एमपी में मंत्री दर्जे पर फंसा पेंच: सरकार चाहे तो भी नहीं रोक पाएगी नेताओं की सुख-सुविधाएं!
Ramanand Tiwari | May 29, 2026, 07:30 IST
Photograph: (the sootr)
एमपी में निगम-मंडलों की नियुक्तियों के बाद मंत्री दर्जे पर पेंच फंसा। पुराने सरकारी नियम मंत्रियों जैसी सुख-सुविधाएं देने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश में निगम-मंडल, आयोग और प्राधिकरणों में हुई ताजा नियुक्तियों के बाद भाजपा संगठन में एक नई खींचतान शुरू हो गई है। बाहर से मामला सिर्फ पद बांटने का दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने असली लड़ाई अब मंत्री दर्जे और उससे मिलने वाली सुविधाओं पर अटक गई है।
सरकार फिलहाल खर्च और वीआईपी कल्चर कम करने का संदेश देना चाहती है, लेकिन कई नियुक्तियां ऐसी हैं जहां सरकार चाहकर भी पूरी तरह सुविधा कटौती नहीं कर सकती। वजह साफ है- कई निगम और आयोगों की बायोलॉजी यानी मूल नियमावली में ही अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री स्तर का दर्जा देने का प्रावधान मौजूद है। यानी राजनीतिक संदेश कुछ भी हो, लेकिन कानूनी ढांचा सरकार को बैकफुट पर ला सकता है।
लंबे इंतजार के बाद सरकार और संगठन ने करीब 60 नेताओं को निगम-मंडलों, आयोगों, बोर्ड और प्राधिकरणों में एडजस्ट किया। इन नियुक्तियों के जरिए क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठन में सक्रिय चेहरों को साधने की कोशिश की गई। लेकिन सूची जारी होते ही नेताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बन गया — क्या इस बार सिर्फ कुर्सी मिलेगी या मंत्री वाला रुतबा भी?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार इस बार मंत्री दर्जा देकर भी उससे जुड़ी सुविधाओं को सीमित करना चाहती है। लेकिन प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मामला इतना सीधा नहीं है। कई निगम-मंडलों और आयोगों की संरचना में ही स्पष्ट उल्लेख है कि अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को मंत्री स्तर की सुविधाएं मिलेंगी।
ऐसे में सरकार अगर दर्जा रोकती है या सुविधाएं सीमित करती है तो भविष्य में कानूनी और प्रशासनिक विवाद भी खड़े हो सकते हैं। यानी “सादगी मॉडल” दिखाने की कोशिश सरकार पर ही भारी पड़ सकती है।
मंत्री दर्जा मिलने के बाद पदाधिकारियों को सिर्फ सम्मान नहीं मिलता, बल्कि पूरा सरकारी प्रोटोकॉल सक्रिय हो जाता है। इन सुविधाओं में शामिल हैं:
सरकार एक तरफ खर्च कम करने और सादगी का संदेश देना चाहती है। दूसरी तरफ संगठन में वर्षों से सक्रिय नेताओं को संतुष्ट रखना भी मजबूरी है। क्योंकि निगम-मंडल की नियुक्तियां सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था नहीं मानी जातीं। भाजपा में इन्हें संगठन के वफादार चेहरों को “राजनीतिक इनाम” देने के तौर पर भी देखा जाता है। ऐसे में अगर दर्जा या सुविधाएं सीमित होती हैं तो अंदरखाने असंतोष बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
दिसंबर 2021 में जब निगम-मंडलों में नियुक्तियां हुई थीं, तब अधिकांश पदाधिकारियों को तुरंत कैबिनेट मंत्री और राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था। उस समय सरकारी गाड़ी, बंगला, स्टाफ और प्रोटोकॉल जैसी सुविधाएं भी तेजी से आवंटित हुई थीं।
लेकिन इस बार अब तक ऐसी कोई स्पष्ट घोषणा नहीं हुई है। इसी वजह से नई नियुक्तियों के बाद भी कई चेहरे “इंतजार मोड” में हैं।
नई सूची में 2021 के अधिकांश पदाधिकारियों को दोबारा मौका नहीं मिला। कुछ नेता संगठन में नई जिम्मेदारी पा चुके हैं, जबकि कई विधायक और मंत्री बन गए हैं। वहीं कई पुराने नाम इस बार पूरी तरह बाहर हो गए।
सूत्रों के मुताबिक आने वाले समय में और राजनीतिक नियुक्तियां हो सकती हैं।
इनमें शामिल हैं:
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सरकार फिलहाल खर्च और वीआईपी कल्चर कम करने का संदेश देना चाहती है, लेकिन कई नियुक्तियां ऐसी हैं जहां सरकार चाहकर भी पूरी तरह सुविधा कटौती नहीं कर सकती। वजह साफ है- कई निगम और आयोगों की बायोलॉजी यानी मूल नियमावली में ही अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री स्तर का दर्जा देने का प्रावधान मौजूद है। यानी राजनीतिक संदेश कुछ भी हो, लेकिन कानूनी ढांचा सरकार को बैकफुट पर ला सकता है।
पद तो दे दिया, अब दर्जे पर सस्पेंस क्यों?
सरकार की मुश्किल…कटौती करना इतना आसान नहीं
ऐसे में सरकार अगर दर्जा रोकती है या सुविधाएं सीमित करती है तो भविष्य में कानूनी और प्रशासनिक विवाद भी खड़े हो सकते हैं। यानी “सादगी मॉडल” दिखाने की कोशिश सरकार पर ही भारी पड़ सकती है।
आखिर मंत्री दर्जे में मिलता क्या है?
- सरकारी वाहन और चालक
- बंगला और कार्यालय
- स्टाफ और सुरक्षा गार्ड
- पेट्रोल-डीजल कोटा
- इलाज और मेडिकल सुविधा
- सरकारी यात्रा भत्ता
- कार्यालय संचालन के लिए अलग बजट
वीआईपी कल्चर खत्म या नाराजगी कंट्रोल?
2021 मॉडल और इस बार का फर्क
लेकिन इस बार अब तक ऐसी कोई स्पष्ट घोषणा नहीं हुई है। इसी वजह से नई नियुक्तियों के बाद भी कई चेहरे “इंतजार मोड” में हैं।
भाजपा ने नई सोशल और राजनीतिक इंजीनियरिंग आजमाई
नियुक्तियों का सिलसिला अभी खत्म नहीं
इनमें शामिल हैं:
- विश्वविद्यालयों की कार्यपरिषद
- जनभागीदारी समितियां
- 16 नगर निगमों में वरिष्ठ पार्षद
- विभिन्न विभागों के बोर्ड और संस्थान
समझिए पूरी कहानी का असली एंगल
- सरकार सादगी का संदेश देना चाहती है
- नेता मंत्री दर्जे और सुविधाओं का इंतजार कर रहे
- कई संस्थाओं के नियम सरकार को बांध रहे
- कानूनी प्रावधानों के कारण दर्जा रोकना आसान नहीं
- अंदरखाने संगठन संतुलन और नाराजगी दोनों का दबाव
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