टीईटी के इंतजार में युवा, नियमितिकरण के इंतजार में संविदा, सरकार के सामने दो चुनौतियां ?
Harish Divekar | Jun 04, 2026, 07:00 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश में मोहन सरकार के सामने शिक्षा और स्वास्थ्य जगत से दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। टीईटी पास युवा और संविदा स्वास्थ्यकर्मी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर आए हैं। सवाल यही है कि सरकार इनसे कैसे निपटेगी।
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नमस्कार
ये बात है शिक्षक पात्रता परीक्षा की और संविदा स्वास्थ्य कर्मियों की। इन दोनों ही व्यवस्थाओं से जुड़े लोग संघर्ष के लिए मजबूर हैं। दोनों के संघर्ष की टाइम लाइन अगर देखें तो कई साल लंबी नजर आएगी। पहले बात करते हैं शिक्षक पात्रता परीक्षा की। इस परीक्षा का हाल ये है कि ये हो तो भी मुश्किल और अगर न हो तो भी मुश्किल।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला शिक्षक पात्रता परीक्षा जरूरी
अप्रैल माह में तकरीबन पचास हजार शिक्षकों ने भोपाल में डेरा डाला था। अध्यापक शिक्षक संयुक्त मोर्चा के तहत सब एकजुट हुए और शिक्षक पात्रता परीक्षा को अनिवार्य करने पर नाराजगी जाहिर की। असल में ये परीक्षा उन शिक्षकों को भी देना अनिवार्य है जो पहले से नौकरी कर रहे हैं। इसी बात पर अध्यापक और शिक्षकों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जब उनके पास लंबा एक्सपीरियंस हो चुका है तो परीक्षा की जरूरत क्या है। ये तो शिक्षकों का पक्ष हो गया है।
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परीक्षा हो तो भी मुश्किल और न हो तो भी मुश्किल
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लेकिन सरकार पर्याप्त शिक्षक भर्ती निकालना तो छोड़ों इन्हें अतिथि शिक्षक भी नहीं बना रहीं बिना TET वालों को अतिथि बना रखा है
कैसे मिलेगी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा?@DrMohanYadav51 @udaypratapmp @schooledump pic.twitter.com/Zi4CoRX51Q
— मध्यप्रदेश युवा (@MPyuva06) June 2, 2026
बेरोजगार युवाओं के पत्र ने बढ़ाई टेंशन
इस पत्र को देखकर ये तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी ऑफिशियल संगठन की ओर से ये पत्र नहीं लिखा गया है। लेकिन सरकार इस पर एक परसेंट भी अमल करने के बारे में सोचती है तो क्या होगा। क्या और ज्यादा विरोध नहीं भड़केगा। मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ नहीं हूं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला है तो जो कहा गया है वो लागू होना चाहिए।
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युवाओं की मांग पर भी उठ रहे सवाल
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इधर 32 हजार संविदा स्वास्थ्यकर्मी भी सड़क पर
संविदा स्वास्थ्यकर्मियों ने 25 मई से काली पट्टी बांधकर काम करना शुरू कर दिया था। दो दिन ऐसा करने के बाद कलेक्टर, सीएमएचओ और बीएमओ को ज्ञापन सौंपा। इस तरह उनका आंदोलन स्टेप बाय स्टेप आगे बढ़ता रहा। दो जून को स्वास्थ्यकर्मी ऑनलाइन और ऑफ लाइन काम भी बंद कर चुके हैं। अब आठ जून को एमपी के संविदा स्वास्थ्यकर्मी सीएम हाउस के घेराव की तैयारी में हैं।
संविदा स्वास्थ्यकर्मियों को हलके में लेना बड़ी गलती साबित हो सकता है। सिर्फ इलाज को छोड़ दें तो उसके अलावा स्वास्थ्य से जुड़े कई कामों की कमान इन्हीं के हाथ में होती है। इनकी हड़ताल की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ेगा। डिजिटल हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ेगा। जो लोग अलग अलग योजनाओं के तहत इलाज कराने जा रहे हैं. उन्हें योजना का लाभ मिलने में देरी हो सकती है।
यानी सरकार के सामने दो अलग अलग और बड़े मुद्दे हैं। दोनों ही शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हैं. और, युवाओं से सीधा वास्ता रखते हैं। इसलिए इन दोनों पर फैसला लेना और सही तरीके से फैसला लेना सरकार की बड़ी मजबूरी और चुनौती दोनों हैं।
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