वॉट्सएप स्टेटस पर उर्दू शायरी डालने पर FIR, MP हाईकोर्ट ने टीचर को दी राहत

Anjali Dwivedi | May 10, 2026, 14:50 IST
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Jabalpur High Court Decision
Jabalpur High Court Decision

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बैतूल के एक शिक्षक को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि वॉट्सएप पर साहित्यिक शायरी शेयर करना अपराध नहीं है। पुलिस ने इसे समाज का माहौल बिगाड़ने वाला माना था, जिसे जस्टिस बीपी शर्मा ने सिरे से खारिज कर दिया है।

मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी पर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि वॉट्सएप स्टेटस पर शायरी शेयर करना अपराध नहीं है। इस फैसले से बैतूल के एक सरकारी शिक्षक को बड़ी राहत मिली है। शिक्षक के खिलाफ दर्ज सभी कानूनी कार्यवाहियों को कोर्ट ने खत्म कर दिया है।

क्या था पूरा विवाद?

यह पूरा मामला बैतूल जिले के चिचोली पुलिस स्टेशन का है। यहां के सरकारी शिक्षक फैजान अंसारी ने एक वीडियो पोस्ट किया था। उन्होंने शायर शोएब कियानी की एक मशहूर उर्दू शायरी Whatsapp Status पर साझा की थी। पुलिस ने इसे आपत्तिजनक मानते हुए उन पर मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस का दावा था कि इससे समाज का माहौल बिगड़ सकता है।

पुलिस ने की थी सख्त कार्रवाई

यह घटना 22 जुलाई 2025 की बताई जा रही है। शिकायत मिलते ही पुलिस ने फौरन एक्शन लिया था। पुलिस ने शिक्षक को थाने बुलाकर उनका मोबाइल फोन जब्त किया। इसके बाद उन पर BNS की धारा 353(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। शिक्षक ने इस कार्रवाई को पूरी तरह गलत बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने क्या टिप्पणी की?

जस्टिस बीपी शर्मा की सिंगल बेंच ने इस मामले की गहराई से जांच की। कोर्ट ने साफ कहा कि यह शायरी किसी के खिलाफ नफरत नहीं फैलाती, बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ हो रहे दुर्व्यवहार पर एक व्यंग्य है। कोर्ट के मुताबिक, यह कविता केवल विचारों को झकझोरने का काम करती है।

सुनवाई के दौरान फैजान अंसारी ने अपनी बात कोर्ट में मजबूती से रखी। उन्होंने कहा कि उनका मकसद केवल साहित्य को साझा करना था। कोर्ट ने उनकी दलील को सही कहा और पुलिस के तर्कों को नकारा। जस्टिस शर्मा ने कहा कि सिर्फ आशंका के आधार पर केस नहीं चल सकता है।

बिना सबूत के किसी को सजा नहीं होगी- हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने पुलिस और प्रशासन को सख्त संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। केवल किसी की निजी राय पर किसी को अपराधी नहीं बनाया जा सकता। अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करना लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है।

यह फैसला सोशल मीडिया यूजर्स के लिए एक मिसाल की तरह है। अक्सर लोग पोस्ट साझा करने पर कानूनी पचड़ों में फंस जाते हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक हिंसा न भड़के, तब तक पोस्ट अपराध नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रखना हर नागरिक का हक है।

नज़्म बेहया की सच्चाई

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उस शायरी का भी जिक्र किया। कोर्ट ने बताया कि यह नज़्म बेहया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर है। यह पाकिस्तान जैसे देशों में महिलाओं की स्थिति पर चोट करती है। दुनिया भर के बड़े साहित्यकारों ने इस नज़्म बेहया की पहले भी तारीफ की है।

कोर्ट का यह फैसला प्रदेश में चर्चा का विषय

बैतूल से लेकर जबलपुर तक इस फैसले की काफी चर्चा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इससे पुलिस की मनमानी पर लगाम लगेगी। शिक्षक फैजान अंसारी ने कोर्ट के इस फैसले पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि न्याय की जीत हुई है और सच सामने आया।

यह आदेश भविष्य में इसी तरह के अन्य मामलों में नजीर बनेगा। पुलिस को अब सोशल मीडिया के मामलों में अधिक सावधानी बरतनी होगी। कानून का मकसद लोगों की आवाज दबाना नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखना है। कोर्ट ने इस बुनियादी फर्क को बहुत ही खूबसूरती से समझाया है।

FAQ

  1. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) क्या है?
    बीएनएस की धारा 353(2) आमतौर पर ऐसे बयानों या पोस्ट के लिए लगाई जाती है जिनसे विभिन्न समुदायों के बीच नफरत या वैमनस्य फैलने की आशंका हो।
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