खत्म होगा 30 साल पुराना विवाद! अब एमपी विधानसभा में PSC से होंगी अफसरों की भर्तियां

Aman Vaishnav | Aug 21, 2026, 07:56 IST
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एमपी विधानसभा में PSC से होगी अफसरों की भर्तियां
एमपी विधानसभा में PSC से होगी अफसरों की भर्तियां

मध्य प्रदेश विधानसभा में पिछले तीन दशकों से चल रही बैकडोर एंट्री को अब पूरी तरह बंद करने की तैयारी चल रही है। अब अवर सचिव उप सचिव और अतिरिक्त सचिव जैसे बड़े पदों पर भर्तियां MPPSC के जरिए होंगी।

समझें क्या है पूरा मामला...

मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय में तीन दशक से चली आ रही बैकडोर भर्तियों पर अब लगाम लगने जा रही है। अवर सचिव, उप सचिव और अतिरिक्त सचिव जैसे अहम पदों पर नियुक्तियां अब मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के जरिए कराने पर विचार हो रहा है।

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने खुद इस बदलाव की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि इससे प्रशासनिक दक्षता और निष्पक्षता बनी रहेगी। साल 1993 से अब तक इन नियुक्तियों को लेकर लगातार विवाद उठते रहे हैं।

तीन दशक पुराना विवाद

विधानसभा सचिवालय में भर्तियों का यह मसला कोई नया नहीं है। बाबू से लेकर अपर सचिव और सुरक्षा अधिकारी तक के पदों पर हुई नियुक्तियां हमेशा सवालों में रही है।

कई बार आरोप लगे कि नियमों को दरकिनार कर अपनों को फायदा पहुंचाया गया। डेप्युटेशन पर लाकर पद देना, बिना जरूरी योग्यता के प्रमोशन देना और क्षेत्रवाद के आरोप भी समय-समय पर चर्चा में आते रहे। इन सबने सचिवालय की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल खड़े किए।

अब पीएससी से होगी भर्ती

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक अब प्रमुख भर्तियां पीएससी के माध्यम से कराने पर गंभीरता से विचार चल रहा है। इसका मकसद है कि योग्य और कुशल अभ्यर्थियों का ही चयन हो।

बता दें कि अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो सचिवालय में नियुक्तियों की पूरी प्रक्रिया बदल जाएगी। इससे मनमानी नियुक्तियों पर स्वाभाविक रूप से लगाम लगेगी।

अध्यक्षों के कार्यकाल में उठे विवाद

अलग-अलग अध्यक्षों के कार्यकाल में अलग तरह के आरोप सामने आए हैं। श्रीनिवास तिवारी के 1993 से 2003 तक के कार्यकाल में सबसे ज्यादा विवाद हुए।

बताया जाता है कि बिना न्यूनतम योग्यता और टाइपिंग परीक्षा पास किए ही एक कर्मचारी को कुछ महीनों में बाबू से अंडर सेक्रेटरी बना दिया गया था।

इसी दौर में सब-इंजीनियर और वेयरहाउसिंग विभाग से आए दो कर्मचारियों को सीधे सहायक यंत्री के पद पर नियुक्त किया गया।

अस्थायी नियुक्ति और डेप्युटेशन के जरिए 25 से ज्यादा लोगों के एडजस्टमेंट का मामला जांच के बाद एफआईआर और बर्खास्तगी तक पहुंचा था।

भर्ती में नियमों की अनदेखी के आरोप

ईश्वरदास रोहाणी के कार्यकाल में स्टेनो और सुरक्षा गार्डों की भर्ती में नियमों की अनदेखी के आरोप लगे। डॉ. सीतासरन शर्मा के समय सीधी भर्ती की प्रक्रिया कानूनी अड़चनों में उलझी रही।

गिरीश गौतम के कार्यकाल में रिश्तेदारों और करीबियों को नौकरी देने के आरोप लगे। इनमें से एक नियुक्ति और प्रमोशन का मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया था।

दैनिक वेतनभोगियों को भी मिला फायदा

रिपोर्ट के मुताबिक सचिवालय में ज्यादातर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को शुरुआत में सिर्फ 6-6 महीने के लिए रखा गया। बाद में इन्हें स्थायी कर दिया गया।

इनमें से कई कर्मचारी आगे चलकर प्रमोशन पाते हुए अतिरिक्त सचिव जैसे पदों तक पहुंच गए। यह प्रक्रिया भी लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है।

अब बदलाव की उम्मीद

तीन दशक तक चले इन विवादों के बाद अब विधानसभा सचिवालय अपनी भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। पीएससी के जरिए भर्ती होने से चयन प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

इससे योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों का चयन सुनिश्चित हो सकेगा। हालांकि यह प्रस्ताव अभी विचाराधीन है, इसलिए इसके लागू होने की समयसीमा साफ नहीं है।

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