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News in Short
- हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर एमपी सरकार से हलफनामे में जानकारी मांगी।
- 102 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं, 499 स्कूलों में शिक्षक कम हैं।
- प्राथमिक स्कूलों में 21हजार से ज्यादा शिक्षक पद खाली हैं, मिडिल और हाई स्कूलों में भी स्थिति गंभीर।
- 8 हजार 533 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं, 21 हजार स्कूलों में छात्रों की संख्या 20 से भी कम।
- सरकार शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया में सुस्ती के कारण स्कूलों की स्थिति सुधरने में देरी हो रही है।
News in Detail
मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों की स्थिति पर अब जबलपुर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। खासतौर पर, शिक्षकों की गंभीर कमी और स्कूलों की बदहाली को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी हलफनामे के जरिए पेश करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी को तय की गई है।
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शिक्षकों की कमी पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
डिंडौरी के लोक सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश में स्कूलों की स्थिति और शैक्षणिक व्यवस्था पर नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद सालों बीत गए हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं।
कोर्ट ने इसे गंभीर चिंता का विषय माना है। प्रदेश में कुल एक लाख एक हजार 59 सरकारी स्कूल हैं, जिसमें प्राथमिक, मिडिल, हाई स्कूल और हायर सेकेंड्री स्कूल शामिल हैं।
इन स्कूलों में शिक्षकों की कमी की स्थिति बेहद गंभीर है। याचिका में यह जानकारी दी गई कि राज्य में 102 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक नहीं है। वही 499 स्कूलों में शिक्षकों की संख्या जरूरत से कम है।
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प्राथमिक, मिडिल और हाईस्कूल में शिक्षकों की कमी
मध्यप्रदेश में प्राथमिक स्कूलों की संख्या 78 हजार 298 है, जबकि मिडिल स्कूलों की संख्या 12 हजार 231 है। उच्चतर माध्यमिक (हाई स्कूल और हायर सेकेंड्री) स्कूलों की संख्या 10 हजार 530 है। इन स्कूलों में कुल 2 लाख 85 हजार 557 शिक्षक कार्यरत हैं। लेकिन इसमें भी गंभीर कमी देखी जा रही है।
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प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की कमी
प्रदेश में 78 हजार 298 प्राथमिक स्कूलों में 21 हजार से ज्यादा शिक्षक पद रिक्त हैं। मिडिल स्कूलों में 10 हजार से ज्यादा शिक्षक पद खाली हैं। हाई और हायर सेकेंड्री स्कूलों में शिक्षकों के 12 हजार से ज्यादा पद रिक्त हैं। अदालत ने यह भी बताया कि जबलपुर जिले में 54 स्कूल ऐसे हैं जो शिक्षकों की कमी के कारण बंद होने की कगार पर हैं। वहीं खेल शिक्षा के मामले में स्थिति और भी खराब है। प्रदेश में 92 हजार स्कूलों में से सिर्फ 700 में ही नियमित खेल शिक्षक उपलब्ध हैं।
स्थिति पर अदालत और अधिवक्ताओं की चिंता
सुनवाई के दौरान, अदालत मित्रों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित किया और बताया कि इस स्थिति में छात्रों का भविष्य गंभीर खतरे में है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का विश्वास लगातार कम हो रहा है।
सरकारी आंकड़ों और यू-डाइस (UDISE) रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में 8 हजार 533 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं, जबकि 21 हजार 193 माध्यमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या 20 से भी कम रह गई है।
इसके अलावा, 20 स्कूलों में एक भी शिक्षक तैनात नहीं है। वहीं 4 हजार 128 स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक कार्यरत है। पिछले शैक्षणिक वर्ष के मुकाबले इस साल 3.44 लाख विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है, जो सरकारी स्कूलों से छात्रों के पलायन को दर्शाता है।
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मामला गंभीर लेकिन सरकारी कवायद सुस्त
शिक्षक न होने से प्रदेश में सरकारी स्कूलों में गिरते शैक्षणिक स्तर पर कोर्ट चिंतित है। बच्चों के माता पिता परेशान हैं, लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग पुराने ढर्रे पर ही है। सरकार शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है, लेकिन एक भर्ती को पूरा करने में ही साल दो साल लग रहे हैं।
ऐसे में जितने पदों को भरा जाता है उससे आधे सेवानिवृत्ति की वजह से खाली हो जाते हैं। सरकारी दावे के अनुसार मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (MPESB) के जरिए 13 हजार 89 प्राथमिक और 10 हजार 758 माध्यमिक शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। कोर्ट ने सरकार से स्कूलों की बदहाली को सुधारने और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने के निर्देश भी दिए हैं।
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