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Photograph: (thesootr)
News In Short
25% वोटर्स को 'लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी' और 'अनमैप्ड' श्रेणी में रखा गया है।
वोटर लिस्ट से नाम कटने का खतरा, जानकारी न होने से भ्रम और डर।
सजप ने चुनाव आयोग से सूची सार्वजनिक करने की मांग की।
पश्चिम बंगाल में प्रक्रिया अपनाई गई थी, मध्यप्रदेश में नहीं।
कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल, राजनीतिक आधार पर नाम हटाने का आरोप।
News In Detail
BHOPAL. अगर किसी का नाम वोटर लिस्ट से कट गया तो वह वोट नहीं डाल पाएगा। यही डर इस वक्त मध्यप्रदेश के कई वोटर्स के मन में बैठ गया है। वजह है वोटर लिस्ट में वह प्रक्रिया, जिसकी जानकारी आम लोगों से छुपी हुई है।
प्रदेश में बड़ी संख्या में वोटर्स ऐसे हैं, जिनके नाम बिना सार्वजनिक जानकारी के हटाए जा सकते हैं। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल करीब 25 प्रतिशत वोटर्स ऐसे हैं, जिन पर नाम कटने का खतरा बना हुआ है।
अब इसे लेकर समाजवादी जन परिषद (सजप) ने हरदा और बैतूल कलेक्टर समेत मध्यप्रदेश के चुनाव आयोग से मांग की है कि पश्चिम बंगाल की तरह मध्यप्रदेश में भी ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ और ‘अनमैप्ड वोटर्स’ की पूरी सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि कोई भी मतदाता अंधेरे में न रहे।
25% वोटर क्यों खतरे में हैं?
सजप के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अनुराग मोदी ने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और सभी आयुक्तों को ई-मेल के जरिए पत्र भेजा है। उनका कहना है कि ड्राफ्ट लिस्ट में शामिल वोटर्स में से ही करीब 25 प्रतिशत वोटर्स को ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ या ‘अनमैप्ड’ की श्रेणी में डाल दिया गया है।
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आप समझिए सीधी बात
यदि किसी वोटर का नाम इन श्रेणियों में चला गया और उसे जानकारी नहीं मिली तो उसका नाम लिस्ट से हट सकता है। अनुराग मोदी स्थिति को समझाने के लिए बैतूल विधानसभा का उदाहरण देते हैं। उन्होंने बताया कि बैतूल विधानसभा में कुल 2 लाख 48 हजार वोटर्स हैं।
इनमें से करीब 40 हजार वोटर्स ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ की श्रेणी में हैं। करीब 7 हजार वोटर्स ‘अनमैप्ड’ बताए जा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद इन मतदाताओं की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इससे आम वोटर्स में भ्रम और डर की स्थिति बन रही है।
‘अनमैप्ड’ मतदाता कौन हैं?
इसे बेहद आसान भाषा में समझिए। मान लीजिए 2002 की वोटर लिस्ट एक आधार किताब है। जब नए वोटर जुड़े तो उनका नाम या तो उसी 2002 की सूची से जुड़ा या फिर मां-बाप, दादा-दादी जैसे किसी परिवारजन के नाम से जुड़ा। अनमैप्ड वोटर वे होते हैं, जिनका नाम 2002 की सूची से नहीं जुड़ पा रहा है और न ही किसी माता-पिता या परिवार के सदस्य से कनेक्ट हो रहा है।
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सरल उदाहरण यह है...
रमेश का नाम आज की वोटर लिस्ट में है, लेकिन 2002 की सूची में रमेश का नाम नहीं है। उसके माता-पिता या किसी परिजन का नाम भी उस सूची में नहीं मिलता है। नियम कहता है कि इस वोटर की जड़ नहीं मिल रही। यही वोटर ‘अनमैप्ड’ कहलाता है।
‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ क्या होती है?
यहां समस्या नाम की नहीं, जानकारी की गड़बड़ी की होती है। मतदाता सूची में हर व्यक्ति को उसके परिवार से जोड़ा जाता है...मां, पिता, पति, पत्नी, दादा, नाना के आधार पर। जब यह जानकारी तर्क के हिसाब से गलत हो जाती है तो उसे ‘लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी’ कहा जाता है।
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सरल उदाहरण यह है...
किसी वोटर की उम्र 30 साल है, लेकिन उसके पिता की उम्र 32 साल दर्ज है। किसी महिला की उम्र 25 साल है और उसके बेटे की उम्र 28 साल लिखी है। किसी व्यक्ति को अपने ही बेटे का पिता बताया गया है। ऐसी जानकारी तर्क से मेल नहीं खाती, इसलिए सिस्टम उसे गड़बड़ी मानता है और यही स्थिति ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ कहलाती है।
चिंता की असली वजह क्या है?
अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रीपेंसी वाले वोटर्स के नाम यह कहकर हटाए जा सकते हैं कि रिकॉर्ड सही नहीं है। कई बार गलती वोटर की नहीं, बल्कि पुराने रिकॉर्ड या डेटा एंट्री की होती है, लेकिन जब तक सूची सार्वजनिक नहीं होगी, वोटर को पता ही नहीं चलेगा कि उसका नाम खतरे में है।
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पश्चिम बंगाल में क्या हुआ?
सजप ने चुनाव आयोग से पूछा है कि जब पश्चिम बंगाल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हुआ है तो मध्यप्रदेश में वही प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जा रही।
अनुराग मोदी ने बताया कि पश्चिम बंगाल के मामले में चुनाव आयोग ने साफ निर्देश दिए थे कि 24 जनवरी 2026 तक ‘Logical Discrepancies’ और ‘Unmapped’ श्रेणी में आने वाले वोटर्स के नाम ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और शहरी वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से लगाए जाएं। सजप का कहना है कि मध्यप्रदेश में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजनीतिक आधार पर नाम हटाने का आरोप
अनुराग मोदी ने आरोप लगाया कि उन्हें ऐसी जानकारी मिल रही है कि राजनीतिक आधार पर वोटर्स के नाम हटाए जा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि फॉर्म-6 और फॉर्म-7 का इस्तेमाल कर बड़ी संख्या में विपक्षी मतदाताओं के नाम कटवाने की कोशिश की जा रही है।
आंकड़ों पर भी सवाल
मध्यप्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी की ओर से जारी दैनिक बुलेटिन के मुताबिक 22 जनवरी 2026 तक पूरे प्रदेश में 7,929 फॉर्म-6 और 4,666 फॉर्म-7 प्राप्त हुए हैं। सजप का कहना है कि जमीनी हकीकत इससे अलग है। हर जिले और विधानसभा से हजारों फॉर्म जमा हुए हैं, लेकिन वे आंकड़ों में नजर नहीं आ रहे हैं। इससे वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सजप की तीन मांगें...
- ‘Logical Discrepancies’ और ‘Unmapped’ वोटर्स की सूची तुरंत सार्वजनिक की जाए।
- राजनीतिक आधार पर किसी भी वोटर का नाम हटाने की कोशिश रोकी जाए।
- पूरी SIR प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दलों को शामिल कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल
सजप ने इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस की चुप्पी को भी कटघरे में खड़ा किया है। अनुराग मोदी ने कहा कि एक तरफ राहुल गांधी वोट चोरी की बात करते हैं, लेकिन प्रदेश और जिला स्तर पर कांग्रेस सिर्फ बयान जारी कर संतुष्ट दिख रही है। उनका आरोप है कि जमीन पर कांग्रेस निष्क्रिय नजर आ रही है।
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