2 लाख की गाड़ी 6 लाख में! वीडियो वायरल होने के बाद ACS संजय दुबे की सफाई, बोले- 392 अफसरों पर की कार्रवाई
Sumit Kumar | Oct 25, 2026, 17:09 IST
नगरीय निकायों में महंगी खरीदी का वीडियो वायरल होने के बाद ACS संजय दुबे ने 392 अधिकारियों पर कार्रवाई का दावा किया।
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में महंगी खरीदी का प्रेजेंटेशन वायरल होने के बाद नया बयान आया है। अपर मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे ने पहली बार इस मामले में सफाई दी है। उन्होंने दावा किया कि विभाग पहले से अनियमितताओं पर कार्रवाई कर रहा है। अब तक 392 अधिकारी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। इनमें करीब 135 मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) भी शामिल हैं।
वीडियो वायरल होने के बाद दी सफाई
प्रेजेंटेशन के वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर सरकारी खरीदी को लेकर सवाल उठने लगे। विभाग के पास गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे। अब संजय दुबे ने कहा कि प्रशिक्षण का उद्देश्य अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियां समझाना था। उन्हें बताया गया था कि विभाग उनकी खरीदी और खर्च की निगरानी कैसे करता है।
नगरीय निकायों में खरीदी की गड़बड़ियों का प्रेजेंटेशन वायरल होने के बाद ACS संजय दुबे ने पहली बार सफाई दी है।दुबे बोले- सरकार अनियमितताओं को लेकर सख्त है। अब तक 392 अधिकारी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। इनमें 135 CMO भी शामिल हैं।#MPNews #SanjayDubey #Bhopal https://t.co/8GwhFfS3w9
— sumit kumar (@eyeamsumit) October 25, 2026
ACS बोले- 392 अधिकारी कार्रवाई के दायरे में
कुछ अधिकारियों से गलत भुगतान की रकम वसूली गई है। कई लोगों की वेतनवृद्धि रोकी गई है। गंभीर मामलों में पदावनति और बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई भी हुई है। दुबे ने कहा कि कार्रवाई का आधार अनियमितता और लापरवाही की गंभीरता रही है। हालांकि सभी 392 अधिकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई का अलग-अलग विवरण उन्होंने नहीं दिया।
ट्रेनिंग से पहले 146 पर हो चुकी थी कार्रवाई
विभाग ने 80 से ज्यादा ठेकेदारों और सप्लायरों के खिलाफ भी कार्रवाई की थी। इन पर गलत तरीके या गलत दरों पर सामग्री उपलब्ध कराने के मामले थे। दुबे के मुताबिक यह प्रक्रिया प्रशिक्षण से पहले शुरू हो चुकी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनियमितताओं के खिलाफ कार्रवाई अभी भी जारी है।
प्रेजेंटेशन में कहा था- हमें सब पता है
उन्होंने अधिकारियों को चेताया था कि वे खरीदी की जानकारी छिपी होने की गलतफहमी में न रहें। विभाग को यह भी पता है कि कौन सा निकाय कहां और कितना गलत खर्च कर रहा है। उन्होंने बताया था कि यह जानकारी उनके कंप्यूटर पर भी उपलब्ध है।
तब कहा था- पिछले साल ज्यादा ध्यान नहीं दिया
अब नए बयान में दुबे ने बताया कि कार्रवाई पहले से जारी थी। उन्होंने प्रशिक्षण से पहले की कार्रवाई के आंकड़े भी सामने रखे हैं। ऐसे में सवाल है कि विभाग को महंगी खरीदी की जानकारी कब मिली थी। इन मामलों में कितने अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई और कितनी रकम वसूली गई?
दो लाख की कचरा गाड़ी छह लाख में खरीदी
दूसरी गाड़ी के साथ चार डस्टबिन भी जोड़े गए थे। इसके बावजूद दोनों की कीमत में चार लाख रुपए का अंतर था। दुबे ने आशंका जताई थी कि अतिरिक्त सामान जोड़कर गाड़ी की कीमत बढ़ाई गई। उन्होंने अपने परिचित लोगों के जरिए खरीदी कराने की आशंका भी जताई थी।
बैठक में डेढ़ करोड़ रुपए तक की कचरा गाड़ियां खरीदने का मामला भी उठाया गया था। दुबे के मुताबिक कुछ निकायों में इतनी गाड़ियां चलाने के लिए पर्याप्त वार्ड भी नहीं थे। उन्होंने इन वाहनों के इस्तेमाल और उनकी वास्तविक जरूरत पर सवाल उठाए थे।
200 LED बल्ब का बिल 60 लाख रुपए
इस हिसाब से एक बल्ब की कीमत करीब 30 हजार रुपए बैठती है। प्रेजेंटेशन में 60 वाट की LED लाइट की दरों में भी बड़ा अंतर सामने आया था। एक निकाय में इसकी कीमत 306 रुपए दर्ज थी। भोपाल में इसी श्रेणी की लाइट 11 हजार 800 रुपए में खरीदी गई थी।
सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले केमिकल की कीमतों में भी भारी अंतर बताया गया था। एक जगह इसकी दर पांच रुपए प्रति लीटर दर्ज थी। दूसरी जगह इसी तरह के केमिकल की कीमत 33 हजार 500 रुपए बताई गई थी। हालांकि दोनों खरीदी की मात्रा और तकनीकी जानकारी की पूरी पुष्टि जरूरी है।
374 निकायों ने खर्च किए 1,134 करोड़
जांच में एक जैसी सामग्री की कीमतों में बड़ा अंतर सामने आया था। अलग-अलग निकायों ने समान श्रेणी के सामान के लिए अलग-अलग रकम चुकाई थी। विभाग का अनुमान था कि औसत दरों पर खरीदी होती तो करीब 250 करोड़ रुपए बच सकते थे।
यह रकम कुल खरीदी का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि यह संभावित बचत का अनुमान है। इसे सीधे 250 करोड़ रुपए का प्रमाणित घोटाला नहीं कहा जा सकता।
AI से पकड़ी गई खरीदी की गड़बड़ियां?
दुबे के मुताबिक एक रुपए का भुगतान भी ई-नगरपालिका की व्यवस्था से होता है। सरकारी खरीदी के लिए GeM पोर्टल का इस्तेमाल अनिवार्य है। विभाग दोनों सिस्टम में दर्ज आंकड़ों का मिलान करता है। इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से एक जैसी सामग्री की खरीदी दरों की तुलना होती है।
इससे पता चलता है कि किस निकाय ने कौन सा सामान कितनी कीमत पर खरीदा। एक ही सप्लायर की अलग-अलग निकायों में दर्ज दरों की जांच भी होती है। असामान्य कीमतों की पहचान होने पर संबंधित खरीदी की पड़ताल की जा सकती है।
संजय दुबे के मुताबिक विभाग में रोजाना करीब 1,000 से 1,500 खरीदी के ऑर्डर जारी होते हैं। इनमें पांच रुपए की छोटी सामग्री से लेकर बड़े निर्माण कार्य भी शामिल हैं। कई काम 50 करोड़ से 500 करोड़ रुपए तक के होते हैं।
इतने बड़े डेटा की हर रोज मैन्युअल जांच करना आसान नहीं है। इसलिए विभाग ने तकनीक और एआई की मदद ली है। इससे खरीदी की दरों और भुगतान में संभावित गड़बड़ियों की पहचान की जा रही है।
ट्रेनिंग में साइबर सुरक्षा पर भी चर्चा
कार्यक्रम में संकेत भोंडवे ने साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरों पर जानकारी दी थी। करीब 2,500 लोगों की लॉगिन जानकारी लीक होने का मामला भी सामने आया था। इसमें सरकारी कर्मचारियों की यूजर आईडी और पासवर्ड शामिल होने की जानकारी दी गई थी।
अधिकारियों को सरकारी खातों की सुरक्षा और पासवर्ड के गलत इस्तेमाल से जुड़े खतरे समझाए गए थे।
ACS बोले- सरकारी पैसे का दुरुपयोग नहीं हो
इस पैसे का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए जिसके लिए राशि दी गई है। निकायों की अपनी कमाई भी लोगों की जरूरतों पर खर्च होनी चाहिए। विभाग इसी मकसद से खरीदी और भुगतान की निगरानी कर रहा है।
ACS ने कार्रवाई के आंकड़े और सरकार की सख्ती का पक्ष सामने रखा है। हालांकि चर्चित कचरा गाड़ी और LED बल्ब खरीद के मामलों में कार्रवाई का अलग विवरण नहीं दिया। ऐसे में इन मामलों की जांच और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल अभी बाकी हैं।
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