बच्चों की यूनिफॉर्म या ठेके का खेल? उमंग सिंघार ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
Ramanand Tiwari | Jun 17, 2026, 08:15 IST
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मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म वितरण पर भारी विवाद। उमंग सिंघार ने सरकार पर महिला स्व-सहायता समूहों का हक छीनकर निजी कंपनियों को ठेका देने का आरोप लगाया।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की यूनिफॉर्म अब सियासत के केंद्र में आ गई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया है कि यूनिफॉर्म वितरण में हो रही देरी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव का नतीजा है। उनका दावा है कि पहले जहां यह काम महिला स्व-सहायता समूहों के जरिए होता था, वहीं अब इसे निजी कंपनियों को सौंप दिया गया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस बदलाव से पारदर्शिता बढ़ेगी या फिर विवाद और गहराएंगे?
मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सरकार को घेरते हुए कहा कि गरीब परिवारों के बच्चों की जरूरतों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आधा शैक्षणिक सत्र बीतने के बाद भी बच्चों तक यूनिफॉर्म नहीं पहुंच पाई है। इससे सबसे ज्यादा परेशानी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को उठानी पड़ रही है।
सिंघार के मुताबिक, पहले स्कूल यूनिफॉर्म सिलाई और वितरण का काम महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से कराया जाता था।
इस व्यवस्था से ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिलता था और स्थानीय स्तर पर काम का निष्पादन भी होता था। विपक्ष का दावा है कि इस मॉडल से महिलाओं की आय बढ़ती थी और सामुदायिक भागीदारी भी सुनिश्चित होती थी।
नेता प्रतिपक्ष का आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था में यूनिफॉर्म की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को दी जा रही है। उनका कहना है कि इससे महिला समूहों के रोजगार पर असर पड़ा है। साथ ही यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि केंद्रीकृत ठेका व्यवस्था में जवाबदेही किसकी तय होगी, यदि वितरण में देरी होती है।
उमंग सिंघार ने सीधे तौर पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि निजी कंपनियों को बढ़ावा देने से लाभ किसे मिलेगा, इसकी जांच होनी चाहिए।
बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने उमंग सिंघार के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस पहले अपने घर की कलह सुलझाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार योजनाओं का संचालन पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कर रही है। जनता सब देख रही है और यह भी समझ रही है कि कौन विकास की राजनीति कर रहा है और कौन केवल आरोपों के सहारे राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटा है।
विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि यूनिफॉर्म का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद बच्चों को राहत देना होता है।
यदि शैक्षणिक सत्र का बड़ा हिस्सा गुजर जाने के बाद गणवेश मिलती है, तो योजना के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। विपक्ष इसी मुद्दे को सरकार की प्राथमिकता से जोड़कर देख रहा है।
सिंघार ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण की बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ महिला स्व-सहायता समूहों से काम वापस लिया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इससे हजारों महिलाओं की आय प्रभावित हो सकती है और बड़े ठेकेदारों को फायदा पहुंच सकता है।
यूनिफॉर्म वितरण में देरी का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का विषय बनता दिख रहा है।
यदि सरकार इस पर विस्तृत स्थिति स्पष्ट नहीं करती, तो मानसून सत्र में यह मामला जोर-शोर से उठ सकता है। विपक्ष पहले ही इसे बच्चों के हित, महिला रोजगार और सरकारी नीतियों से जोड़ चुका है।
यदि यूनिफॉर्म योजना का मकसद गरीब बच्चों की मदद और महिलाओं को आर्थिक अवसर देना था, तो क्या नई व्यवस्था दोनों उद्देश्यों को पूरा कर पाएगी? या फिर यह मुद्दा आने वाले दिनों में सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन जाएगा?
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क्या हैं नेता प्रतिपक्ष के आरोप?
उन्होंने आरोप लगाया कि आधा शैक्षणिक सत्र बीतने के बाद भी बच्चों तक यूनिफॉर्म नहीं पहुंच पाई है। इससे सबसे ज्यादा परेशानी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को उठानी पड़ रही है।
पहले क्या व्यवस्था थी?
इस व्यवस्था से ग्रामीण महिलाओं को रोजगार मिलता था और स्थानीय स्तर पर काम का निष्पादन भी होता था। विपक्ष का दावा है कि इस मॉडल से महिलाओं की आय बढ़ती थी और सामुदायिक भागीदारी भी सुनिश्चित होती थी।
अब क्या बदला है?
विपक्ष क्यों उठा रहा है भ्रष्टाचार का मुद्दा?
बीजेपी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने उमंग सिंघार के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस पहले अपने घर की कलह सुलझाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार योजनाओं का संचालन पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कर रही है। जनता सब देख रही है और यह भी समझ रही है कि कौन विकास की राजनीति कर रहा है और कौन केवल आरोपों के सहारे राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटा है।
सबसे बड़ा सवाल-बच्चे इंतजार क्यों करें?
यदि शैक्षणिक सत्र का बड़ा हिस्सा गुजर जाने के बाद गणवेश मिलती है, तो योजना के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। विपक्ष इसी मुद्दे को सरकार की प्राथमिकता से जोड़कर देख रहा है।
'नारी सम्मान' बनाम 'रोजगार का सवाल'
उन्होंने आरोप लगाया कि इससे हजारों महिलाओं की आय प्रभावित हो सकती है और बड़े ठेकेदारों को फायदा पहुंच सकता है।
अब आगे क्या होगा?
यदि सरकार इस पर विस्तृत स्थिति स्पष्ट नहीं करती, तो मानसून सत्र में यह मामला जोर-शोर से उठ सकता है। विपक्ष पहले ही इसे बच्चों के हित, महिला रोजगार और सरकारी नीतियों से जोड़ चुका है।
नेता प्रतिपक्ष के प्रमुख आरोप
- नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने यूनिफॉर्म वितरण में देरी पर सवाल उठाए।
- आरोप लगाया कि महिला समूहों से काम लेकर निजी कंपनियों को दिया गया।
- आधा शैक्षणिक सत्र बीतने के बावजूद बच्चों को गणवेश नहीं मिलने की बात कही।
- महिलाओं के रोजगार प्रभावित होने का दावा किया गया।
- विपक्ष ने ठेका व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए।
सबसे अहम सवाल
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