पौने छह करोड़ फूंके, फिर भी ऑफलाइन मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग

मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने अपने कामकाज को डिजिटल बनाने के लिए करीब पौने छह करोड़ खर्च किए। इसके बावजूद, विभाग का कामकाज पुराने तरीके से ही चल रहा है। डिजिटल सिस्टम के दावे अब तक खाली साबित हुए हैं। सभी काम पारंपरिक तरीकों से ही हो रहे हैं।

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Ravi Awasthi
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News In Short

  • मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने तबादलों में पारदर्शिता के लिए पौने छह करोड़ खर्च किए।

  • पोर्टल 3.0 का निर्माण डिजिटल प्रक्रिया के लिए किया गया था, लेकिन असफल रहा।

  • केवल 39% शिक्षक ही ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग कर पाए।

  • तकनीकी खराबी से ई-अटेंडेंस प्रणाली भी प्रभावित हुई है।

  • पोर्टल 3.0 की लागत पर आईटी विशेषज्ञ भी हैरान हैं, पर इसे MIS बताया गया।

News In Detail

BHOPAL. मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने तबादलों में पारदर्शिता के लिए पौने छह करोड़ खर्च किए। विभाग ने कामकाज को डिजिटल बनाने का दावा किया था। इसके बवजूद, नतीजा वही पुराना रहा - फाइलें, सिफारिश और ऑफलाइन जोड़-तोड़।

करोड़ों की लागत से बना पोर्टल 3.0 बीते तबादला सत्र में फेल हो गया। हजारों शिक्षक ऑनलाइन आवेदन करने की उम्मीद में सिस्टम से जूझते रहे। विभाग डिजिटल इंडिया के नारे में उलझ कर रह गया।

अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, पहले एनआईसी और फिर एमपी एसईडीसी से परेशान होकर स्कूल शिक्षा विभाग ने निक्सी से मदद ली। सितंबर 2024 में हुए अनुबंध के तहत पोर्टल 3.0 की लागत 5 करोड़ 70 लाख 80 हजार 250 रुपए तय हुई। यह भी तय हुआ कि पोर्टल बनाने के बाद निक्सी अगले पांच साल तक इसकी देखरेख और सुधार करेगी।

11 October 2023 तक अपडेट मप्र एजुकेशन पोर्टल

कड़वे रहे विभागीय कर्मचारियों के अनुभव

पोर्टल बना भी और चालू भी हुआ, लेकिन इसके उपयोग को लेकर विभागीय अमले के अनुभव अब तक काफी कड़वे रहे हैं। बताया जाता है कि पोर्टल तैयार कराने का मूल मकसद विभागीय तबादलों की प्रक्रिया ऑनलाइन करने का था, ताकि पारदर्शिता का दावा कर विभाग तबादला कारोबार की बदनामी से बच सके।

विभागीय डिजिटल दावों का हाल यह कि नए पोर्टल 3.0 के लिए अनुबंध सितंबर 2024 में हुआ। वहीं, पूर्व के मप्र एजुकेशन पोर्टल 2.0 को अंतिम बार 11 अक्टूबर 2023 को अपडेट किया गया था।

39% शिक्षक ही कर पाए ऑनलाइन आवेदन

बीते साल लागू हुई तबादला नीति के दौरान विभाग में 11 हजार 584 शिक्षकों के तबादले किए गए। इनमें 3608 प्रशासकीय व शेष स्वैच्छिक थे। हैरत की बात यह कि विभाग ने ट्रांसफर चाहने वाले सभी आवेदकों से आवेदन ऑनलाइन भेजने को कहा था।

वहीं, 4503 अर्थात स्थानांतरित शिक्षकों के सिर्फ 39 प्रतिशत शिक्षक ही पोर्टल का उपयोग कर सके। बाकी पोर्टल की तकनीकी दिक्कतों का शिकार हुए। नतीजतन, अपने तबादलों के लिए उन्हें मजबूरन परंपरागत तरीका ही अपनाना पड़ा।

तय तिथि के बाद भी होते रहे तबादले

पोर्टल इस्तेमाल को लेकर कमोबेश यही स्थिति विभाग मुख्यालय की रही। इसके चलते विभाग में तय समय के बाद भी तबादले होते रहे। इसे लेकर कांग्रेस सदस्य जयवर्धन सिंह ने राज्य विधानसभा में सवाल भी उठाए।

दरअसल, राज्य सरकार ने बीते साल 30 अप्रैल को तबादला नीति को मंजूरी दी। 31 मई तक ही तबादलने करना तय किया। बाद में इसमें दो बार 17 दिन का इजाफा भी किया गया।

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सॉफ्टवेयर की खराबी से ई-अटेंडेंस में भी दिक्कतें

विभाग ने इसी पोर्टल के सहारे विभागीय कर्मचारियों व स्कूली शिक्षकों की ई-अटेंडेंस व्यवस्था भी जरूरी की है। वहीं, पोर्टल सॉफ्टवेयर कर्मचारियों का साथ नहीं दे रहा है। तकनीकी गड़बड़ी के चलते दूरदराज के स्कूलों में पदस्थ शिक्षक पढ़ाने का काम छोड़ पहले अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की समस्या से जूझ रहे हैं। इसे लेकर कई शिक्षकों ने विभाग के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में दस्तक भी दी है।

करोड़ों की लागत पर विशेषज्ञ भी हैरान

स्कूल शिक्षा विभाग के पोर्टल 3.0 की लागत को लेकर आईटी के जानकार भी हैरत में हैं। राज्य सरकार के ही एक अन्य विभाग में पदस्थ आईटी विशेषज्ञ शैलेंद्र सिंह ने कहा कि आमतौर पर इस तरह के पोर्टल चंद लाख रुपए में तैयार कराए जा सकते हैं।

कुछ संस्थाएं तकनीकी काम के साथ ही अपने तकनीशियंस, कर्मचारी, कार्यालय खर्च व देखरेख, मरम्मत की अवधि में होने वाले खर्च को जोड़कर भी लागत तय करती हैं।

उन्होंने कहा कि हो सकता है संबंधित विभाग ने कई और फीचर्स पोर्टल में एड कराए हों। फिर भी पौने 6 करोड़ की लागत हैरानी पैदा करने वाली है।

एमआईएस सिस्टम है पोर्टल 3.0: सहायक संचालक

इधर, मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग के सहायक संचालक नीरज सक्सेना कहते हैं- पोर्टल की लागत को लेकर हैरानी जैसी कोई बात नहीं है। यह सिर्फ तबादला पोर्टल नहीं, बल्कि समूचा मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम (MIS) है।

इसमें विभागीय कर्मचारियों के ट्रांसफर के साथ, उनकी अटेंडेंस, विभागीय लेखा-जोखा व दीगर कामकाज भी किए जाने हैं। पोर्टल की तकनीकी खामियों को लेकर उन्होंने कहा कि निक्सी से इसके लिए 5 साल का अनुबंध है।

विभागीय अपर संचालक की अहम भूमिका

मध्य प्रदेश सरकार के ज्यादातर विभाग आईटी कामकाजों के लिए एनआईसी या मप्र सरकार के उपक्रम एमपी एसईडीसी पर भरोसा जताते रहें हैं। वहीं, स्कूल शिक्षा विभाग ने लीक से हटकर निक्सी का दामन थामा।

बताया जाता है कि इस मामले में विभाग की अपर संचालक डॉ कामना आचार्य की अहम भूमिका है। पोर्टल 3.0 को लेकर द सूत्र ने जब डॉ आचार्य से जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो उन्होंने सहायक संचालक से बात करने को कहा। इससे पहले उन्हें फोन कॉल किए, व्हाट्सएप संदेश भेजा, लेकिन इसका भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

Sootr Knowledge

क्या है निक्सी संस्था

नेशनल इन्फार्मेशन सेंटर सर्विसेज इनकार्पोरेटेड (NICSI) तकनीशियंस उपलब्ध कराने वाली एक संस्था है। जो भारत सरकार के नेशनल इन्फार्मेशन सेंटर (NIC) के अधीन एक पीएसयू के तौर पर आईटी क्षेत्र में सेवा प्रदान करती है। जो सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों से अछूती नहीं है।

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