MP में आउटसोर्स कर्मचारियों का दर्द : ठेका कंपनियों की मनमानी और सरकार की चुप्पी

मध्य प्रदेश में 10 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है। ठेका कंपनियों की धांधली और सरकारी बेरुखी के खिलाफ अब कर्मचारी आंदोलन करेंगे।

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Sanjay Sharma
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Pain of outsourced employees in MP

Photograph: (the sootr)

News in Short

  • मध्य प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है।
  • समान काम के बदले वेतन में भारी विसंगति है, अदालतें पहले ही टिप्पणी कर चुकी हैं। 
  • आउटसोर्स कर्मचारी को श्रम कानून के तहत कोई सुरक्षा या सुविधा नहीं मिलती।
  • कर्मचारी अब आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं, 12 फरवरी को प्रदर्शन करेंगे।
  • सरकार और विभागों ने कर्मचारियों की समस्याओं को नजरअंदाज किया है। 

News in Detail

BHOPAL. देश भर में लागू श्रम कानूनों का मध्य प्रदेश में मजाक बन गया है। वजह है श्रम कानूनों के पालन में अधिकारियों की बेरुखी। प्रदेश में सरकारी विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है।

कम्पनियों के माध्यम से विभागों में ऑपरेटर, असिस्टेंट, चौकीदार, सुरक्षाकर्मी के रूप में सेवा देने वाले कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है। कंपनी विभागों से न्यूनतम दर वसूलती है, लेकिन यह राशि कर्मचारियों को नहीं देती। आउटसोर्स कर्मियों से नियमित और स्थायी कर्मचारियों से ज्यादा काम लिया जाता है और वेतन आधा भी नहीं मिलता।

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समान काम, लेकिन वेतन विसंगति 

समान काम के बदले समान वेतन की व्यवस्था मध्य प्रदेश में जमीनी हकीकत में नहीं बदल पा रही है। विभागों में नियमित, स्थायी, संविदा और आउटसोर्स कर्मियों के वेतन में भारी विसंगति है, जबकि ये कर्मचारी काम एक जैसा ही कर रहे हैं। 

कोर्ट की टिप्पणी का नहीं असर 

विभागों में एक समान काम के बदले समान वेतन न मिलने के मामलों में हाईकोर्ट बार-बार टिप्पणी कर चुका है। हाईकोर्ट द्वारा समान काम के बदले में वेतन विसंगति न करने की हिदायत भी दी गई है। इसके बावजूद विभागों में इस विसंगति को दूर करने कोई पहल नहीं हो पाई है। सरकार के स्तर पर भी इसके लिए सख्ती नहीं दिखाई जा रही है।

भविष्य की सुरक्षा भी कोसों दूर  

सरकारी विभागों के लिए सालों से काम कर रहे आउटसोर्स कर्मचारी भविष्य की चिंता में डूबे हैं। उन्हें श्रम कानून के मुताबिक ईपीएफ भी नहीं मिलता। कंपनियां साप्ताहिक अवकाश के बिना ही उनसे काम कराती हैं। यही नहीं छुट्टी लेने की स्थिति में वेतन में कटौती कर दी जाती है। दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में भी कंपनियां उन्हें कोई आर्थिक सहायता उपलब्ध नहीं करातीं।

अपील-आग्रह बेअसर, अब आंदोलन 

सरकारी विभाग, निकाय और संस्थाओं में 10 लाख से ज्यादा संविदा, आउटसोर्स और अस्थायी कर्मचारी हैं। ये कर्मचारी पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय प्रशासन, लोक निर्माण, पीएचई, बिजली कंपनी, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभागों में कार्यरत हैं। सालों से न्यूनतम वेतन की मांग पर विभाग और सरकार की बेरुखी से कर्मचारी अब आंदोलन की राह पर हैं।

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सरकार की बेरुखी से निराश कर्मचारी 

प्रदेश में आउटसोर्स कर्मचारी न्यूनतम वेतन की अनदेखी से अब आंदोलन की राह पर आ गए हैं। आल डिपार्टमेंट आउटसोर्स संयुक्त मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा और पंचायत कर्मचारी संघ का संरक्षक अमित सिंह कहना है 10 लाख से ज्यादा कर्मियों को अनसुना किया जा रहा है। कई बार प्रदेश सरकार से न्यूनतम वेतन की मांग की जा चुकी है। अस्थायी- आउटसोर्स कर्मचारी श्रम कानून के नए प्रावधानों से नाराज हैं। 12 फरवरी को ये कर्मचारी सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक प्रदर्शन करेंगे।

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