एमपी में आदिवासी विकास प्राधिकरण में कैबिनेट दर्जा सिर्फ नाम का?

मध्य प्रदेश के आदिवासी विकास प्राधिकरण का बजट और विकास कार्यों के लिए संघर्ष जारी है। सवाल यह है कि यह केवल कागजों में सक्रिय है या राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास?

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Ramanand Tiwari
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News in Short

  • शहरिया और भारिया विकास प्राधिकरण के पदाधिकारी बजट की मांग कर चुके हैं।
  • तीन साल में आदिवासी क्षेत्रों के लिए कोई बजट नहीं आवंटित हुआ।
  • एक ही कार्यालय और कुर्सी पर दो अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का काम चल रहा है।
  • पदाधिकारी मुख्यमंत्री से मिल चुके हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
  • सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह प्राधिकरण केवल कागजों में सक्रिय है, या यह चुनावी संतुलन साधने का प्रयास था।

News in Detail

मध्यप्रदेश के शहरिया और भारिया विकास प्राधिकरण के पदाधिकारियों ने कहा कि उन्होंने कई बार सीएम मोहन यादव से बजट की मांग की। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। स्थिति यह है कि एक कमरे में दो कैबिनेट दर्जा प्राप्त अध्यक्ष और एक राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त उपाध्यक्ष बैठते हैं। वे भी एक कुर्सी पर बारी-बारी से नेम प्लेट बदलकर बैठते हैं। तीन साल में आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए कोई बजट नहीं आवंटित हुआ।

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कौन हैं पदाधिकारी?

दिनेश कुमार अंगारिया,अध्यक्ष, मध्य प्रदेश राज्य स्तरीय भारिया विकास प्राधिकरण (कैबिनेट दर्जा)
तुरसनपाल बरैया- अध्यक्ष, मध्य प्रदेश राज्य स्तरीय शहरिया विकास प्राधिकरण (कैबिनेट दर्जा)
सीताराम आदिवासी- उपाध्यक्ष (राज्यमंत्री दर्जा), नियुक्ति लगभग 6 माह पूर्व।
दोनों अध्यक्षों की नियुक्ति वर्ष 2023 में हुई थी। मार्च-अप्रैल 2026 में उनका तीन वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने जा रहा है। आगामी आदेश तक वे पद पर बने रहेंगे।

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दर्जा ऊंचा, व्यवस्था शून्य

सरकार ने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए यह प्राधिकरण बनाया। कैबिनेट और राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया गया, लेकिन हकीकत यह है कि एक ही ऑफिस, एक ही कुर्सी और सीमित संसाधनों में पूरा काम चल रहा है। जब जो पदाधिकारी आता है, अपनी नेम प्लेट लगाकर उसी कुर्सी पर बैठ जाता है।

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दो कैबिनेट दर्जा प्राप्त अध्यक्ष

एक ही कमरे में साझा व्यवस्था।
2023 से अब तक विकास कार्यों के लिए शून्य बजट।
सैकड़ों पत्र शासन को भेजे, समाधान नहीं एक अध्यक्ष को पीएसओ, दूसरे को नहीं।
वाहन सुविधा है, लेकिन उपयोग सीमित कार्यकाल खत्म होने को, लेकिन हाथ खाली।
तीन साल का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। लेकिन न पर्याप्त स्टाफ मिला, न स्थायी ढांचा, न विकास योजनाओं के लिए बजट।

क्या यह प्राधिकरण सिर्फ कागजों में सक्रिय है?

शहरिया जनजाति ग्वालियर, अशोकनगर, गुना, दतिया, मुरैना, भिंड, श्योपुर और शिवपुरी में प्रमुख है। भारिया समुदाय नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट में अधिक है। पदाधिकारी इन क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी छोटी समस्याओं के समाधान के लिए बजट उपलब्ध नहीं है।

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मुख्यमंत्री तक गुहार, नतीजा सिफर

अध्यक्षों का कहना है कि वे कई बार मुख्यमंत्री से मिल चुके हैं। हजारों पत्र शासन और अधिकारियों को भेजे गए। लेकिन तीन साल में किसी भी पत्र पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह स्थिति प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती है। सुरक्षा और सुविधा में भी असमानता? सूत्रों के अनुसार एक अध्यक्ष को पीएसओ मिला है, जबकि दूसरे को अब तक सुरक्षा नहीं दी गई। उपाध्यक्ष की नियुक्ति छह माह पूर्व हुई, लेकिन व्यवस्थाएं अब भी सीमित हैं। कैबिनेट दर्जा होने के बावजूद समन्वय और सम्मान की कमी की शिकायतें सामने आ रही हैं।

क्या यह सिर्फ राजनीतिक संतुलन?

एमपी सरकार आदिवासी कल्याण और न्याय की बात करती है। लेकिन जब खुद प्राधिकरण के प्रमुख ही संसाधनों के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो समुदाय को क्या राहत मिल पाएगी? क्या यह सिर्फ चुनावी संतुलन साधने का निर्णय था?

खर्च हो रहा है, विकास नहीं

वाहन और आवास जैसी सामान्य सुविधाओं पर खर्च हो रहा है। लेकिन जमीनी विकास कार्यों के लिए अब तक एक रुपया भी जारी नहीं हुआ। तीनों पदाधिकारी खुलकर कहते हैं। हम दौरा कर रहे हैं, समस्याएं उठा रहे हैं, लेकिन बजट नहीं है।

बड़ा सवाल: जवाबदेही किसकी?

आदिवासी विकास प्राधिकरण: यदि तीन साल में आदिवासी क्षेत्रों के लिए कोई ठोस योजना लागू नहीं हो पाई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सरकार आगामी आदेशों में इस प्राधिकरण को सशक्त करेगी? या फिर यह संस्था सिर्फ दर्जा और पद तक सीमित रह जाएगी? मध्य प्रदेश में यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी विश्वास और राजनीतिक प्रतिबद्धता की परीक्षा बन चुका है।

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