आईपीएस नरेंद्र कुमार सिंह
ड्यूटी पर निकले, मौत मिली! MP में अफसरों का हत्यारा माफिया! कितने मामलों में हुई सजा?
Atul Dwivedi | Nov 02, 2026, 18:55 IST
मध्य प्रदेश में 2012 से 2026 के बीच माफिया से जुड़ी घटनाओं में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की जान गई।
देवास के खातेगांव में शराब माफिया ने एक पुलिस अफसर की जान ले ली। टीआई दिलीप पुरी को शराब माफिया ने गाड़ी से कुचल दिया। वे करीब दो घंटे तक जिंदगी और मौत से लड़ते रहे, लेकिन आखिरकार उनकी मौत हो गई। बता दें कि दिलीप पुरी माफिया के हाथों जान गंवाने वाले मध्य प्रदेश के पहले अफसर नहीं हैं।
इससे पहले भी कई अफसर अपनी ड्यूटी निभाते हुए माफिया का शिकार हो चुके हैं। आईपीएस नरेंद्र कुमार सिंह, आरक्षक धर्मेंद्र चौहान, वनरक्षक नरेंद्र शर्मा, डिप्टी रेंजर सूबेदार सिंह कुशवाह, पटवारी प्रसन्न सिंह बघेल और एएसआई महेंद्र बागरी... ये वो नाम हैं, जिन्होंने अपना फर्ज निभाते हुए जान गंवाई है।
साल 2012 से 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि माफिया अब तक प्रदेश के सात अफसरों की जान ले चुका है। हर घटना के बाद सरकार सख्त कार्रवाई, जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी का भरोसा देती है। लेकिन सवाल है कि इन वादों का नतीजा क्या निकला? आरोपियों को कितनी सजा मिली? जांच कहां तक पहुंची? और क्या माफिया के खिलाफ कार्रवाई सच में हुई?
द सूत्र ने इन सभी मामलों की पड़ताल की है। इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि ड्यूटी के दौरान मारे गए इन अफसरों को अब तक न्याय मिला या नहीं।
मुरैना मध्य प्रदेश का वो जिला है जहां माफिया का सबसे ज्यादा बोलबाला है। तारीख थी 8 मार्च 2012 और होली का त्योहार था। मुरैना के बानमोर में 2009 बैच के IPS अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह गश्त पर थे। इसी दौरान नरेंद्र कुमार ने अवैध पत्थरों से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉली को जाते देखा था। आईपीएस ने ट्रैक्टर-ट्रॉली का पीछा किया और उसे रोकने की कोशिश की थी। जब आरोपी मनोज गुर्जर ने ट्रैक्टर नहीं रोका, तब IPS कूदकर ट्रैक्टर के आगे खड़े हो गए और स्टीयरिंग पकड़ लिया था। लेकिन आरोपी ने धक्का देकर उन्हें नीचे गिराया और उनके ऊपर ट्रैक्टर-ट्रॉली चढ़ा दी थी। गंभीर हालत में आईपीएस को ग्वालियर रेफर किया गया, लेकिन उनकी मौत हो गई थी।
तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मामले में CBI जांच की सिफारिश की थी। सीबीआई ने इसे सोची-समझी हत्या (तब धारा 302) के बजाय गैर-इरादतन हत्या माना था। मामले में कोर्ट ने ट्रैक्टर ड्राइवर मनोज गुर्जर को दोषी पाया और 10 साल की सजा सुनाई थी।
दिवंगत नरेंद्र कुमार की पत्नी मधु रानी तेवतिया आईएएस अधिकारी हैं। इस घटना के बाद तेवतिया ने अपना कैडर बदल लिया था। मधु रानी ने मध्य प्रदेश कैडर छोड़कर AGMUT (अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) जाने का फैसला किया था।
मुरैना में एक बार फिर माफिया ने एक सरकारी अफसर की जान ली थी। आईएएस नरेंद्र कुमार सिंह की हत्या के तीन साल बाद मुरैना में ही एक कांस्टेबल की जान गई थी। यहां 05 अप्रैल 2015 को तड़के लगभग साढ़े चार बजे यह घटना हुई थी। आरक्षक धर्मेंद्र चौहान अपनी टीम के साथ किसी मामले के सिलसिले में एक गांव की तरफ जा रहे थे। रास्ते में उन्हें चंबल नदी में अवैध रेत खनन में शामिल एक डंपर दिखा था। जब धर्मेंद्र चौहान ने उसे रोकने की कोशिश की, तो डंपर चालक गाड़ी लेकर भागने लगा था। डंपर रोकने की कोशिश के दौरान आरोपी ने आरक्षक के ऊपर ही डंपर चढ़ा दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी।
सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि उस वक्त धर्मेंद्र चौहान के साथ 6 पुलिसवाले और थे, लेकिन किसी ने भी डंपर चालक को पकड़ने की कोशिश नहीं की थी। इस घटना के बाद सभी छह पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर कर दिया गया था। मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन भी किया गया था।
SIT ने अपनी रिपोर्ट में इसे सोची-समझी साजिश बताया था। मामला कोर्ट पहुंचा तो आरोपी ड्राइवर को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई, जबकि बाकी आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
6 मार्च 2016 का
प्रदेश के सरकारी अफसर माफिया की गाड़ियों के तले रौंदे जा रहे थे, लेकिन माफिया के अंदर कानून का डर नहीं था। ऐसा ही एक मामला 6 मार्च 2016 को सामने आया था। ग्वालियर के पुरानी छावनी थाना क्षेत्र में नेशनल हाईवे-3 पर निरावली के पास वनरक्षक नरेंद्र कुमार शर्मा की भी माफिया ने जान ले ली थी।
नरेंद्र शर्मा वन विभाग की फ्लाइंग स्क्वाड में तैनात थे। चंबल इलाके में हो रहे अवैध रेत उत्खनन को रोकने के लिए इस टीम का गठन किया गया था।
टीम ने अवैध रेत से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को जब्त किया और उन्हें थाने ले जाया जा रहा था। रास्ते में आरोपी ड्राइवर राजेश उर्फ लल्ला गुर्जर ने गाड़ी तेज भगाई लेकिन नरेंद्र शर्मा कूदकर गाड़ी पर चढ़ गए थे। आरोपी ड्राइवर और शर्मा के बीच हाथापाई हुई लेकिन शर्मा नीचे गिर गए थे। इसके बाद आरोपी ने ट्रैक्टर-ट्रॉली नरेंद्र शर्मा के ऊपर चढ़ा दी, जिससे उनकी मौत हो गई थी। जांच में सामने आया कि महज 300 रुपए प्रति ट्रॉली रेत भरकर यह अवैध सिंडिकेट चलाया जा रहा था।
मामले में कोर्ट ने आरोपी ड्राइवर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस मामले में ट्रैक्टर मालिक को कोर्ट ने रिहा कर दिया था।
मुरैना में 7 सितंबर 2018 को एक बार फिर खौफनाक घटना हुई थी। नेशनल हाईवे 3 पर घिरोना वन चौकी के पास डिप्टी रेंजर सूबेदार सिंह कुशवाह की हत्या कर दी गई थी। घटना के दिन सूबेदार सिंह अपने चार साथियों के साथ ड्यूटी पर थे। इसी दौरान चंबल के प्रतिबंधित क्षेत्र से रेत चुराकर माफिया की ओवरलोड ट्रैक्टर-ट्रॉलियां आ रही थीं। ट्रैक्टरों को रोकने के लिए वन विभाग ने सड़क पर लोहे की कीलों वाली टायर बस्टर स्ट्रिप बिछा रखी थी। ट्रैक्टरों के आगे दो मोटरसाइकिल पर बाइक सवारों ने स्ट्रिप को हटाना शुरू किया था। जब कुशवाह ने मोटरसाइकिल सवारों को रोकने की कोशिश की तो पीछे से आ रही ट्रैक्टर-ट्रॉली ने उन्हें टक्कर मारी और कुचलते हुए निकल गई थी। सूबेदार सिंह की मौके पर ही मौत हो गई थी।
शहडोल में जो हुआ उस घटना ने तो सबको परेशान कर दिया था। सेना से रिटायर्ड एक पूर्व सैनिक प्रसन्न सिंह बघेल जो पटवारी की नौकरी में आए, उनकी हत्या भी रेत माफिया ने कर दी थी। घटना 25-26 नवंबर 2023 की रात हुई थी। शहडोल के देवलौंद में गोपालपुर के पास सोन नदी पर रेत उत्खनन हो रहा था। पटवारी प्रसन्न सिंह तीन अन्य साथियों के साथ गश्त पर निकले थे। टीम को गोपालपुर सोन नदी घाट पर, अवैध रूप से उत्खनन में शामिल रेत से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉली निकलती दिखी थी। पटवारी प्रसन्न सिंह ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन माफिया ने गाड़ी रोकने के बजाय सीधे उसे प्रसन्न सिंह के ऊपर चढ़ा दिया था। प्रसन्न सिंह की मौके पर ही मौत हो गई थी।
घटना के बाद पुलिस ने पहले अज्ञात पर केस दर्ज किया। बाद में इस मामले में 6 आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। जिला कोर्ट से जमानत खारिज हुई तो आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट ने 6 आरोपियों को जमानत दे दी है। यानी मामला फिलहाल कोर्ट में चल रहा है।
पटवारी प्रसन्न सिंह की हत्या के ठीक 6 महीने बाद एक और बड़ा मामला सामने आया था। 4 मई 2024 की देर रात ब्यौहारी थाना क्षेत्र के खढ़ौली गांव में एएसआई महेंद्र बागरी की हत्या कर दी गई थी। दरअसल, महेंद्र बागरी अपने साथियों के साथ एक वारंटी को पकड़ने जा रहे थे। इसी दौरान खढ़ौली के पास उन्हें नदी से अवैध रेत भरकर आ रही एक ट्रैक्टर-ट्रॉली दिखाई दी थी। उन्होंने ट्रैक्टर रोकने का इशारा किया, लेकिन उसे चला रहे 19 साल के राज रावत ने ट्रैक्टर रोकने के बजाय रफ्तार बढ़ा दी और सीधे ASI महेंद्र बागरी को कुचल दिया था।
घटना के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन ने आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई की थी। मुख्य आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाया गया था। वहीं, सरकार ने ASI के परिवार को एक करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता और अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की मंजूरी भी दी थी।
इस मामले का भी वही हाल है जो पटवारी प्रसन्न सिंह के केस का था। पुलिस ने जिन दो आरोपियों के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश किया है, उन दोनों की जमानत हो चुकी है। केस फिलहाल कोर्ट में लंबित है।
एक तरफ माफिया प्रदेश के अफसरों को कुचलकर मार रहा है, दूसरी तरफ मंत्री अपनी बातों से जले पर नमक छिड़कते हैं। मंत्री एदल सिंह कंषाना रेत माफिया को पेट माफिया कह चुके हैं। मंत्री का मानना है कि ये लोग कोई माफिया नहीं हैं, बस अपना पेट पालने के लिए काम करते हैं। मंत्री की मानें तो मुरैना जिले में माफिया नहीं है। उनके मुताबिक माफिया वो होता है जो किसी एक बड़े व्यक्ति या गिरोह के लिए काम करे। ये लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए रेत निकाल रहे हैं। अब इस पेट माफिया को क्या कहें जो पेट पालने के लिए किसी की जान लेने से भी परहेज नहीं करता।
इस मामले में द सूत्र ने रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी शैलेश सिंह से भी बात की। खातेगांव की घटना को लेकर उन्होंने हैरानी जताई। उनका कहना है कि ऐसे आरोपियों के खिलाफ सीधे हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
इस मामले में द सूत्र ने मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से भी बात की। उनसे पूछा गया कि आखिर अपराधियों के मन में कानून का डर क्यों नहीं रहता?
इस पर डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने बताया कि ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं और उनके मन से कानून का डर कम होता जा रहा है। जब कोई व्यक्ति अपने फायदे, अवैध कारोबार या अहंकार को कानून से ऊपर समझने लगता है, तो उसे रोकने वाला अधिकारी उसे व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि अपना दुश्मन लगने लगता है।
उन्होंने कहा कि कई बार ऐसी घटनाएं सिर्फ गुस्से में नहीं होतीं, बल्कि अपराधी किसी भी रुकावट को हटाने के लिए हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। यह मानसिक बीमारी से ज्यादा अपराधी सोच, सजा मिलने का डर खत्म होने और नैतिक जिम्मेदारी कमजोर पड़ने का मामला है।
साल 2012 से 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि माफिया अब तक प्रदेश के सात अफसरों की जान ले चुका है। हर घटना के बाद सरकार सख्त कार्रवाई, जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी का भरोसा देती है। लेकिन सवाल है कि इन वादों का नतीजा क्या निकला? आरोपियों को कितनी सजा मिली? जांच कहां तक पहुंची? और क्या माफिया के खिलाफ कार्रवाई सच में हुई?
द सूत्र ने इन सभी मामलों की पड़ताल की है। इस रिपोर्ट में हम बताएंगे कि ड्यूटी के दौरान मारे गए इन अफसरों को अब तक न्याय मिला या नहीं।
8 मार्च 2012 का आईपीएस नरेंद्र कुमार सिंह केस:
मामले की हुई थी CBI जांच
पत्नी हैं IAS अधिकारी
5 अप्रैल 2015 का आरक्षक धर्मेंद्र चौहान केस:
आरक्षक धर्मेंद्र चौहान
सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि उस वक्त धर्मेंद्र चौहान के साथ 6 पुलिसवाले और थे, लेकिन किसी ने भी डंपर चालक को पकड़ने की कोशिश नहीं की थी। इस घटना के बाद सभी छह पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर कर दिया गया था। मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन भी किया गया था।
जांच में क्या आया?
6 मार्च 2016 का वनरक्षक नरेंद्र कुमार शर्मा केस:
नरेंद्र शर्मा वन विभाग की फ्लाइंग स्क्वाड में तैनात थे। चंबल इलाके में हो रहे अवैध रेत उत्खनन को रोकने के लिए इस टीम का गठन किया गया था।
टीम ने अवैध रेत से लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को जब्त किया और उन्हें थाने ले जाया जा रहा था। रास्ते में आरोपी ड्राइवर राजेश उर्फ लल्ला गुर्जर ने गाड़ी तेज भगाई लेकिन नरेंद्र शर्मा कूदकर गाड़ी पर चढ़ गए थे। आरोपी ड्राइवर और शर्मा के बीच हाथापाई हुई लेकिन शर्मा नीचे गिर गए थे। इसके बाद आरोपी ने ट्रैक्टर-ट्रॉली नरेंद्र शर्मा के ऊपर चढ़ा दी, जिससे उनकी मौत हो गई थी। जांच में सामने आया कि महज 300 रुपए प्रति ट्रॉली रेत भरकर यह अवैध सिंडिकेट चलाया जा रहा था।
केस का अपडेट क्या?
7 सितंबर 2018 का डिप्टी रेंजर सूबेदार सिंह कुशवाह केस:
25-26 नवंबर 2023 का पटवारी प्रसन्न सिंह बघेल केस:
पटवारी प्रसन्न सिंह बघेल
केस में क्या हुआ?
4 मई 2024 का एएसआई महेंद्र बागरी केस:
एएसआई महेंद्र बागरी
घटना के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन ने आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई की थी। मुख्य आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाया गया था। वहीं, सरकार ने ASI के परिवार को एक करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता और अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की मंजूरी भी दी थी।
केस का क्या अपडेट?
एक तरफ माफिया प्रदेश के अफसरों को कुचलकर मार रहा है, दूसरी तरफ मंत्री अपनी बातों से जले पर नमक छिड़कते हैं। मंत्री एदल सिंह कंषाना रेत माफिया को पेट माफिया कह चुके हैं। मंत्री का मानना है कि ये लोग कोई माफिया नहीं हैं, बस अपना पेट पालने के लिए काम करते हैं। मंत्री की मानें तो मुरैना जिले में माफिया नहीं है। उनके मुताबिक माफिया वो होता है जो किसी एक बड़े व्यक्ति या गिरोह के लिए काम करे। ये लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए रेत निकाल रहे हैं। अब इस पेट माफिया को क्या कहें जो पेट पालने के लिए किसी की जान लेने से भी परहेज नहीं करता।
हत्या का केस दर्ज हो
मनोचिकित्सक क्या बोले?
इस पर डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने बताया कि ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं और उनके मन से कानून का डर कम होता जा रहा है। जब कोई व्यक्ति अपने फायदे, अवैध कारोबार या अहंकार को कानून से ऊपर समझने लगता है, तो उसे रोकने वाला अधिकारी उसे व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि अपना दुश्मन लगने लगता है।
उन्होंने कहा कि कई बार ऐसी घटनाएं सिर्फ गुस्से में नहीं होतीं, बल्कि अपराधी किसी भी रुकावट को हटाने के लिए हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। यह मानसिक बीमारी से ज्यादा अपराधी सोच, सजा मिलने का डर खत्म होने और नैतिक जिम्मेदारी कमजोर पड़ने का मामला है।
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