26 साल पुराना पेंशन विवाद खत्म करने की तैयारी में MP सरकार, छत्तीसगढ़ से मांगी स्थायी सहमति
Amresh Kushwaha | Jun 16, 2026, 14:45 IST
पेंशन विवाद खत्म करने की तैयारी में MP सरकार
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच 26 साल पुराना पेंशनर्स की महंगाई राहत (DR) का विवाद अब खत्म होने की कगार पर है। एमपी सरकार ने छत्तीसगढ़ से स्थायी सहमति मांगी है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बंटवारे को 26 साल पूरे हो गए हैं।
- पेंशनरों की महंगाई राहत यानी डीआर का मामला अब भी सहमति में अटका है।
- हर बार डीआर बढ़ने पर मप्र को छत्तीसगढ़ की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है।
- एमपी वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ को स्थायी सहमति का प्रस्ताव भेजा है।
- अब मध्यप्रदेश को छत्तीसगढ़ कैबिनेट के फैसले का इंतजार है।
26 साल पुराना पेंशन विवाद अब भी जारी
जब भी महंगाई राहत बढ़ती है, मध्यप्रदेश के लाखों पेंशनर्स को छत्तीसगढ़ सरकार की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। यह प्रक्रिया हर बार महीनों की देरी का कारण बनती है। इस उलझन को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए मध्यप्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक पत्र लिखा है।
एमपी सरकार का रुख क्या है?
मध्य प्रदेश ने प्रस्ताव दिया है कि छत्तीसगढ़ इस मामले में एक बार स्थायी सहमति दे दे। इससे बार-बार के पत्राचार का सिलसिला हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। यह प्रस्ताव पेंशनर्स के हित में जल्द फैसला चाहने की मांग से जूड़ा है।
धारा-49 का हवाला, सहमति अनिवार्य नहीं
इस एक्ट के प्रावधानों में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि हर नई महंगाई राहत के लिए बार-बार आपसी सहमति लेना अनिवार्य होगा। यानी कानूनी रूप से यह शर्त जरूरी नहीं है, बल्कि यह एक परंपरा के तौर पर चली आ रही है।
कैसे बंटा था पेंशन का बोझ
यह बंटवारा दोनों राज्यों की सेवा अवधि के अनुपात के आधार पर तय किया गया था। इस फॉर्मूले के मुताबिक मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों अपने-अपने हिस्से का योगदान देते हैं। यानी पैसे का बंटवारा पहले से तय है, सिर्फ सहमति लेने की प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है।
राज्य खुद वहन करे अपना खर्च- एमपी सरकार
दोनों राज्यों के बीच वित्तीय अनुपात पहले से तय है। इसलिए मध्यप्रदेश का मानना है कि महंगाई राहत के लिए बार-बार सहमति लेने की पूरी प्रक्रिया खत्म होनी चाहिए। एमपी सरकार का यह भी तर्क है कि उसके पेंशनर्स के भुगतान के लिए छत्तीसगढ़ की मंजूरी जरूरी नहीं होनी चाहिए।
अब छत्तीसगढ़ की सहमति का इंतजार
इसके बाद मध्यप्रदेश अपने पेंशनर्स को वर्तमान कर्मचारियों के साथ ही तुरंत डीआर दे सकेगा। फिर हर 6 महीने में छत्तीसगढ़ से अनुमति मांगने की औपचारिकता से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। अब सबकी नजर छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले पर है।
विवाद की जड़ क्या है
परंपरा के अनुसार हर बार डीआर बढ़ाने से पहले दोनों राज्यों की सहमति ली जाती है। इसी वजह से छत्तीसगढ़ से मंजूरी आने में महीनों की देरी हो जाती है। मध्यप्रदेश का साफ स्टैंड है कि बंटवारा हो चुका है। साथ ही, अनुपात तय है, इसलिए बार-बार सहमति का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए।
यह खबर क्यों जरूरी है
FAQ
- मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच पेंशन विवाद की मुख्य वजह क्या है?
मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा-49 के तहत पेंशनर्स की वित्तीय देनदारी दोनों राज्यों के बीच सेवा अनुपात के आधार पर लगभग 75 और 25 प्रतिशत में बंटी है। परंपरा के तहत हर बार महंगाई राहत बढ़ाने से पहले दोनों राज्यों की आपसी सहमति ली जाती है। इस सहमति प्रक्रिया में देरी होने से मध्यप्रदेश के पेंशनर्स को समय पर लाभ नहीं मिल पाता।
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