना याचिकाकर्ताओं के पक्ष को कमजोर करता है।
अंतरिम राहत देने से स्पष्ट इनकार
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को चयन प्रक्रिया में अंतरिम रूप से शामिल करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे उम्मीदवारों को अनुमति दी जाती है, तो यह उन अन्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने विज्ञापन में तय उच्च योग्यता की शर्तों के कारण आवेदन ही नहीं किया। अदालत के अनुसार चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।
प्रतिवादियों को दिया पक्ष रखने का मौका
कोर्ट ने सभी प्रतिवादी को नोटिस जारी कर दिए हैं, जिन्हें शासन के अधिवक्ता ने स्वीकार कर लिया है। वहीं प्रतिवादी क्रमांक 3 नेशनल मेडिकल काउंसिल के लिए अलग से नोटिस जारी किया गया है। मामले में सभी पक्षों से जवाब 23 फरवरी 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में पेश किए जाने हैं। इसके बाद याचिका पर आगे की सुनवाई होगी।
यह फैसला मेडिकल शिक्षकों की भर्ती और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता को मजबूत करेगा। यह मानकों को लेकर राज्य सरकार के अधिकारों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
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