नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता पर फिर सवाल, 22 में तीन अटके; खाली पदों ने खोली पोल

Ramanand Tiwari | Aug 23, 2026, 22:57 IST
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मध्यप्रदेश के 22 सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में से 3 को मान्यता नहीं मिली। कई कॉलेजों में प्राचार्य और फैकल्टी के पद खाली हैं। दस्तावेजों पर भी सवाल उठे हैं।

मध्यप्रदेश में नर्सिंग शिक्षा एक बार फिर सवालों के घेरे में है। निजी नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता और कथित अनियमितताओं को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। अब सरकारी नर्सिंग कॉलेजों की स्थिति ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। सत्र 2026-27 के लिए मान्यता आवेदन करने वाले 22 शासकीय नर्सिंग कॉलेजों में से तीन को मान्यता नहीं मिली, जबकि कई कॉलेजों में प्राचार्य, उप प्राचार्य और शैक्षणिक फैकल्टी के पद खाली बताए जा रहे हैं।

मामला केवल मान्यता मिलने या रुकने तक सीमित नहीं है। नर्सिंग जैसे पेशेवर पाठ्यक्रम में पढ़ाई के साथ क्लीनिकल ट्रेनिंग विद्यार्थियों के भविष्य की बुनियाद होती है। ऐसे में निर्धारित पद और पर्याप्त फैकल्टी नहीं होने की स्थिति सीधे शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करती है।

22 में तीन सरकारी कॉलेज मान्यता से बाहर

सत्र 2026-27 के लिए प्रदेश के 22 शासकीय नर्सिंग कॉलेजों ने मान्यता के लिए आवेदन किया था। इनमें भोपाल का बीएमएचआरसी नर्सिंग कॉलेज, अमरकंटक विश्वविद्यालय अनूपपुर का शासकीय नर्सिंग कॉलेज और दतिया का शासकीय नर्सिंग कॉलेज मान्यता हासिल नहीं कर सके।

एनएसयूआई प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार के अनुसार यह स्थिति सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में मान्यता के निर्धारित मानकों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सवाल यह भी है कि जब सरकारी संस्थानों को ही मान्यता के मानकों को पूरा करने में परेशानी आ रही है, तो वहां अध्ययनरत विद्यार्थियों को निर्धारित स्तर की शिक्षा और प्रशिक्षण कैसे मिल रहा है?

छह कॉलेजों में प्राचार्य नहीं, 10 में उप प्राचार्य का पद खाली

दावों के मुताबिक प्रदेश के छह शासकीय नर्सिंग कॉलेजों में प्राचार्य के पद खाली हैं, जबकि 10 कॉलेजों में उप प्राचार्य उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा 15 सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और ट्यूटर की संख्या वर्ष 2018 के शासन नियमों के अनुरूप नहीं होने की बात कही गई है।

यानी जिन संस्थानों पर गुणवत्तापूर्ण नर्सिंग शिक्षा की जिम्मेदारी है, उन्हीं में प्रशासनिक पदों और शैक्षणिक स्टाफ की कमी का दावा सामने आया है।

30 सीटों के लिए तय है फैकल्टी का ढांचा

वर्ष 2018 के शासन नियमों के अनुसार 30 सीटों के लिए एक प्राचार्य, एक उप प्राचार्य, दो एसोसिएट प्रोफेसर और तीन असिस्टेंट प्रोफेसर अथवा तीन ट्यूटर का प्रावधान बताया गया है। सीटों की संख्या बढ़ने के साथ इसी अनुपात में फैकल्टी बढ़ाई जानी होती है।

ऐसे में निर्धारित संख्या से कम स्टाफ वाले कॉलेजों में विद्यार्थियों की कक्षाओं, प्रैक्टिकल और क्लीनिकल ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मान्यता के दस्तावेजों पर भी सवाल

कुछ सरकारी नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता प्रक्रिया में जमा दस्तावेजों और अनुभव प्रमाण-पत्रों को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। दावा है कि कुछ संस्थानों में प्राचार्य, उप प्राचार्य और एसोसिएट प्रोफेसर के अनुभव से संबंधित कथित फर्जी या कूटरचित प्रमाण-पत्र लगाए गए।

बीएमएचआरसी नर्सिंग कॉलेज को लेकर एक असिस्टेंट प्रोफेसर को उप प्राचार्य और उप प्राचार्य को एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में दर्शाए जाने का दावा किया गया है। अमरकंटक विश्वविद्यालय के नर्सिंग कॉलेज के दस्तावेजों में भी अनुभव संबंधी प्रविष्टियों पर सवाल उठाए गए हैं।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं हुई है। संबंधित संस्थानों का पक्ष भी इस मामले में सामने नहीं आया है।

दो बार सीबीआई जांच के बाद भी क्यों कायम हैं सवाल?

मध्यप्रदेश की नर्सिंग शिक्षा पहले भी जांच और विवादों के कारण सुर्खियों में रही है। प्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों की दो बार सीबीआई जांच हो चुकी है और जांच के दौरान सरकारी कॉलेजों में भी कमियां सामने आने की बात कही गई थी।

यहीं से मौजूदा विवाद का सबसे बड़ा सवाल निकलता है-यदि पिछली जांचों में कमियां चिन्हित हुई थीं, तो क्या उन्हें पूरी तरह दूर किया गया?

क्या मान्यता देने से पहले कॉलेजों की फैकल्टी, प्रशासनिक पद, अनुभव प्रमाण-पत्र और क्लीनिकल ट्रेनिंग की व्यवस्था का वास्तविक सत्यापन हो रहा है?

पुराना विवाद, नए सवाल

नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता को लेकर मध्यप्रदेश में विवाद कोई नया मामला नहीं है। पहले निजी कॉलेजों की व्यवस्थाओं और मान्यता प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। जांचें हुईं, कार्रवाई की बातें सामने आईं और कई संस्थानों की मान्यता को लेकर भी स्थिति बदली।

अब सरकारी कॉलेजों में ही पदों की कमी और मान्यता संबंधी सवाल सामने आने से पूरी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़ा होता है।

कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने भी सरकारी नर्सिंग कॉलेजों की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकारी संस्थानों में ही मान्यता के नियमों के पालन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो नर्सिंग शिक्षा की पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल विद्यार्थियों के भविष्य का

नर्सिंग शिक्षा में केवल कक्षाएं पर्याप्त नहीं होतीं। प्रैक्टिकल, क्लीनिकल प्रशिक्षण, अनुभवी फैकल्टी और निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था विद्यार्थियों की पेशेवर तैयारी के लिए जरूरी हैं।

यदि कॉलेजों में पद खाली हैं, फैकल्टी निर्धारित संख्या में नहीं है और मान्यता दस्तावेजों पर भी सवाल उठ रहे हैं, तो इसका असर पढ़ाई से लेकर प्रशिक्षण और भविष्य की डिग्री प्रक्रिया तक पड़ सकता है।

खासकर उन विद्यार्थियों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन सकती है जो समय पर पाठ्यक्रम, परीक्षा, क्लीनिकल ट्रेनिंग और डिग्री पूरी होने की उम्मीद करते हैं।

अब कागजों की जांच से खुलेगा सच

मामले में मान्यता के लिए जमा दस्तावेजों, अनुभव प्रमाण-पत्रों और कॉलेजों में उपलब्ध फैकल्टी की वास्तविक स्थिति की जांच की मांग उठी है। हाईकोर्ट में याचिका दायर किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

अब पूरा मामला आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर रिकॉर्ड की जांच पर टिक गया है। यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी मिलती है तो जिम्मेदारी तय करनी होगी और यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो संबंधित संस्थानों की स्थिति भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करनी होगी।

मध्यप्रदेश की नर्सिंग शिक्षा पहले ही जांच और मान्यता विवादों का लंबा दौर देख चुकी है। ऐसे में 22 सरकारी कॉलेजों की मौजूदा तस्वीर एक पुराना सवाल फिर सामने ला रही है-दो-दो जांचों के बाद भी अगर कमियां बाकी हैं, तो सुधार की निगरानी आखिर कहां कमजोर पड़ रही है?

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