ROAMS पोर्टल के नाम पर 5 महीने से अटकी सैलरी,
द सूत्र पड़ताल: एमपी में ROAMS पोर्टल के नाम पर क्यों मचा बवाल? क्यों बनाया गया था पोर्टल?
Atul Dwivedi | Nov 06, 2026, 17:25 IST
ROAMS पोर्टल के नाम पर 5 महीने से अटकी सैलरी
दीपावली खुशियों और रोशनी का त्योहार है, लेकिन मध्यप्रदेश के हजारों आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए इस बार त्योहार की चमक फीकी पड़ सकती है। वजह है महीनों से अटकी सैलरी। कर्मचारियों की तनख्वाह अटकने के पीछे ROAMS पोर्टल को जिम्मेदार बताया जा रहा है। वहीं, कांग्रेस का आरोप है कि सरकार के पास वेतन देने के लिए फंड ही नहीं है।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कर्मचारियों की सैलरी पोर्टल की प्रक्रिया में उलझी है या मामला पैसों की कमी का है?
इस पूरे विवाद की तह तक जाने के लिए द सूत्र ने ROAMS पोर्टल की पड़ताल की। हमने जानने की कोशिश की कि आखिर यह पोर्टल क्यों बनाया गया? प्रदेश में कितने आउटसोर्स कर्मचारी काम कर रहे हैं? क्या वाकई उन्हें महीनों से वेतन नहीं मिला है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या सरकार के पास कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है?
मध्यप्रदेश में आखिर कितने आउटसोर्स कर्मचारी काम कर रहे हैं? हैरानी की बात यह है कि इस सवाल का भी कोई एक निश्चित आंकड़ा सामने नहीं आता। सरकार का दावा है कि ROAMS यानी रिसोर्स आउटसोर्सिंग एजेंसी मैनेजमेंट सिस्टम पोर्टल पर करीब डेढ़ लाख आउटसोर्स कर्मचारियों का डेटा दर्ज है। इस लिहाज से माना जा सकता है कि प्रदेश में कम से कम डेढ़ लाख आउटसोर्स कर्मचारी काम कर रहे हैं।
लेकिन ऑल डिपार्टमेंट आउटसोर्स संयुक्त संघर्ष मोर्चा का दावा इससे कहीं बड़ा है। मोर्चा के मुताबिक, प्रदेश के अलग-अलग सरकारी विभागों, निगमों और मंडलों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की संख्या करीब पांच लाख है। यानी कर्मचारियों की संख्या को लेकर ही सरकार और कर्मचारी संगठनों के दावों में बड़ा अंतर है। ऐसे में प्रदेश में कुल कितने आउटसोर्स कर्मचारी हैं, इसकी निश्चित संख्या बता पाना मुश्किल है।
इसका जवाब जानने के लिए द सूत्र ने आउटसोर्स संघर्ष मोर्चा समिति के वासुदेव शर्मा से बात की। वासुदेव शर्मा के मुताबिक, सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या आउटसोर्स कर्मचारियों के सही आंकड़ों की थी। सरकार के पास न तो कर्मचारियों की निश्चित संख्या थी और न ही इस बात की पूरी जानकारी कि किस कर्मचारी को कितना वेतन मिल रहा है।
इतना ही नहीं, आउटसोर्स कर्मचारियों के प्रबंधन को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए ROAMS पोर्टल बनाया गया। इसका मकसद अलग-अलग विभागों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध कराना था।
द सूत्र ने जब आउटसोर्स कर्मचारियों की अटकी सैलरी को लेकर पड़ताल की, तो कई गंभीर दावे सामने आए। आउटसोर्स संघर्ष मोर्चा समिति के वासुदेव शर्मा ने पुष्टि की कि कर्मचारियों को समय पर सैलरी नहीं मिल रही है। उनके मुताबिक, सबसे खराब स्थिति स्वास्थ्य विभाग की है।
शर्मा का दावा है कि स्वास्थ्य विभाग में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों को पिछले पांच से छह महीनों से वेतन नहीं मिला है। हालांकि, भोपाल जैसे बड़े जिलों में स्थिति कुछ बेहतर बताई जा रही है। यहां कर्मचारियों को देर-सवेर भुगतान हो जाता है, लेकिन दूसरे जिलों में कर्मचारियों की परेशानी सुनने वाला कोई नहीं है।
वासुदेव शर्मा का दावा है कि वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से एक आदेश जारी किया गया था। इसमें सभी विभागों को अपने यहां काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों का डेटा ROAMS पोर्टल पर दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे। आदेश के मुताबिक, पोर्टल पर डेटा दर्ज होने के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़नी थी। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि इसी प्रक्रिया के नाम पर उन्हें उलझाया जा रहा है। जिस पोर्टल को कर्मचारियों की व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए तैयार किया गया था, उसी के कारण अब उनका वेतन अटकने का दावा किया जा रहा है।
आउटसोर्स कर्मचारियों की अटकी सैलरी का मामला अब सियासी रंग भी ले चुका है। दीपावली के मौके पर कांग्रेस ने सरकार की आर्थिक स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं। PCC चीफ जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। जीतू का आरोप है कि दीपावली के मौके पर भी सरकार के पास कर्मचारियों को वेतन देने की व्यवस्था नहीं है। पटवारी का आरोप है कि ROAMS पोर्टल के नाम पर भुगतान की प्रक्रिया को उलझाया जा रहा है।
इस पूरे विवाद की तह तक जाने के लिए द सूत्र ने ROAMS पोर्टल की पड़ताल की। हमने जानने की कोशिश की कि आखिर यह पोर्टल क्यों बनाया गया? प्रदेश में कितने आउटसोर्स कर्मचारी काम कर रहे हैं? क्या वाकई उन्हें महीनों से वेतन नहीं मिला है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या सरकार के पास कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पैसा नहीं है?
प्रदेश में कितने आउटसोर्स कर्मचारी हैं?
लेकिन ऑल डिपार्टमेंट आउटसोर्स संयुक्त संघर्ष मोर्चा का दावा इससे कहीं बड़ा है। मोर्चा के मुताबिक, प्रदेश के अलग-अलग सरकारी विभागों, निगमों और मंडलों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की संख्या करीब पांच लाख है। यानी कर्मचारियों की संख्या को लेकर ही सरकार और कर्मचारी संगठनों के दावों में बड़ा अंतर है। ऐसे में प्रदेश में कुल कितने आउटसोर्स कर्मचारी हैं, इसकी निश्चित संख्या बता पाना मुश्किल है।
आखिर सरकार को क्यों बनाना पड़ा ROAMS पोर्टल?
इतना ही नहीं, आउटसोर्स कर्मचारियों के प्रबंधन को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए ROAMS पोर्टल बनाया गया। इसका मकसद अलग-अलग विभागों में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध कराना था।
ROAMS पोर्टल के नाम पर 5 महीने से अटकी सैलरी
ROAMS पोर्टल पर क्यों खड़ा हुआ विवाद?
शर्मा का दावा है कि स्वास्थ्य विभाग में काम करने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों को पिछले पांच से छह महीनों से वेतन नहीं मिला है। हालांकि, भोपाल जैसे बड़े जिलों में स्थिति कुछ बेहतर बताई जा रही है। यहां कर्मचारियों को देर-सवेर भुगतान हो जाता है, लेकिन दूसरे जिलों में कर्मचारियों की परेशानी सुनने वाला कोई नहीं है।
अब सवाल उठता है कि आखिर भुगतान अटका क्यों है?
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