OBC के 27% आरक्षण में सरकार, विपक्ष सभी भले साथ हो, लेकिन इसका हल निकले बिना कोई हल नहीं

मध्यप्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में जारी है। सरकार और विपक्ष ने एकजुट होकर इसे लागू करने का फैसला किया है, लेकिन इंदिरा साहनी केस में 50% आरक्षण की सीमा को पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियां साबित करनी होंगी।

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Sanjay Gupta
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27 percent reservation OBCs

Photograph: (thesootr)

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INDORE. सुप्रीम कोर्ट की 12 अगस्त को ओबीसी को मप्र में 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने के केस की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी थी कि- क्या सरकार 6 साल से सोई हुई थी, यह समस्या खुद आपके द्वारा पैदा की गई है, अंतरिम राहत नहीं देंगे, सीधे अंतिम सुनवाई और फैसला होगा।

इस टिप्पणी के बाद बीजेपी सरकार की भद पिटी और सीएम डॉ. मोहन यादव ने इसमें आगे बढ़ते हुए सर्वदलीय बैठक की। सभी के बीच सहमति बनी की 10 सितंबर को फिर अधिवक्ताओं की बैठक होगी और मिलकर इस लड़ाई को लड़ेंगे, 27 फीसदी OBC आरक्षण लागू कराया जाएगा। 

अब बड़ा सवाल जो सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है

लेकिन इस एकता तब तक बेमानी है, जब तक सरकार इस यज्ञ प्रश्न का जवाब नहीं ढूंढ  लेती है। वह सवाल है कि इंदिरा साहनी केस में तो अधिकतम 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय की हुई है, उसे कैसे क्रास कराएंगे।

इस केस में एक ही आधार पर इसमें छूट की गुंजाइश जब कुछ असामान्य स्थितियां हों, वैज्ञानिक तथ्य, आंकड़े हो। जून में जब इस मामले में जब 25 जून को सुनवाई हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ पूछा- फिर इंदिरा साहनी केस का क्या होगा।

वहीं जब 12 अगस्त को सुनवाई हुई और ओबीसी वेलफेयर कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता व कांग्रेस नेता अभिषेक मनु संघवी उपस्थित हुए तो उन्होंने दलील देते हुए कहा कि इंदिरा साहनी केस में अपवाद की स्थिति है और असाधारण आधार पर पर मप्र में 27 फीसदी आरक्षण लागू किया जा सकता है। बार-बार इस बात की दलीली ओबीसी वर्ग द्वारा दी जा रही है कि विधानसभा से यह आरक्षण का एक्ट पास है और इसे रोका नहीं जा सकता है। 

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पहले बताते हैं कि इंदिरा साहनी केस क्या है

साल 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिश के तहत ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू करने का आदेश हुआ। इस पर अधिवक्ता इंद्रा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया। इसमें 1992 में नौ जस्टिस की संवैधानिक बैंच ने 6-3 से आदेश पारित किया जिसे इंद्रा साहनी जजमेंट भी कहा जाता है।  

इसमें अहम आदेश था कि आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता है। केवल असाधारण परिस्थितियों में इसे क्रास किया जा सकता है। इसी केस में ओबीसी क्रीमीलेयर की अवधारण आई। इंद्रा साहनी जजमेंट 9 जस्टिस की बैंच का था, यानी इस मामले को पलटने के लिए 11 जस्टिस की बैंच की जरूरत होगी। लगातार आरक्षण बढ़ाने की मांग उठती रही है।

साल  2006 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(4A) और 16(4B) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करते हुए फिर 50% की सीमा को दोहराया। क्रीमी लेयर के नियम को भी बरकरार रखा। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य को यह साबित करना होगा कि आरक्षण क्यों जरूरी है।

राज्य को 'पिछड़ेपन', 'प्रतिनिधित्व की कमी' और 'प्रशासनिक दक्षता' के बारे में बताना होगा। कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य ऐसा नहीं कर पाता है, तो अनुच्छेद 16 में समानता का अधिकार खत्म हो जाएगा।

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EWS आरक्षण, 50% के नियम का अपवाद है

जाति आधारित आरक्षण से हटकर, केंद्र सरकार ने 2019 में संविधान (एक सौ तीसरा संशोधन) अधिनियम लाकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10% आरक्षण देने की बात कही थी। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

जनहित अभियान बनाम भारत संघ मामले (2022) में पांच जजों की बेंच ने 3:2 के बहुमत से इस कानून को सही ठहराया। इसका मतलब है कि 50% की सीमा टूट गई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संवैधानिक है।

तमिलनाड़ु ने ऐसे हासिल किया 69 फीसदी आरक्षण

वर्तमान में तमिलनाडु का 69% आरक्षण एक दूसरा अपवाद है। तमिलनाडु ने यह आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालकर हासिल किया है। नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 

इन राज्यों ने भी चाहा था 50 फीसदी से अधिक आरक्षण...

  1. बिहार : पटना उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार की उस अधिसूचना को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोटा 50% से बढ़ाकर 65% किया गया था। इसमें भी इंद्रा साहनी जजमेंट के तहत  50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण पर रोक की बात कही गई। 
  2. महाराष्ट्र: सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में महाराष्ट्र के 2018 के कानून को भी रद्द कर दिया था। इस कानून में मराठों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि इससे राज्य में कुल आरक्षण 50% से ज्यादा हो जाएगा। 
  3. राजस्थान: 17 मार्च 2015, जाट आरक्षण खत्म। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में राजस्थान सरकार के  जाटों को ओबीसी कोटे में आरक्षण देने के पिछली सरकार (यूपीए) के फैसले को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि जाट सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग नहीं हैं, आरक्षण का आधार सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक होना चाहिए।
  4. आंध्रप्रदेश: आंध्रा में मुस्लिम आरक्षण के लिए अलग से 5 फीसदी कोटा रखा गया। इसे आंध्रा हाईकोर्ट ने 2013 में रदद् किया। 

फिर इसका हल कैसे निकलेगा, तो यह है रास्ता

साल 2021 के एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में आरक्षण देने के लिए नियम बताए। कोर्ट ने कहा कि राज्यों को तीन काम करने होंगे-

  • पहला- एक आयोग बनाना होगा।
  • दूसरा- OBC के पिछड़ेपन के बारे में आंकड़े जुटाने होंगे।
  • तीसरा- यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी स्थानीय निकाय में कुल आरक्षण 50% से ज्यादा न हो।

कुल मिलाकर सभी फैक्ट रखते हुए ही असाधारण परिस्थिति में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण लागू कर सकते हैं। यह असाधारण परिस्थिति राज्य को साबित करना होगी। 

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मप्र के पास यह अधिकृत आंकड़े मौजूद है, इन्हें बनाना होगा आधार

मप्र द्वारा पिछड़े वर्ग की हालात जानने के लिए कमेटी बनाकर आंकड़े जुटाए गए थे। इन आंकड़ों के आधार पर मप्र सुप्रीम कोर्ट में बता सकती है कि यह असाधारण स्थिति है और ओबीसी वर्ग को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, इसलिए यह आरक्षण दिया जाना चाहिए। 

मप्र में यह है ओबीसी को लेकर आंकड़े

ओबीसी वेलफेयर एसोसिशएन द्वारा आंकड़े बताए गए हैं कि मप्र में ओबीसी आबादी 51 फीसदी है और नौकिरियों में 13.66 फीसदी ही प्रतानिधित्व है। हालांकि, मप्र शासन द्वारा बनाई गई कमेटी के रिपोर्ट के अनुसार  प्रदेश की कुल आबादी में सबसे ज्यादा 48% हिस्सेदारी ओबीसी की है और सरकारी नौकरियों में मौजूदगी महज 16.80% है।

वहीं, सामान्य वर्ग के 21.64%, एससी के 10.49%, और एसटी के 10.73% कर्मचारी-अधिकारी पदस्थ हैं।यह रिपोर्ट प्रदेश में ओबीसी की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का आकलन करने के लिए तैयार की गई थी।

यह रिपोर्ट डॉ. बीआर आंबेडकर यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल साइंस, महू की मदद से तैयार हुई, जिसमें 69 सरकारी विभागों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। 

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इतने पदों पर ओबीसी मौजूद

रिपोर्ट में था कि प्रदेश में ऑल इंडिया सर्विस, क्लास वन, क्लास टू, क्लास थ्री और क्लास फोर के कुल 1209321 स्वीकृत पदों में से महज 721412 पद ही भरे हैं। इन भरे गए पदों की बात करें तो 261666 (36.27%) पर सामान्य वर्ग तो 203144 (28.16%) पदों पर पिछड़ा वर्ग के अधिकारी-कर्मचारी हैं।

वहीं पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग द्वारा तैयार कराई गई रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में क्लास वन के पदों पर पिछड़ा वर्ग के अफसरों की पदस्थापना महज 9.5 फीसदी है, इन पदों पर सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व 64.08 % है। 

प्रदेश में क्लास वन के 16,846 पद स्वीकृत हैं, लेकिन नियुक्ति 7840 पदों पर ही है। इनमें से 5024 पदों पर सामान्य वर्ग तो 749 पदों पर पिछड़ा वर्ग के अधिकारियों की तैनाती है।

आल इंडिया सर्विस के प्रदेश में स्वीकृत पदों में भी हैं। कुल स्वीकृत 1258 पदों में से 625 पर ही तैनाती है। इनमें से 61.12 प्रतिशत पदों यानी 382 पर सामान्य वर्ग के अफसर हैं। जबकि ओबीसी प्रतिनिधत्व सिर्फ 13.76 फीसदी यानी 86 है।

मप्र में ओबीसी आरक्षण पर कब-क्या हुआ...

  • 8 मार्च 2019, कांग्रेस रकार ने अध्यादेश से 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण किया। हाईकोर्ट ने पीजी नीट में इसे लागू करने पर स्टे देते हुए 14 फीसदी ओबीसी की ही बात कही।
  • 14 अगस्त 2019 को विधानसभा में पास होकर कानून बना। एक्ट लागू हो गया। इसके बाद लगातार याचिकाएं जारी है, सौ से ज्यादा याचिकाएं चल रही है। 
  • 18 दिसंबर 2024 में 70 करीब याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर हो चुकी है। इसमें कुछ में ओबीसी आरक्षण का विरोध है तो कुछ इस एक्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं

उधर इस विवाद के चलते जब रिजल्ट होल्ड हुआ तो सितंबर 2022 में विधिक सलाह के आधार पर जीएडी ने पीएससी में 87-13 फीसदी का फार्मूला लागू करते हुए रिजल्ट जारी करना शुरू कर दिया, इसमें 13 फीसदी पद हर भर्ती के रोक दिए। यहां तक कि इसके बाद ही उत्तरपुस्तिका दिखाना भी बंद कर दिया और बाकी चयनित के अलावा अन्य के अंक बताना भी बंद हो गया।

इसी तरह का विवाद ईएसबी भर्ती में उठा तो जनवरी 2023 में वहां भी यही 87-13 फीसदी फार्मूला लागू कर रिजल्ट जारी करने शुरू हो गए।
इसके बाद से ही पीएससी, ईएसबी के 2019 से हुई भर्तियों के 13 फीसदी पद के रिजल्ट होल्ड है। इनकी संख्या हजारों में पहुंच चुकी है और परेशान उम्मीदवार की संख्या लाखों में हो चुकी है।

सरकारी नौकरियां | मध्यप्रदेश राजनीति

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