सीएम डॉ. मोहन यादव बोले- यूसीसी पर मुस्लिम भाई-बहनों के भी आ रहे सुझाव, जल्द पास कराएंगे
Sanjay Gupta | Jun 19, 2026, 13:30 IST
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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शुक्रवार 19 जून को इंदौर पहुंचे। वे एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति के स्वागत के लिए आए थे। इसके बाद वे अलग-अलग कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इसी दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत की और यूसीसी को लेकर अहम बात कही।
मध्य प्रदेश के सीएम डॉ. मोहन यादव ने समान नागरिक संहिता ( UCC ) को लेकर अहम बात कही है। इंदौर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इसे विधानसभा के शीतकालीन सत्र से पहले पारित कराने की तैयारी कर रही है। उन्होंने बताया कि इसके लिए एक कमेटी बनाई गई है, जिसे अब तक लाखों सुझाव (यूसीसी लागू करने की तैयारी) मिल चुके हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि समान नागरिक संहिता उनकी सरकार का महत्वपूर्ण संकल्प है। उन्होंने कहा कि जब देश एक है तो अलग-अलग नागरिक कानूनों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि मध्य प्रदेश भी उन राज्यों में शामिल होने जा रहा है जो यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यूसीसी को लेकर गठित समिति लगातार प्रदेशभर से सुझाव प्राप्त कर रही है और अब तक लाखों लोगों ने अपने विचार साझा किए हैं।
उन्होंने कहा कि विभिन्न वर्गों के साथ-साथ मुस्लिम भाई-बहनों से भी कई सकारात्मक सुझाव मिले हैं। वे भी कानून के पक्ष में हैं। डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार आगामी शीतकालीन सत्र से पहले किसी भी हाल में यूसीसी विधेयक को पारित कराने का पूरा प्रयास करेगी।
प्रस्तावित नियम उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल की तरह हो सकते हैं। इसमें लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन जरूरी किया जा सकता है, यानी जो लोग साथ रह रहे हैं, उन्हें रजिस्ट्रार के पास जाकर अपनी जानकारी दर्ज करानी होगी।
इसके अलावा, लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को कानूनी अधिकार मिलेंगे। साथ ही महिला को भरण-पोषण का दावा करने का भी हक होगा।
हालांकि एमपी में इसे लागू करना आसान नहीं दिख रहा है। यहां लगभग 21% जनजातीय आबादी है, जिनकी अपनी परंपराएं हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या इन जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखा जाएगा।
मध्य प्रदेश जनजातीय आबादी वाला राज्य है। यहां लगभग 21% लोग अनुसूचित जनजातियों से हैं। यहां 46 से ज्यादा जनजातियां अपनी परंपराओं के साथ रहती हैं।
उत्तराखंड में ये आंकड़ा 2.9% और गुजरात में लगभग 15% है। इन दोनों राज्यों ने जनजातीय समुदाय को यूसीसी से बाहर रखा है क्योंकि यह उनके संवैधानिक अधिकारों में शामिल है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या मध्य प्रदेश भी ऐसा करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला जनजातीय आबादी और चुनावी प्रभाव से जुड़ा हुआ है।
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अगर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाता है तो भी कानून सख्त है। एक महीने से ज्यादा बिना रजिस्ट्रेशन के साथ रहने पर तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।
वहीं अगर कोई कपल रजिस्ट्रेशन में गलत जानकारी देता है, तो उसे तीन महीने तक की जेल या 25 हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है।
इसके अलावा रजिस्ट्रार का नोटिस मिलने के बाद भी रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाता है, तो सजा और बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में छह महीने तक की जेल और 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
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यूसीसी पर यह बोले सीएम यादव
मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि मध्य प्रदेश भी उन राज्यों में शामिल होने जा रहा है जो यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यूसीसी को लेकर गठित समिति लगातार प्रदेशभर से सुझाव प्राप्त कर रही है और अब तक लाखों लोगों ने अपने विचार साझा किए हैं।
उन्होंने कहा कि विभिन्न वर्गों के साथ-साथ मुस्लिम भाई-बहनों से भी कई सकारात्मक सुझाव मिले हैं। वे भी कानून के पक्ष में हैं। डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार आगामी शीतकालीन सत्र से पहले किसी भी हाल में यूसीसी विधेयक को पारित कराने का पूरा प्रयास करेगी।
एमपी में यूसीसी लागू करना आसान नहीं
इसके अलावा, लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को कानूनी अधिकार मिलेंगे। साथ ही महिला को भरण-पोषण का दावा करने का भी हक होगा।
हालांकि एमपी में इसे लागू करना आसान नहीं दिख रहा है। यहां लगभग 21% जनजातीय आबादी है, जिनकी अपनी परंपराएं हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या इन जनजातियों को यूसीसी से बाहर रखा जाएगा।
मध्य प्रदेश में 21% लोग अनुसूचित जनजातियों से
उत्तराखंड में ये आंकड़ा 2.9% और गुजरात में लगभग 15% है। इन दोनों राज्यों ने जनजातीय समुदाय को यूसीसी से बाहर रखा है क्योंकि यह उनके संवैधानिक अधिकारों में शामिल है।
अब सवाल ये उठता है कि क्या मध्य प्रदेश भी ऐसा करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला जनजातीय आबादी और चुनावी प्रभाव से जुड़ा हुआ है।
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यदि UCC लागू होगा तो क्या होगा?
- मध्य प्रदेश में अगर यूसीसी लागू होता है, तो लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो सकता है। यानी जो जोड़े सहमति से साथ रहते हैं, उन्हें नजदीकी रजिस्ट्रार के पास जाकर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा।
- अगर उत्तराखंड मॉडल अपनाया जाता है तो लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को विवाह जैसा अधिकार मिल सकता है। इन जोड़ों को रजिस्ट्रार को अपनी जानकारी देनी होगी ताकि यह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो सके।
- वहीं अगर प्रदेश का कोई निवासी दूसरे राज्य में लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो वह भी राज्य के रजिस्ट्रार को सूचना दे सकता है।
- कुछ मामलों में रजिस्ट्रेशन नहीं होगा, जैसे भाई-बहन का रिश्ता, पहले से शादीशुदा होना, नाबालिग होना, या रिश्ता दबाव या धोखे में बनाना।
- रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने के बाद रजिस्ट्रार इसकी जांच करेगा। जरूरत पड़ी तो दोनों को बुलाया जा सकता है और 30 दिनों के अंदर निर्णय लिया जाएगा।
- लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा। साथ ही उन्हें शादीशुदा जोड़ों के बच्चों की तरह कानूनी अधिकार मिलेंगे।
- अगर रिश्ता खत्म हो जाता है, तो जोड़े को रजिस्ट्रार को सूचना देनी होगी। कोई जोड़ा 21 साल से कम उम्र का है तो उनके माता-पिता को भी जानकारी दी जाएगी।
- किसी परिस्थितिमें अगर महिला को उसका साथी छोड़ देता है, तो वह अदालत में भरण-पोषण का दावा कर सकती है। उसे कानूनी सुरक्षा भी मिलेगी।
- रजिस्ट्रार को सूचना मिलने पर वह जांच करेगा और दोनों को नोटिस जारी कर सकता है।
रजिस्ट्रेशन न कराने पर भी कानून सख्त
वहीं अगर कोई कपल रजिस्ट्रेशन में गलत जानकारी देता है, तो उसे तीन महीने तक की जेल या 25 हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है।
इसके अलावा रजिस्ट्रार का नोटिस मिलने के बाद भी रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाता है, तो सजा और बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में छह महीने तक की जेल और 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
फैमिली काउंसलर शैल अवस्थी ने इस बारे में अपनी टिप्पणी दी है। कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देना एक अच्छा कदम हो सकता है। इसके साथ ही कपल की सुरक्षा को सुनिश्चित करना और प्रक्रिया को आसान बनाना भी जरूरी है।
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