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News In Short
लाड़ली लक्ष्मी योजना की 1.43 लाख रुपए की राशि का लाभ सिर्फ 20% लाड़लियों को मिल रहा है।
केवल 19.97% लाड़लियों ने ही 12वीं कक्षा में प्रवेश लिया है।
ग्रेजुएशन तक 5.83% और पीजी तक सिर्फ 0.33% बेटियां ही पहुंच पाई हैं।
साल 2012 के मुकाबले 2025 में पंजीयन की संख्या में बड़ी गिरावट आई है।
6वीं कक्षा के बाद लगभग आधी लड़कियां पढ़ाई से बाहर हो जाती हैं।
News In Detail
भोपाल. मध्य प्रदेश में बेटियों का भविष्य संवारने के लिए यह योजना (लाड़ली लक्ष्मी योजना) शुरू हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य जेंडर बैलेंस और शिक्षा में सुधार करना था। दो दशक पहले शुरू हुई इस योजना पर अब बड़े सवाल उठ रहे हैं।
विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने इन आंकड़ों को पेश किया। इन आंकड़ों ने योजना के सही तरीके से लागू न होने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही राज्य में लड़कियों के गिरते शैक्षिक स्तर पर भी चिंता जाहिर की गई है।
80% बेटियां पूर्ण लाभ से वंचित
लाड़ली लक्ष्मी योजना के तहत राज्य सरकार एक लाड़ली को 1 लाख 43 हजार रुपए की आर्थिक मदद देती है।
असलियत ये है कि 80% छात्राएं सिर्फ शुरुआती किस्तों तक ही सीमित रह गई हैं, यानी करीब 43 हजार रुपए तक।
पूरा फायदा, यानी 1 लाख 43 हजार रुपए, केवल 20% बेटियों को ही मिल पा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि वे उच्च शिक्षा के कड़े मापदंड पूरे नहीं कर पातीं।
6वीं के बाद टूटने लगता है शिक्षा का सपना
एमपी विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल पर सरकार ने जो आंकड़े रखे, वे चिंताजनक हैं। आंकड़ों के मुताबिक-
रजिस्टर्ड लाड़लियों में से केवल 52.35% बेटियों ने ही कक्षा 6वीं तक की पढ़ाई पूरी की है।
कक्षा 12वीं में प्रवेश लेने वाली बेटियों का प्रतिशत गिरकर मात्र 19.97% रह गया है।
कॉलेज यानी स्नातक तक सिर्फ 5.83% बेटियां ही पहुंच पा रही हैं।
मास्टर्स तक का सफर तय करने वाली लाड़लियों की संख्या तो न के बराबर यानी महज 0.33% है।
रजिस्ट्रेशन के ग्राफ में भारी गिरावट
योजना की शुरुआत से लेकर अब तक के सफर पर नजर डालें, तो रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों में भी उतार-चढ़ाव देखा गया है। 2007 से 2025 के बीच कुल 52.2 लाख लाड़लियों का पंजीयन हुआ।
साल 2012: इस साल सर्वाधिक 3 लाख 54 हजार 271 पंजीयन हुए थे।
साल 2021: यहां फिर उछाल आया और 3 लाख 44 हजार 649 पंजीयन दर्ज किए गए।
साल 2025: इस साल पंजीयन की संख्या घटकर 2 लाख 72 हजार 6 रह गई है।
मंत्री निर्मला भूरिया ने इस गिरावट का बचाव करते हुए कहा कि पात्रता के सख्त नियमों के कारण पंजीयन में कमी आई है।
उच्च शिक्षा का बढ़ता ड्रॉपआउट
योजना इस तरह से बनाई गई है कि जैसे-जैसे बेटी आगे बढ़ती है, उसे ज्यादा स्कॉलरशिप मिलती है। लेकिन जब 80% बेटियां तो स्कूल ही छोड़ देती हैं, तो उन्हें सरकार से ज्यादा पैसा नहीं मिल पाता।
ये आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ पैसे देने से पढ़ाई में सुधार नहीं हो रहा। असली समस्या तो ये है कि बीच में पढ़ाई छोड़ने की वजह से बेटियों को वो मदद ही नहीं मिल पा रही।
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