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News in Short
- ग्वालियर-चंबल संभाग में PMJJBY में जिंदा लोगों को मृत बताकर बीमा क्लेम पास करने का फर्जीवाड़ा उजागर हुआ।
- इस मामले पर 5 अगस्त 2025 को ग्वालियर के कांग्रेस विधायक डॉ. सतीश सिकरवार ने विधानसभा में सवाल उठाया था।
- EOW की जांच में आठ मामले सामने आए हैं। जिंदा व्यक्तियों को मृत दिखाकर बीमा कंपनियों से क्लेम निकाला गया।
- ईओडब्ल्यू अब 10-12 हजार दावों की जांच कर रहा है। पूरी जांच से यह मामला बड़े घोटाले का रूप ले सकता है।
- सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों ने विधानसभा को सही जानकारी क्यों नहीं दी।
News in Detail
MP के ग्वालियर-चंबल संभाग में PMJJBY में उजागर हुए जिंदा को मरा बताने के खेल को लेकर अफसरों की भूमिका कटघरे में है। दरअसल, यह मामला सात महीने पहले ही राज्य विधानसभा में उठ चुका था। लेकिन तब आए वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा के जवाब में इस तथ्य को तरीके से छिपा दिया गया। EOW की शुरुआती ताजा कार्रवाई ने इस फर्जीवाड़े की कलई खोल दी है।
अगस्त में पूछा गया था सीधा सवाल
ग्वालियर के कांग्रेस विधायक डॉ. सतीश सिकरवार ने 5 अगस्त 2025 को विधानसभा में प्रश्न पूछा था। उन्होंने प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना में संभावित फर्जीवाड़े की जानकारी मांगी। सवाल था, क्या योजना के तहत जिंदा लोगों को मृत दिखाकर बीमा क्लेम पास किए गए हैं। इसका जवाब दिसंबर में विधानसभा के पावस सत्र के समय आया।
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सदन में अफसरों ने दिया गोलमोल जवाब
सवाल के जवाब में वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने सदन में उत्तर पेश किया। उत्तर में किसी भी घोटाले से साफ इनकार किया गया। जवाब में लिखा गया जी नहीं, बैंकों द्वारा इस प्रकार का कोई क्लेम भुगतान नहीं किया गया।
प्रश्न बैंकों का नहीं, बीमा कंपनियों द्वारा किए गए भुगतानों से जुड़ा था। जानकारों का कहना है कि यहीं पर जिम्मेदार अफसरों ने तथ्य बदलकर पेश किए। पूरे मामले को तकनीकी शब्दों के जाल में उलझाकर नकार दिया।
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तो सात महीने पहले खुल जाता घोटाला
अगर विधानसभा में सवाल उठने के बाद जांच होती, तो PMJJBY फर्जीवाड़ा सात महीने पहले ही खुल सकता था। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने तथ्य नहीं पेश किए। न ही कोई सतर्कता दिखाई गई। उलटे, जवाब में घोटाला नहीं बताया गया और मामले को दबा दिया गया।
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अब ईओडब्ल्यू ने खोली पोल
ईओडब्ल्यू ग्वालियर की जांच ने अफसरों के दावों की पोल खोल दी है। अब तक आठ प्रकरण सामने आ चुके हैं, जिनमें जिंदा व्यक्तियों को मृत दिखाकर बीमा कंपनियों से दो-दो लाख रुपए का क्लेम निकाला गया। जांच एजेंसी ने पांच साल के 10 से 12 हजार दावा प्रकरणों को स्कैन किया है। इसे संगठित गिरोह द्वारा अंजाम दिया गया फर्जीवाड़ा माना जा रहा है।
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अफसरों की भूमिका कटघरे में
सबसे बड़ा सवाल अब जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर है। जिन विभागों और अफसरों को विधानसभा में सटीक और तथ्यपरक जानकारी देनी थी, उन्होंने या तो जांच ही नहीं की या जानबूझकर गलत जानकारी दी। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने वाली नगरीय निकाय शाखाएं, संबंधित बैंक और बीमा कंपनियों से समन्वय करने वाले अफसर सभी की भूमिका अब संदेह के घेरे में है।
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आगे और खुलासों की आशंका
ईओडब्ल्यू फिलहाल 10–12 हजार दावों की जांच कर रहा है, जबकि योजना में बीते साल अगस्त तक 15 लाख,80 हजार 889 हितग्राही पंजीकृत हैं। इनमें अधिकांश को क्लेम भुगतान भी हुआ। यदि पूरे डाटा की गहन पड़ताल हुई, तो यह मामला कहीं बड़े घोटाले का रूप ले सकता है। तब यह भी साफ होगा कि विधानसभा को गुमराह करने की जिम्मेदारी किन अफसरों पर तय होगी।
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