मध्यप्रदेश की चिट्ठी: बेमकसद हंगामा... इसका फायदा क्या है
The Sootr | Feb 21, 2026, 14:16 IST
mp budget 2026 assembly chaos religious funding freebies analysis
मध्यप्रदेश विधानसभा का बजट सत्र हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। जहां एक ओर विपक्ष सदन के भीतर शोर-शराबे को रणनीति बना चुका है, वहीं मोहन सरकार ने बजट में धार्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को केंद्र में रखा है।
BHOPAL. यह मध्यप्रदेश विधानसभा में अब एक परंपरा का रूप ले चुका है। हर रोज हंगामा और हर दिन केवल मीडिया के लिए विरोध का ड्रामा। यह सत्र बजट सत्र है। इसका मकसद जाहिर है। मध्यप्रदेश सरकार के प्रस्तुत बजट पर सार्थक चर्चा के तौर पर उसकी आलोचना या तारीफ जनता के सामने आना चाहिए।
वैसे भी पिछले दो दशक में मध्यप्रदेश विधानसभा की बैठकों की संख्या तो कम होती ही रही है, अब उसमें सार्थक बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश भी खत्म होती जा रही है। सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब सदन में शब्दों से नहीं बल्कि सदन के बाहर नारेबाजी और प्रतीकात्मक विरोध की ड्रामेबाजी में तब्दील हो गया है।
सदन से सड़क तक कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ प्रदर्शन किए। महिला कांग्रेस ने हाथ ठेले पर स्कूटी और गैस सिलेंडर रखकर बढ़ती महंगाई और बजट में राहत ना मिलने के विरोध में प्रदर्शन किया। सदन में भी विपक्ष ने कार्यवाही शुरू होने के साथ ही राज्यपाल के अभिभाषण से लेकर हर दिन सदन में हंगामा किया।
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल कांड और छिंदवाड़ा के कफ सिरप मामले को लेकर सरकार को घेरा गया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और राजेंद्र शुक्ला के इस्तीफे की मांग पर सदन में अवरोध पैदा किए।
मामला एक दूसरे की औकात और तू-तू, मैं-मैं तक चला गया। कांग्रेस ने आरोपों की झड़ी लगाते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
कांग्रेस के इस हंगामे पर सत्ता पक्ष बीजेपी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। सत्ता पक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि नैतिकता की दुहाई देने वाली कांग्रेस को उसकी सत्ता के इतिहास को याद दिलाया।
बीजेपी ने भोपाल गैस त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि जब देश की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई, तब किसी मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। ऐसे में कांग्रेस को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है। जाहिर है सत्ता और विरोधी खेमे का रवैया अब, तेरी मेरी किसकी कमीज उजली के खेल में उलझ गया है।
बड़ा सवाल यही है। जब कांग्रेस सड़क पर उतरकर जनता के बीच प्रदर्शन कर रही है, तो फिर सदन के भीतर हंगामा क्यों? क्या विपक्ष अपनी बात तथ्यों और बहस के जरिए रखना नहीं चाहता? क्या सदन की कार्यवाही बाधित करना ही अब रणनीति बन चुका है।
लोकतंत्र में सड़क और सदन दोनों के अपने-अपने मंच हैं। लेकिन जब सड़क की लड़ाई सदन में शोर-शराबे में बदल जाए, तो क्या इससे जनता के मुद्दों का समाधान निकलता है?
मध्यप्रदेश की सियासत में धर्म और संस्कृति अब सिर्फ मंच की बात नहीं है। बल्कि डॉ. मोहन यादव सरकार के बजट की प्राथमिकता बन चुकी है। मोहन सरकार के तीसरे बजट में धर्म और संस्कृति विभाग के लिए दो हजार 55 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो सरकार के पहले बजट 2024-25 में धर्म-संस्कृति से जुड़े मदों में करीब एक हजार 81 करोड़ रुपए का प्रावधान था तो दूसरे बजट 2025-26 में ये बढ़कर लगभग एक हजार 610 करोड़ रुपए तक पहुंचा।
अब तीसरे बजट 2026-27 में ये राशि बढ़कर दो हजार 55 करोड़ रुपए हो गई है। यानी तीन साल में लगभग एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की बढ़ोतरी।
यानी इस विभाग का बजट तीन साल में ही दोगुना हो गया। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये सिर्फ सांस्कृतिक संरक्षण या पर्यटन को बढ़ावा देना है। या फिर इसके पीछे की रणनीति कुछ और ही है।
बीजेपी लंबे समय से हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी वैचारिक ताकत मानती रही है। अब यही झलक बजट दस्तावेजों में भी साफ दिखाई दे रही है। बजट की ये बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। सरकार तो पहले से ही महाकाल लोक के विस्तार, ओंकारेश्वर लोक परियोजना और धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर को प्राथमिकता दे रही है।
राम वन गमन पथ परियोजना के विस्तार पर उसका फोकस है तो चित्रकूट और अमरकंटक जैसे आस्था केंद्रों को इस परियोजना से नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है। सिंहस्थ के लिए भी बजट में प्रावधान किया गया है।
मोहन सरकार भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों - विशेषकर उज्जैन और आसपास के धार्मिक स्थानों को भी पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी का हिंदुत्व एजेंडा अब बजट आवंटन में भी नजर आ रहा है। पिछले तीन बजट में धर्म-संस्कृति के लिए लगातार बढ़ता प्रावधान, एक वैचारिक संदेश भी माना जा रहा है। क्या ये धार्मिक पर्यटन के जरिए आर्थिक ताकत बढ़ाने की रणनीति है, या फिर सियासत में वैचारिक जमीन मजबूत करने की कोशिश?
मुफ्त की रेवड़ियों पर
चुनाव आते ही वोट बंटोरने के लिए योजनाओं के नाम पर सेल लग जाती है। अब आप भले ही इसे मुफ्त सुविधाएं कहें। रेवड़ी कहें या फ्रीबीज। राजनीतिक दल इन्हें कल्याणकारी योजना ही साबित करना चाहते हैं। सब इसे अपने फायदे के लिए लागू करने में कोई गुरेज नहीं करना चाहते।
एक तरह से यह वोट खरीदने की वैधानिक प्रक्रिया जैसा लगता है। सत्ता का रास्ता अब रेवड़ी पथ से ही होकर गुजर रहा है। अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई के दौरान इस पर सख्त टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा कि, अगर सरकार लोगों को सुबह से शाम तक फ्री खाना, गैस और बिजली देती रहेगी तो लोग काम क्यों करेंगे। ऐसे तो काम करने की आदत खत्म हो जाएगी। सरकार को रोजगार देने पर फोकस करना चाहिए।
सर्वोच्च अदालत की इस प्रतिक्रिया से एक रोज पहले ही मोहन सरकार का बजट भी आया। जिसमें लाड़ली बहन योजना के लिए सबसे ज्यादा प्रावधान किया गया है। ऐसे में बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ लाड़लियों के खाते में हर महीने देने वाली राशि में जाएगा।
याद हो तो इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने तो ये तक पूछा लिया था, क्या आप मुफ्त की योजनाएं लागू करके परजीवियों की जमात नहीं खड़ी कर रहे हैं? खैर जब वोट ही रेवड़ियों के नाम पर मिल रहा है तो फिर इसे बांटने में प्रतियोगिता तो होगी ही। पिछले कई चुनाव इसके उदाहरण हैं।
चुनाव-दर-चुनाव फ्री स्कीम्स बढ़ती जा रही हैं। लिहाजा राज्यों के बजट में भी इसकी झलक दिखने लगी है। शुरुआत मुफ्त चावल, गेहूं, बिजली, पानी, साइकिल, लैपटॉप, टीवी और साड़ी से हुई थी। और अब सीधे अकाउंट में नकद ट्रांसफर किए जा रहे हैं। वो बात और है कि, इससे लगातार राजकोष पर बोझ बढ़ता जा रहा है।
पहले बजट का बड़ा हिस्सा विकास के लिए होता था। तो अब वोट साधने और सरकार में बने रहने पर ये खर्च हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से कोई असर राजनीति दलों पर पड़ेगा इसकी उम्मीद कम ही है।
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सदन से सड़क तक कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ प्रदर्शन किए। महिला कांग्रेस ने हाथ ठेले पर स्कूटी और गैस सिलेंडर रखकर बढ़ती महंगाई और बजट में राहत ना मिलने के विरोध में प्रदर्शन किया। सदन में भी विपक्ष ने कार्यवाही शुरू होने के साथ ही राज्यपाल के अभिभाषण से लेकर हर दिन सदन में हंगामा किया।
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मामला एक दूसरे की औकात और तू-तू, मैं-मैं तक चला गया। कांग्रेस ने आरोपों की झड़ी लगाते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
कांग्रेस के इस हंगामे पर सत्ता पक्ष बीजेपी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। सत्ता पक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि नैतिकता की दुहाई देने वाली कांग्रेस को उसकी सत्ता के इतिहास को याद दिलाया।
बीजेपी ने भोपाल गैस त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि जब देश की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी हुई, तब किसी मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। ऐसे में कांग्रेस को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है। जाहिर है सत्ता और विरोधी खेमे का रवैया अब, तेरी मेरी किसकी कमीज उजली के खेल में उलझ गया है।
बड़ा सवाल यही है। जब कांग्रेस सड़क पर उतरकर जनता के बीच प्रदर्शन कर रही है, तो फिर सदन के भीतर हंगामा क्यों? क्या विपक्ष अपनी बात तथ्यों और बहस के जरिए रखना नहीं चाहता? क्या सदन की कार्यवाही बाधित करना ही अब रणनीति बन चुका है।
लोकतंत्र में सड़क और सदन दोनों के अपने-अपने मंच हैं। लेकिन जब सड़क की लड़ाई सदन में शोर-शराबे में बदल जाए, तो क्या इससे जनता के मुद्दों का समाधान निकलता है?
बीजेपी की रणनीति आखिर किस ओर?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो सरकार के पहले बजट 2024-25 में धर्म-संस्कृति से जुड़े मदों में करीब एक हजार 81 करोड़ रुपए का प्रावधान था तो दूसरे बजट 2025-26 में ये बढ़कर लगभग एक हजार 610 करोड़ रुपए तक पहुंचा।
अब तीसरे बजट 2026-27 में ये राशि बढ़कर दो हजार 55 करोड़ रुपए हो गई है। यानी तीन साल में लगभग एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की बढ़ोतरी।
यानी इस विभाग का बजट तीन साल में ही दोगुना हो गया। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये सिर्फ सांस्कृतिक संरक्षण या पर्यटन को बढ़ावा देना है। या फिर इसके पीछे की रणनीति कुछ और ही है।
बीजेपी लंबे समय से हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी वैचारिक ताकत मानती रही है। अब यही झलक बजट दस्तावेजों में भी साफ दिखाई दे रही है। बजट की ये बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। सरकार तो पहले से ही महाकाल लोक के विस्तार, ओंकारेश्वर लोक परियोजना और धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर को प्राथमिकता दे रही है।
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मोहन सरकार भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों - विशेषकर उज्जैन और आसपास के धार्मिक स्थानों को भी पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता से स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रही है।
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सर्वोच्च अदालत की इस प्रतिक्रिया से एक रोज पहले ही मोहन सरकार का बजट भी आया। जिसमें लाड़ली बहन योजना के लिए सबसे ज्यादा प्रावधान किया गया है। ऐसे में बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ लाड़लियों के खाते में हर महीने देने वाली राशि में जाएगा।
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पहले बजट का बड़ा हिस्सा विकास के लिए होता था। तो अब वोट साधने और सरकार में बने रहने पर ये खर्च हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से कोई असर राजनीति दलों पर पड़ेगा इसकी उम्मीद कम ही है।
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