रसूखदारों कब्जाधारकों के आगे झुका सिस्टम, हाईकोर्ट में रीवा कलेक्टर को खुद देना पड़ेगा जवाब

Neel Tiwari | Feb 04, 2026, 22:16 IST
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Rewa Collector
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रीवा में सरकारी जमीन पर कब्जे का मामला अब सत्ता, पैसा और प्रशासनिक मिलीभगत से जुड़ा है। हाईकोर्ट में खुलासा हुआ कि रसूखदारों के हित में सरकारी रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए।

News in short

  • मामला रीवा जिले के पूरस गांव की 20 एकड़ सरकारी भूमि से जुड़ा।
  • कब्जाधारी बताए जा रहे लोग आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर और करोड़पति।
  • आरोप-रसूखदारों के दबाव में प्रशासन ने आंखें मूंद लीं।
  • 1973-1980 का लैंड रिकॉर्ड नष्ट, तहसीलदार की रिपोर्ट से हुई पुष्टि।
  • हाईकोर्ट ने 24 फरवरी 2026 को रीवा कलेक्टर को किया तलब।

News in detail

रीवा में सरकारी जमीन पर कब्जे का मामला अब सत्ता, पैसा और प्रशासनिक मिलीभगत की कहानी बन गया है। हाईकोर्ट में खुलासा हुआ कि रसूखदार और करोड़पति लोगों के हित में सरकारी रिकॉर्ड तक नष्ट कर दिए गए। अब इस पूरे मामले में हाईकोर्ट की सख्ती के बीच रीवा कलेक्टर को खुद पेश होकर जवाब देना होगा।

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क्या है पूरा मामला

पूरा मामला रीवा जिले के पूरस गांव का है। लेकिन इसका असर पूरे प्रशासनिक ढांचे पर दिख रहे हैं। गांव की लगभग 20 एकड़ शासकीय भूमि, जिसमें 11 एकड़ का तालाब शामिल है, पर वर्षों से अवैध कब्जे का आरोप है। यह भूमि कानूनन कभी भी निजी स्वामित्व में नहीं दी जा सकती थी, फिर भी कुछ रसूखदार इसके मालिक बन गए। जांच के दौरान लैंड रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए, जिन्हें कभी भी नष्ट नहीं किया जाता।



करोड़पति कब्जाधारी और रसूख की ताकत

याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले लोग प्रभावशाली और करोड़पति हैं। इन्हीं रसूखदारों के कारण प्रशासनिक अधिकारी कार्रवाई नहीं कर पाए। आरोप है कि धन और प्रभाव के दम पर सिस्टम को अपने पक्ष में मोड़ा गया।

पूर्व सरपंच ने दबंगई से किया सरकारी जमीन पर कब्जा

इस पूरे मामले में गांव के पूर्व सरपंच गोपाल शरण तिवारी पर मुख्य भूमिका निभाने का आरोप है। कहा गया है कि उन्होंने अपने दबदबे का इस्तेमाल कर हल्का पटवारी, RI और SDM से मिलीभगत कर सरकारी जमीन पर कब्जा किया। फिर उसे अपने रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर आवंटित किया, जो जमीन के पात्र नहीं थे। इसके लिए खसरा नंबर 622, 826, 822, 1045 और 1046 का कथित तौर पर फर्जी आवंटन कराया गया।



प्रशासन पर दबाव और मिलीभगत के आरोप

कोर्ट में यह भी कहा गया कि हल्का पटवारी, तत्कालीन तहसीलदार और एसडीएम पर रसूखदारों का सीधा दबाव था। आरोप है कि प्रशासन ने या तो जानबूझकर आंखें मूंद लीं या फिर दबाव में आकर नियमों को ताक पर रख दिया। यही कारण रहा कि वर्षों तक सरकारी जमीन पर कब्जा बना रहा और कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

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सबूत मिटाने की कोशिश

मामला तब गंभीर हुआ जब 1973 से 1980 तक का लैंड रिकॉर्ड गायब या नष्ट पाया गया। यह रिकॉर्ड साबित कर सकता था कि जमीन शासकीय थी। कोर्ट ने इसे सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि साजिश माना। तहसीलदार की रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि लैंड रिकॉर्ड नष्ट हुए थे। लैंड रिकॉर्ड आमतौर पर नष्ट नहीं किए जाते। यह नहीं बताया गया कि किसके आदेश पर यह नष्ट हुए।

हाईकोर्ट की सख्ती: अब जिम्मेदारी तय होगी

3 फरवरी 2026 की सुनवाई में हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी रिकॉर्ड ऐसे ही नष्ट नहीं हो सकते। कोर्ट ने पूछा कि रिकॉर्ड किसके आदेश पर नष्ट हुए। इसके लिए किस अधिकारी ने अनुमति दी और दोषियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है।

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कलेक्टर को खुद देना होगा जवाब

हाईकोर्ट पहले ही कलेक्टर को पेश होने का निर्देश दे चुका था, लेकिन अनुपालन नहीं हुआ। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए 24 फरवरी 2026 को रीवा कलेक्टर प्रतिभा पाल को हलफनामा देने का आदेश दिया है। उन्हें सभी मूल रिकॉर्ड के साथ जवाब देना होगा।

कलेक्टर को यह स्पष्ट करना होगा कि रसूखदारों के दबाव के बावजूद प्रशासन ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। कलेक्टर को यह भी बताना होगा कि किसके आदेश पर लैंड रिकॉर्ड नष्ट किए गए, जो कभी नष्ट नहीं किए जा सकते। राजस्व मामलों के जानकारों के अनुसार, यह जवाब देना कलेक्टर के लिए मुश्किल होगा।

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रसूख बनाम कानून की परीक्षा

यह मामला अब सिर्फ जमीन या अतिक्रमण का नहीं रह गया है। यह रसूखदारों की ताकत और कानून की सख्ती के बीच सीधी टक्कर बन चुका है। सवाल यह है कि क्या करोड़पति कब्जाधारियों का दबदबा कानून से ऊपर रहेगा। या फिर हाईकोर्ट की सख्ती में प्रशासन को जवाबदेह बनना ही पड़ेगा। इसका फैसला अब आने वाली सुनवाई में तय होगा।

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