/sootr/media/media_files/2026/01/21/mp-high-court-controversy-2026-01-21-19-32-11.jpg)
News in short
- बार एसोसिएशन ने की सीनियर एडवोकेट की डेजिग्नेशन रद्द करने की मांग।
- आवेदन में आपराधिक तथ्य छिपाने के आरोप।
- 13 जनवरी की घटना को लेकर जातीय तनाव फैलाने का दावा।
- राष्ट्रीय शूद्र संघ के अध्यक्ष ने घटना को बताया काला अध्याय।
- सीनियर एडवोकेट रामेश्वर ठाकुर ने आरोपों को बताया साजिश।
News in detail
जबलपुर हाईकोर्ट परिसर से जुड़ा विवाद लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। एक ओर सीनियर एडवोकेट रामेश्वर प्रसाद सिंह ठाकुर पर आरोप लगे है दो दूसरी ओर वह इसे साजिश बता रहें है।
बार एसोसिएशन ने चीफ जस्टिस को प्रतिवेदन दिया है। ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर ने ग्वालियर मामले में हस्तक्षेप याचिका दायर की है। इसने पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है।
राजीव सोगरवाल बने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के 42वें अध्यक्ष, महासचिव पद पर दीपेश शर्मा की शानदार जीत
बार एसोसिएशन का संयुक्त प्रतिवेदन
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जिला अधिवक्ता संघ और हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार एसोसिएशन ने चीफ जस्टिस को प्रतिवेदन सौंपा है। इस प्रतिवेदन में सीनियर एडवोकेट रामेश्वर प्रसाद सिंह ठाकुर की डेजिग्नेशन रद्द करने की मांग की गई है। बार एसोसिएशन ने कहा कि यह व्यक्तिगत विवाद नहीं है। यह न्यायपालिका की गरिमा और पारदर्शिता से जुड़ा है। इसलिए इस पर फुल कोर्ट स्तर पर विचार होना चाहिए।
इन मामलों की जानकारी छिपाने का आरोप
प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया है कि रामेश्वर ठाकुर ने 5 अक्टूबर 2024 को सीनियर एडवोकेट बनने के लिए आवेदन दिया। उन्होंने आवेदन में यह घोषणा की थी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक या दीवानी मामला लंबित नहीं है।
बार एसोसिएशन के अनुसार, थाना सिविल लाइन, जबलपुर में उनके खिलाफ अपराध क्रमांक 195/2022 दर्ज है। यह मामला अभी न्यायालय में लंबित है। इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा दायर एक दीवानी वाद भी न्यायिक प्रक्रिया में है। इसे छिपाना गंभीर कदाचार बताया गया है।
तनाव फैलाने की साजिश का दावा
बार एसोसिएशन ने 13 जनवरी 2026 को हाई कोर्ट परिसर में हुई घटना को सुनियोजित बताया है। आरोप है कि इस घटना के जरिए अधिवक्ताओं के बीच जातीय आधार पर तनाव पैदा करने का प्रयास किया गया। एक ऐसी FIR दर्ज कराई गई, जिसमें उन वकीलों के नाम भी शामिल थे, जो मौके पर मौजूद नहीं थे। बार के अनुसार, इस तरह की गतिविधियां कोर्ट के पेशेवर वातावरण के लिए अत्यंत घातक हैं।
एमपी में नहीं थम रहा अंबेडकर विवाद, आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष पर केस
राष्ट्रीय शूद्र संघ के अध्यक्ष का बदला रुख
इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय शूद्र संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश पटेल का पत्र भी अहम माना जा रहा है। उन्होंने 19 जनवरी 2026 को लिखे पत्र में 13 जनवरी की घटना को काला अध्याय बताया और स्वीकार किया कि उनसे गंभीर चूक हुई है। पटेल ने यह भी स्पष्ट किया कि वे अब रामेश्वर सिंह से जुड़ी किसी भी जातिगत भावना से स्वयं को अलग कर चुके हैं। आगे बार एसोसिएशन के मार्गदर्शन में ही कार्य करेंगे।
ठाकुर ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने आरोपों पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि वे लंबे समय से दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा कर रहे हैं। ठाकुर ने आरोप लगाया कि कुछ लोग जानबूझकर पिछड़े वर्ग के वकीलों को टारगेट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास कभी सफल नहीं होंगे।
ठाकुर ने स्पष्ट किया कि वे बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के सम्मान के खिलाफ किसी भी बात को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि बाबा साहब के अपमान के आरोप में जेल गए व्यक्ति का सम्मान करना वे विरोध करेंगे।
ठाकुर ने विरोध करने वाले अधिवक्ता के साथ मारपीट के मामले में न्याय दिलाने के लिए दृढ़ संकल्पित होने की बात कही। उन्होंने हस्तक्षेप आवेदन दायर कर मामला मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान में लाया। जरूरत पड़ी तो वे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। हाईकोर्ट एडवोकेट बार काउंसिल द्वारा जारी नोटिस पर उन्होंने कहा कि संगठन को ऐसा करने का अधिकार नहीं है।
निष्ठा और जनसेवा के साथ कड़े फैसलों के लिए मशहूर जस्टिस अतुल श्रीधरन को बार एसोसिएशन ने दी विदाई
पूरे प्रदेश में है मामले की चर्चा
आपको बता दें कि एमपी हाईकोर्ट में हर न्यायिक गलियारे में इस मामले की चर्चा है। बीते दिनों क्रिमिनल मामलों की एक डिविजनल बैच ने दो भाइयों के विवाद पर सुनवाई के दौरान एक मौखिक टिप्पणी की थी। जज ने सरकारी अधिवक्ता से कहा था कि आप AG ऑफिस में देख रहे हैं कि एक भाई दूसरे भाई को मार रहा है।
बार एसोसिएशन की मांगों और सीनियर एडवोकेट के जवाब के बाद मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट इस प्रकरण में क्या रुख अपनाते हैं। इसका असर न केवल संबंधित अधिवक्ता पर बल्कि न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा।
/sootr/media/agency_attachments/dJb27ZM6lvzNPboAXq48.png)
Follow Us