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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- छतरपुर में कथित 30 हजार करोड़ रुपए के माइनिंग घोटाले पर हाईकोर्ट सख्त
- राज्य शासन ने अब तक केवल 19 करोड़ की रायल्टी चोरी की गणना की
- जनहित याचिकाकर्ताओं ने सीबीआई से निष्पक्ष जांच की मांग की
- 2007 के संयुक्त खनन समझौते और उसकी शर्तें विवाद के केंद्र में
- मामले की अगली सुनवाई 6 मार्च 2026 को होगी
INTRO
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में सामने आए कथित 30 हजार करोड़ रुपए के माइनिंग घोटाले ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। इस गंभीर आरोप को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य शासन और माइनिंग से जुड़े शीर्ष अधिकारियों से जवाब-तलब किया है।
जनहित याचिका में न सिर्फ रायल्टी चोरी बल्कि जांच दबाने और अधिकारियों की मिलीभगत के भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
NEWS IN DETAIL
हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया माइनिंग घोटाले का मामला
जबलपुर हाईकोर्ट ने छतरपुर जिले में सामने आए माइनिंग घोटाले के आरोपों को अत्यंत गंभीर मानते हुए राज्य शासन और संबंधित विभागों से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि प्रारंभिक तथ्यों में गड़बड़ी दिखती है, तो मामले की गहन जांच आवश्यक होगी। इसी क्रम में खनिज संसाधन विभाग के सचिव, मध्य प्रदेश स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक, कलेक्टर छतरपुर सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए हैं।
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जनहित याचिका से सामने आया मामला
यह मामला जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष लाया गया है, जिसे छतरपुर जिले की ग्राम पंचायत भैरा के सरपंच शिवराम दीक्षित और भोपाल के दिलीप सिंह ने दायर किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र में वर्षों से बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियां हो रही हैं, लेकिन उसके अनुपात में शासन को रायल्टी का लाभ नहीं मिल पाया। उनकी ओर से अधिवक्ता अंकित सक्सेना ने हाईकोर्ट के समक्ष पूरे प्रकरण की विस्तृत पृष्ठभूमि और दस्तावेजी तथ्यों को रखा।
2007 का समझौता बना विवाद की जड़
याचिका में बताया गया कि वर्ष 2007 में अनूपपुर की किसान मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड और मध्य प्रदेश स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन के बीच एक संयुक्त समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत कंपनी को हर वर्ष निर्धारित मात्रा में रायल्टी और डेवलपमेंट फीस शासन को जमा करना अनिवार्य था। साथ ही, खनन से जुड़े नियमों के पालन और वित्तीय सुरक्षा के लिए बैंक गारंटी के रूप में एफडी जमा करने की शर्त भी शामिल थी, जिसका पालन कथित रूप से नहीं किया गया।
19 करोड़ की गणना पर खड़े हुए बड़े सवाल
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि वर्ष 2021 में हुई जांच के बाद कंपनी पर केवल 19 करोड़ रुपए की रायल्टी चोरी का आकलन किया गया, जो वास्तविक खनन और बाजार मूल्य के मुकाबले बेहद कम है। याचिका में दावा किया गया कि इतने लंबे समय तक बड़े पैमाने पर हुए खनन को देखते हुए यह आंकड़ा वास्तविक नुकसान को नहीं दर्शाता। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि कहीं जानबूझकर नुकसान की राशि को कम करके तो नहीं दिखाया गया।
2024 की जांच दबाने का गंभीर आरोप
मामले को और गंभीर बनाते हुए याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में एक और जांच कराई गई थी, जिसमें रायल्टी चोरी और नियम उल्लंघन से जुड़े अहम तथ्य सामने आए थे। लेकिन इस जांच रिपोर्ट को कथित तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया और न ही उस पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। याचिका में कहा गया है कि यह सब कुछ विभागीय अधिकारियों और संबंधित कंपनी की मिलीभगत से किया गया।
30 हजार करोड़ के नुकसान का दावा
याचिकाकर्ताओं का स्पष्ट आरोप है कि शासन को हुआ वास्तविक नुकसान मात्र 19 करोड़ नहीं, बल्कि करीब 30 हजार करोड़ रुपए का है। यह नुकसान अवैध खनन, कम रायल्टी निर्धारण और वर्षों तक नियमों की अनदेखी का परिणाम बताया गया है। याचिका में कहा गया कि यदि इस राशि का सही आकलन हो, तो यह प्रदेश के सबसे बड़े माइनिंग घोटालों में से एक साबित हो सकता है।
सीबीआई जांच की उठी मांग
जनहित याचिका में यह भी कहा गया कि जब पूरे मामले में संबंधित विभागों और अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में हो, तब उन्हीं से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, विशेष रूप से सीबीआई से कराने की मांग की है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों पर कार्रवाई हो।
सरकार, माइनिंग डिपार्टमेंट और कलेक्टर को जारी हुए नोटिस
हाईकोर्ट ने इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार, मध्य प्रदेश स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन, कलेक्टर छतरपुर, किसान मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड सहित स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन भोपाल के अधिकारी आशुतोष तिमले को भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सभी पक्षों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पूरे रिकॉर्ड और तथ्यों के साथ अपना पक्ष हाईकोर्ट के सामने रखें।
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अब 6 मार्च 2026 को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 6 मार्च 2026 निर्धारित की है। इस सुनवाई में राज्य शासन और संबंधित विभागों के जवाबों के आधार पर आगे की दिशा तय होगी। प्रदेश के सबसे चर्चित माइनिंग मामलों में शामिल हुए इस प्रकरण पर अब प्रशासन, राजनीति और आम जनता तीनों की निगाहें टिकी हुई हैं।
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