36 हजार करोड़ का बजट, फिर भी MP के सरकारी स्कूल बदहाल क्यों?
Jitendra Shrivastava | Aug 30, 2026, 17:42 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्यप्रदेश में बढ़ते शिक्षा बजट के बावजूद सरकारी स्कूल बदहाल हैं। 'द सूत्र' की पड़ताल में जर्जर भवन, खराब रास्ते, शिक्षकों की कमी और स्कूल मर्जर की तस्वीर सामने आई।
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर 'द सूत्र' पड़ताल की।
- भोपाल, विदिशा और श्योपुर के स्कूलों में सामने गंभीर समस्याएं आईं।
- बढ़ते शिक्षा बजट के बावजूद स्कूलों की हालत क्यों नहीं सुधरी?
- सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और स्कूल मर्जर का मुद्दा।
- मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कमी को विशेषज्ञों ने बड़ी वजह बताया।
पिछले कुछ हफ्तों से जेन ज़ी और जेन अल्फा के प्रदर्शन भी कुछ इसी तरफ इशारा करते हैं। इन्हीं सब बातों की तह तक जाने के लिए 'द सूत्र' ने अलग-अलग जिलों में सरकारी स्कूलों की पड़ताल की।
हमने मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों के सरकारी स्कूलों का दौरा किया, भोपाल, विदिशा और श्योपुर में हालात बेहद चिंताजनक दिखाई दिए। कहीं जर्जर इमारतें हैं, तो कहीं रास्ते कीचड़ से भरे हैं। कहीं शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं स्कूलों का विलय किया जा रहा है।
MP के सरकारी स्कूल दम तोड़ रहे या तोड़ चुके हैं...
सईदिया स्कूल भोपाल...
जब 'द सूत्र' की टीम स्कूल पहुंची। तब जोरदार बारिश हो रही थी। हमने स्कूल प्रिंसिपल से अंदर शूट करने की परमिशन मांगी, लेकिन परमिशन नहीं मिली। हमें यही बताया गया कि स्कूल की हालत अच्छी है। सब कुछ ठीक है।
स्कूल में पढ़ाने वालीं एक शिक्षिका बार-बार हमसे यही कहती रहीं कि वो तो बरसात की वजह से ऐसा लग रहा है, लेकिन स्कूल की बिल्डिंग में लगी काई स्कूल का हाल बयां कर रही थी। बिल्डिंग की हालत किसी खंडहर से कम नहीं है। अंदर पानी भी टपक रहा है।
सूत्र की टीम ने जब मैडम से पूछा कि स्कूल की ऐसी हालत कब से है? तब मैडम ने हमें बताया कि दो महीने से ऐसी हालत है और स्कूल की मरम्मत का काम चल रहा है।
हमें अंदर शूट करने की परमिशन नहीं मिली इसलिए हमने मोबाइल कैमरे से यहां का स्थिति कैप्चर करने की कोशिश की। कुछ कमरों में काम चल रहा था, लेकिन कचरा वहीं फैला था। मरम्मत के नाम पर कहीं-कहीं थोड़ा प्लास्टर हो रहा था और थोड़ी पुताई।
आसपास के लोगों से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन कोई बात करने को तैयार नहीं था। जैसे तैसे हमें जानकारी मिली कि स्कूल के सामने जो ग्राउंड है, उसे नगर निगम शादी या दूसरे कार्यक्रमों के लिए किराए पर देता है।
आसपास के कुछ बच्चों ने बताया कि सईदिया स्कूल की पुरानी बिल्डिंग में अब क्लासेस नहीं लगती हैं। नई बिल्डिंग में जितनी जगह है वहीं पर क्लासेस लगाई जाती हैं।
विदिशा के बेरखेड़ी स्कूल का हाल
जब हमने पड़ताल की तो पता चला कि स्थानीय विधायक हैं बीजेपी के हरी सिंह सप्रे, लेकिन विधायक जी को शायद इस स्कूल के बारे में पता ही नहीं है, वरना ऐसी हालत तो स्कूल की न होती।
स्कूल की बिल्डिंग भी खस्ताहाल है। बिल्डिंग कितनी पुरानी है ये पता करने की जरूरत नहीं है। बिल्डिंग अपनी गवाही खुद दे रही है। बिल्डिंग को देखकर लगता ही नहीं कि कभी इसकी पुताई कराने का जिम्मा किसी ने उठाया होगा।
हमें बताया गया कि स्कूल 8वीं तक है। स्कूल में बैठकर पढ़ने के लिए बच्चों को दरी का ही सहारा है। क्योंकि बेंच की व्यवस्था 36 हजार करोड़ के बजट वाला विभाग कर ही नहीं पाया।
श्योपुर के स्कूल के हालात
अब छात्रों के सामने यही चुनौती होती है कि वो या तो कीचड़ को देखें या अपनी पढ़ाई को। इसलिए हालात कैसे भी हों स्कूल जाना मजबूरी है, लेकिन सवाल उठता है कि आजादी के 80 साल बाद भी सरकारी स्कूलों की हालात ऐसी क्यों है? इस बारे में हमने जानी मानी शिक्षाविद शिखा रस्तोगी से बात की। उनका कहना है कि
बजट तो कागजों में मंजूर हो जाता है, लेकिन उस बजट का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं ये कौन देखेगा? सरकार को स्कूलों के प्रिंसिपल को जिम्मेदारी देनी चाहिए कि वो जानकारी रखें कि आखिर बजट कहां खर्च हो रहा है? जवाबदेही तय होनी चाहिए।
स्कूल में इंफ्रास्ट्रक्चर सही नहीं होगा तो बच्चे स्कूल कैसे आएंगे। कहीं रास्ते नहीं हैं, कहीं बेसिक सुविधाएं ही नहीं हैं। ऐसे में बच्चा स्कूल छोड़ेगा ही। बच्चों को जब रुचि आएगी तो वो स्कूल क्यों छोड़ेगा?
यानी कुल मिलाकर कमी न ही बजट है न ही संसाधनों की है। कमी है तो सिर्फ इच्छाशक्ति की। जब प्लान बनाने वालों से लेकर उस प्लान को लागू करने वाले सब ईमानदारी से अपना काम करेंगे तो जाहिर है स्कूलों की हालत अपने आप सुधर जाएगी।
जेन जी और जेन अल्फा कर रहे प्रदर्शन
इन लोगों के धरने की वजह है शिक्षा व्यवस्था में पिछड़ता सरकारी सिस्टम। प्रदेश के किसी भी जिले में जाएं आपको बदहाल और खंडहर सरकारी स्कूल देखने को मिल ही जाएंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर जेन ज़ी (gen z protest) और जेन अल्फा प्रदर्शन न करें तो क्या करें ?
छात्रों के प्रदर्शन की वजह क्या है?
हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक पूरे भारत में सालभर में कुल 4 हजार 791 स्कूल बंद हुए। इन बंद स्कूलों में लगभग आधे स्कूल मध्यप्रदेश के थे। यानी मध्यप्रदेश में हर दिन औसतन 6.6 स्कूल बंद हुए।
स्कूल बंद होने के अलावा कहीं शिक्षक नहीं हैं, तो किसी स्कूल को बड़े सरकारी स्कूल में मर्ज किया जा रहा है। इन्हीं सब मामलों को लेकर मध्यप्रदेश के अलग अलग जिलों में जेन अल्फा ने प्रदर्शन किया।
पिछले कुछ प्रदर्शनों की बात करें तो...
- भोपाल: रीजनल स्कूल को केंद्रीय विद्यालय में मर्ज किए जाने के विरोध में प्रदर्शन।
- उज्जैन: सरकारी स्कूलों के स्थानांतरण के विरोध में प्रदर्शन।
- विदिशा: स्कूल बस का किराया बढ़ाए जाने के विरोध में प्रदर्शन।
- धार, टीकमगढ़ और नरसिंहपुर: शिक्षकों के तबादले, शिक्षा की गुणवत्ता और दूसरी बुनियादी स्कूली सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन।
mp government schools
2022-2026 तक का स्कूल शिक्षा विभाग का बजट...
- साल 2022-23 के लिए सरकार ने 27 हजार 792 करोड़ का बजट स्कूल शिक्षा विभाग को दिया था। इस बजट में 360 सीएम राइज खोलने का जिक्र था। इसके लिए 7 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रावधान किया गया था।
- साल 2023-24 के शिक्षा विभाग के बजट में सरकार ने शिक्षा विभाग का बजट बढ़ाया। इस बार बजट बढ़कर 38 हजार 375 करोड़ कर दिया गया। जो पिछले बजट से लगभग 5 हजार 532 करोड़ ज्यादा था। दावा किया गया कि बीते दो सालों में 17 हजार से ज्यादा शिक्षकों को नियुक्ति दी गई। 29 हजार शिक्षकों की नियुक्ति और करने की बात कही गई।
- साल 2024-25 में स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा दोनों का बजट एक साथ पेश किया गया। दोनों विभागों को मिलाकर 52 हजार 682 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया। दावे किए जाते हैं कि इसमें 33 हजार 533 करोड़ स्कूल शिक्षा विभाग को मिला था।
- साल 2025-26 के बजट में सरकार ने विधानसभा में स्कूल शिक्षा विभाग को दिए गए बजट का आंकड़ा नहीं बताया। दावा किया गया कि 36 हजार 582 करोड़ रुपए का प्रावधान उस वित्तीय वर्ष में किया गया था।
- साल 2026-27 के बजट में फिर सरकार ने बजट का आंकड़ा नहीं बताया। युवा कल्याण के नाम पर स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा और रोजगार, स्वरोजगार सबको मिलाकर बातें बताई गईं। दावा है कि इस साल सरकार ने 36 हजार 730 करोड़ रुपए का बजट स्कूल शिक्षा विभाग को दिया।
दावा:
इसके अलावा 2030 तक साक्षरता दर 100 फीसदी करने का भी लक्ष्य था
हकीकत
दूसरी तरफ सीएम राइज स्कूल जिन्हें अब सांदीपनि विद्यालय कहा जाने लगा है। ये अब तक 274 ही शुरू हो सके हैं, जबकि 2022 में दावे 360 सीएम राइज खोलने के थे।
दावा:
हकीकत:
दावा:
हकीकत:
स्कूल शिक्षा विभाग एक तरफ संजीवनी का इंतजार कर रहा है, तो दूसरी तरफ लाड़ली बहना योजना जैसी योजनाओं पर सरकार दिल खोलकर पैसा लुटा रही है।
भारी पड़ रहा लाड़ली का खर्चा!
हाल ही में 18 अगस्त 2026 को हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार ने लाड़ली बहना योजना को अगले 5 साल के लिए और बढ़ा दिया है। यानी 31 मार्च 2031 तक सरकार लाड़ली बहना योजना पर 1 लाख 14 हजार 365 करोड़ रुपए और खर्च करेगी।
अब जानकार सवाल उठा रहे हैं कि जब सरकार सिर्फ एक योजना पर 1 लाख करोड़ से ज्यादा का खर्च कर रही है, तो दूसरी योजनाओं के लिए फंड कहां से आएगा?
'द सूत्र' ने पहले भी खबर दिखाई थी कि कैसे लाड़ली बहना का खर्च सरकार पर भारी पड़ रहा है। अकेले मध्यप्रदेश में लाड़ली बहना का खर्च शिक्षा बजट के 42 फीसदी के बराबर हो चुका है। ये स्कीम राज्य के कुल खर्च का 5.44 फीसदी है।
स्वास्थ्य बजट से तुलना करें तो ये लगभग 99 फीसदी तक पहुंच गया है। यानी लाड़ली बहना का खर्चा और स्वास्थ्य पर खर्चा लगभग बराबर है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस योजना का कोई निश्चित डाटा नहीं है।
किसी को ये नहीं पता कि कितनी बहनों की जिंदगी इस योजना से बदली उस योजना पर इतना खर्च क्यों? क्योंकि पैसा सीधे बहनों के खाते में जाता है, उस पैसे का वो क्या कर रही हैं सरकार को नहीं पता।
'द सूत्र' ने शिक्षा विभाग और स्कूलों की बदहाली को लेकर जब एक्सपर्ट से बात की तो उनका क्या कहना है ये जानना भी जरूरी है-
योजनाएं बनती गईं, लेकिन मॉनिटरिंग नहीं हुई
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स्कूलों की बदहाली की सबसे बड़ी वजह सरकार का बार-बार प्रयोग करना है। कभी मॉडल स्कूल, कभी एक्सीलेंस स्कूल, कभी सीएम राइज स्कूल खोले गए।
योजनाएं बनती गईं, लेकिन उनकी मॉनिटरिंग नहीं हुई। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी योजनाओं की समीक्षा नहीं होगी तब तक हालात नहीं बदलेंगे। जिन योजनाओं को लागू किया जा रहा है उनका फीडबैक लेना भी जरूरी है।
विभाग में दिसंबर 2027 तक 80 फीसदी पुराना स्टाफ रिटायर हो जाएगा। इस तरफ ध्यान देने की भी जरूरत है। उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में सरकार जिम्मेदार तय करती है। काम नहीं होता तो जिम्मेदार से सवाल होते हैं, एक्शन होता है। हमारे यहां इसकी कमी है।
अगर सरकारी स्कूल अच्छा है, वहां सारी सुविधाएं हैं, शिक्षक हैं, तो कम छात्रों वाले स्कूल को मर्ज करने में दिक्कत नहीं है। ऐसे में शिक्षकों का समायोजन भी हो जाएगा और परेशानी भी दूर होगी।
-ज्ञान प्रकाश भार्गव, बीईओ (रिटायर्ड)
यानी देखा जाए तो समस्या का समाधान वहीं है जहां से समस्या शुरू हो रही है। यानी शासन स्तर पर। सरकार चाहे स्कूल का नाम सीएम राइज रखे, या फिर सांदीपनि विद्यालय।
मॉनिटरिंग नहीं होगी, जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तो हालात नहीं बदलेंगे। आज बजट 36 हजार करोड़ है, तब भी समस्या है। बजट 50 हजार करोड़ होगा तब भी शायद जेन जी और जेन अल्फा आपको सड़कों पर ही दिखेंगे।
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