ओबीसी आरक्षण की कमांड अब आईएएस कविता बाटला के हाथ: 27% कोटे के मुकदमों की बनीं प्रभारी
Amresh Kushwaha | Mar 08, 2026, 08:26 IST
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मध्य प्रदेश सरकार ने 27% ओबीसी आरक्षण मामले में मजबूती के लिए आईएएस कविता बाटला को प्रभारी अधिकारी (OIC) नियुक्त किया है। साथ ही, नई एसओपी (SOP) जारी की है।
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण के 27% कोटे को लेकर लम्बे समय से कानूनी लड़ाई चल रही है। इस मामले को मजबूती से लड़ा जाए, इसके लिए सरकार ने प्रशासन में कुछ बदलाव किए हैं। इसके बदलाव के तहत 2020 बैच की आईएएस अधिकारी कविता बाटला को बड़ी जिम्मेदारी गई है। उन्हें हाईकोर्ट में चल रहे आरक्षण से जुड़े सभी मामलों का प्रभारी अधिकारी (OIC) बना दिया गया है।
आईएएस कविता बाटला वर्तमान में जबलपुर में ही संयुक्त आयुक्त के पद पर तैनात हैं। चूंकि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर में ही स्थित है, इसलिए सरकार ने स्थानीय स्तर पर समन्वय को बेहतर बनाने के लिए उन्हें यह कमान सौंपी है। इससे केस की हर छोटी-बड़ी अपडेट पर सीधे नजर रखी जा सकेगी।
सरकार ने केवल जिम्मेदारी ही नहीं सौंपी, बल्कि काम करने का एक स्पष्ट खाका यानी एसओपी (SOP) भी जारी किया है। इसके तहत आईएएस कविता बाटला को सुनवाई से पहले, सुनवाई के दौरान और कोर्ट के फैसले के बाद की पूरी प्रक्रिया को मॉनिटर करना होगा। उनका मुख्य काम कोर्ट में तथ्यों को मजबूती से रखना और कानूनी टीम के साथ तालमेल बिठाना होगा।
प्रभारी अधिकारी (OIC) के तौर पर कविता बाटला का सबसे बड़ा काम होगा याचिका में उठाए गए सवालों का सही तरीके से जवाब तैयार करना। उन्हें सभी जरूरी दस्तावेज, नियम और अधिसूचनाओं को एक साथ इकट्ठा करना होगा, ताकि महाधिवक्ता (Advocate General) या सरकारी वकीलों को कोर्ट में बहस के दौरान मजबूती मिल सके।
एसओपी में यह भी बताया गया है कि यदि कोर्ट राज्य सरकार के खिलाफ कोई आदेश देता है, तो प्रभारी अधिकारी को तुरंत विधि विभाग को सूचित करना होगा। आदेश की प्रमाणित प्रति लेने के लिए उन्हें उसी दिन या अगले दिन आवेदन करना होगा। इससे अगली कार्यवाही समय पर की जा सकेगी।
कोर्ट के आदेश के बाद कविता बाटला को अपनी विस्तृत रिपोर्ट के साथ सरकारी अधिवक्ता की राय भी विभाग को भेजनी होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्या फैसले को चुनौती दी जानी चाहिए या उसमें सुधार की आवश्यकता है। यह पूरी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि 27% ओबीसी आरक्षण के मामले में सरकार की ओर से कोई भी 'लीगल लूपहोल' न रह जाए।
2019 में, कमलनाथ सरकार ने ओबीसी के लिए आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने का फैसला लिया था। उनका तर्क था कि मध्यप्रदेश में ओबीसी की जनसंख्या लगभग 48% है, इसलिए 27% आरक्षण देना न्यायसंगत होगा।
इसके बाद, सरकार ने विधानसभा में एक अध्यादेश पेश किया। इसमें 27% ओबीसी आरक्षण को लागू करने की बात की गई। हालांकि, इस पर विभिन्न याचिकाएं दाखिल की गईं।
इसमें कहा गया कि आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक हो जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के जरिए स्थापित सीमा (इंदिरा साहनी केस, 1992) का उल्लंघन है। मई 2020 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27% ओबीसी आरक्षण पर स्टे (रोक) आदेश दे दिया।
वर्ष 2019 से लेकर 2025 तक, 27% ओबीसी आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों को नहीं मिल सका है। लाखों अभ्यर्थी पहले से चयनित हो चुके हैं, लेकिन कोर्ट में पेंडिंग पिटीशन्स के कारण उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिए गए हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि इस मामले में कोई रोक नहीं है। यदि राज्य सरकार चाहे तो नियुक्तियां कर सकती है।
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इसके बाद, सरकार ने विधानसभा में एक अध्यादेश पेश किया। इसमें 27% ओबीसी आरक्षण को लागू करने की बात की गई। हालांकि, इस पर विभिन्न याचिकाएं दाखिल की गईं।
इसमें कहा गया कि आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक हो जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के जरिए स्थापित सीमा (इंदिरा साहनी केस, 1992) का उल्लंघन है। मई 2020 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27% ओबीसी आरक्षण पर स्टे (रोक) आदेश दे दिया।
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