मध्यप्रदेश में पेयजल पर संकट, ओंकारेश्वर बांध में 10 साल में सबसे कम पानी, मालवा-निमाड़ के बांध 26 से 73% खाली
Amresh Kushwaha | Oct 09, 2026, 10:00 IST
मध्य प्रदेश में इस मानसून सत्र के दौरान हुई असमान बारिश का असर।
इस बार की असमान बारिश ने मध्यप्रदेश के बांधों में बड़ा फर्क पैदा कर दिया है। पूर्वी मध्य प्रदेश के लगभग सभी बांध लबालब हैं। लेकिन पश्चिमी हिस्से यानी मालवा-निमाड़ के ज्यादातर प्रमुख जलाशय रीते रह गए हैं। यह स्थिति गर्मियों में जल संकट बढ़ा सकती है। अगले तीन महीने में रबी सीजन भी शुरू होगा। तब किसानों के सामने सिंचाई का सवाल खड़ा होगा।
ओंकारेश्वर बांध की हालत
पिछले साल इसी अवधि में यह बांध करीब 85 से 90 फीसदी भरा था। यानी इस बार फर्क बहुत बड़ा है। तालिका के मुताबिक एफटीएल (Full Tank Level) 196.60 मीटर है। मौजूदा जलस्तर 194.46 मीटर है। बांध करीब 2.14 मीटर खाली है।
कम बारिश के साथ एक और वजह बताई गई है। इस बार इंदिरा सागर के गेट नहीं खुले थे। इसलिए ओंकारेश्वर में पानी कम आया है।
इंदिरा सागर और गांधी सागर
मंदसौर का गांधी सागर बांध भी अधूरा रहा। यह बांध हर साल कई बार छलकता है। लेकिन इस बार इसके गेट भी नहीं खुले थे। बांध सिर्फ 74.09 फीसदी भर सका है। पिछले साल यह लगभग पूरी क्षमता तक भर गया था।
एफटीएल 399.90 मीटर है, जबकि जलस्तर 396.97 मीटर है। इसका असर राजस्थान में भी दिखेगा। इस बांध का आधा पानी राजस्थान को मिलता है।
रायसेन के बांधों का हाल
दाहोद बांध 33.61 फीसदी खाली है। पिछले साल यह बांध 90 से 100 फीसदी भरा था। यानी मध्य क्षेत्र में भी बांधों की हालत पूरी तरह एक जैसी नहीं है।
पूर्वी क्षेत्र के बांध लबालब
इस तरह एक ही प्रदेश में दो अलग तस्वीरें दिखती हैं। पूर्व में पानी भरपूर है। पश्चिम में पानी कम है।
जल मंत्री का बयान
पेयजल आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बाद किसानों की जरूरत पूरी की जाएगी। फिर उद्योगों को पानी मिलेगा।
रबी में सिंचाई पर असर
ओंकारेश्वर की नहरों पर खंडवा, खरगोन, धार और बड़वानी के करीब दो लाख किसान निर्भर हैं। गांधी सागर की नहर प्रणाली से मप्र और राजस्थान के बड़े कृषि क्षेत्र जुड़े हैं। बारना से रायसेन और सीहोर के करीब 80 हजार किसानों की सिंचाई होती है।
गर्मियों में पेयजल का खतरा
इसका असर इंदौर, उज्जैन, खंडवा, देवास, पीथमपुर और ओबेदुल्लागंज पर पड़ सकता है। आसपास के इलाके भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए गर्मियों के लिए पीने का पानी अभी से बचाना होगा।
ग्वालियर-चंबल में राहत
शिवपुरी का मड़ीखेड़ा 99.17 फीसदी भरा है। मुरैना का पगारा बांध 95.86 फीसदी भरा है। ग्वालियर शहर की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत तिघरा बांध है। वह 94.38 फीसदी भरा है। यानी शहर की जलापूर्ति पर खास असर नहीं पड़ेगा।
अब आगे क्या होगा?
मान लीजिए गर्मी में बारिश देर से आए। तब बांधों में बचा पानी और कीमती हो जाएगा। इसलिए अभी से बचत की योजना जरूरी है। सरकार की रणनीति का असर आने वाले महीनों में दिखेगा।
FAQs
- ओंकारेश्वर बांध की वर्तमान स्थिति क्या है?
ओंकारेश्वर बांध में पानी की स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि यह इस बार अपनी कुल क्षमता का सिर्फ 26.78 फीसदी भरा है, जो पिछले साल की तुलना में काफी कम है। - मध्यप्रदेश में कम पानी होने से किस-किस क्षेत्र पर असर पड़ेगा?
कम पानी की वजह से खंडवा, खरगोन, धार और बड़वानी क्षेत्रों के करीब दो लाख किसान प्रभावित होंगे। इसके अलावा, इंदौर, उज्जैन, खंडवा जैसी शहरों में पेयजल की सप्लाई पर भी दबाव पड़ेगा। - कम बारिश का मध्यप्रदेश में क्या प्रभाव पड़ेगा?
कम बारिश के चलते जल प्रबंधन एक चुनौती बन जाएगा। किसानों को फसल का चुनाव सोच-समझकर करना होगा और पेयजल की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे रबी फसलों की सिंचाई में भी समस्या आ सकती है।
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