एमपी में रसूखदार बाबुओं के आगे बेबस सिस्टम, आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित

मध्यप्रदेश में अधिकारी वर्षों तक डेप्युटेशन पर जमे रहते हैं। इससे प्रशासनिक सिस्टम कमजोर हो रहा है। विभागीय आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहते हैं। रसूखदार अफसरों का दबाव आदेशों को लागू नहीं होने देता है।

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Ramanand Tiwari
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News In Short

  • कई अफसर सालों से डेप्युटेशन पर जमे हुए हैं, सिस्टम को कमजोर कर रहे हैं।

  • राजनीति और रसूख के कारण अधिकारी मलाईदार कुर्सियों से हटने को तैयार नहीं हैं।

  • तीन साल की सीमा के बावजूद अफसर पांच साल तक एक ही पद पर जमे रहते हैं।

  • नगर निगमों में 400-500 अफसर डेप्युटेशन पर तैनात हैं, भोपाल में 90 अफसर हैं।

  • प्रशासनिक संतुलन बिगड़ चुका है, आयुक्त के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है।

News In Detail

BHOPAL. मध्यप्रदेश में कई सालों से कुछ अधिकारी और कर्मचारी एक ही विभाग में डेप्युटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर काम कर रहे हैं। इन अधिकारियों को अफसरों के निर्देशों के बावजूद भी अपने मूल विभाग में नहीं लौटना हो रहा है।

डेप्युटेशन पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, पीडब्ल्यूडी, पीएचई, एरिगेशन, भवन विकास निगम, नगरीय विकास जैसे कई विभागों में अफसर सालों से जमे हुए हैं। ये अफसर अपनी आरामदायक और अहम सीट छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

वहीं, कुछ अधिकारी और कर्मचारी नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषदों में भी सालों से जमे हुए हैं, जो सिस्टम को भीतर से कमजोर कर रहे हैं।

मलाईदार विभागों में खूटा ठोकते रसूखदार अफसर

डेप्युटेशन पर आए कई अफसर ऐसे हैं, जो अपने राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख के दम पर नगरीय निकायों की मलाईदार कुर्सियों पर अपना खूटा ठोक लेते हैं। एक बार पदस्थ होने के बाद वे मूल विभाग लौटने को तैयार ही नहीं होते हैं।

जिम्मेदार अफसर चाहकर भी नहीं कर पा रहे कार्रवाई

हालात बहुत बिगड़ चुके हैं। जिम्मेदार अफसर अपने कर्मचारियों को वापस भेजने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, रसूखदार अफसरों के आगे उनकी शरीफी आड़े आ जाती है। नतीजा- आदेश निकलते हैं, लेकिन अमल नहीं होता है।

तीन साल की सीमा, पर सालों का कब्जा

नियम साफ है कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी तीन साल से ज्यादा समय तक डेप्युटेशन पर नहीं रह सकता है। इसके बावजूद नगरीय निकायों में ऐसे अफसर मौजूद हैं, जो 5 साल से एक ही कुर्सी पर जमे हुए हैं।

प्रदेशभर में फैला डेप्युटेशन का जाल

प्रदेश में 16 नगर निगम, 98 नगर पालिकाएं और 294 नगर परिषदें हैं। शायद ही कोई ऐसा निकाय हो, जहां किसी न किसी विभाग का कर्मचारी डेप्युटेशन पर पदस्थ न हो। खासकर नगर निगमों में बाहरी विभागों का दखल सबसे ज्यादा है।

500 तक बाहरी अफसर, अकेले भोपाल में 90 अफसर मौजूद हैं। जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के 16 नगर निगमों में करीब 400 से 500 अधिकारी-कर्मचारी ऐसे हैं, जो अपने मूल विभाग छोड़कर वर्षों से डेप्युटेशन पर जमे हैं। अकेले भोपाल नगर निगम में ही लगभग 90 अफसर-कर्मचारी इसी श्रेणी में आते हैं।

प्रभारी पदों पर भी डेप्युटेशन वाले

चौंकाने वाली बात यह है कि कई डेप्युटेशन वाले अधिकारी न सिर्फ पदस्थ हैं, बल्कि बड़े-बड़े पदों के प्रभारी भी बने हुए हैं। इससे मूल विभागों का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। साथ ही, प्रशासनिक संतुलन बिगड़ चुका है।

सूचियां भी अपडेट नहीं, सिस्टम अंधेरे में

कई विभागों में यह तक स्पष्ट नहीं है कि कौन-कौन से अधिकारी डेप्युटेशन पर कहां पदस्थ हैं। पूरी और अपडेट सूची का अभाव खुद सिस्टम की कमजोरी को उजागर करता है।

नगरीय प्रशासन ने मांगी जानकारी, जवाब अधूरा

हाल ही में नगरीय प्रशासन संचालनालय ने प्रदेश के 413 निकायों से रिपोर्ट मांगी थी। ये रिपोर्ट तीन साल से अधिक समय से डेप्युटेशन पर जमे कर्मचारियों की थी। वहीं, अब तक किसी नगर निगम ने पूरी जानकारी नहीं भेजी है। अधिकतर ने आधी-अधूरी रिपोर्ट भेजकर बस औपचारिकता निभाई है।

आयुक्त के निर्देश, पर नतीजा सिफर

नगरीय विकास विभाग के आयुक्त संकेत भोंडवे ने जुलाई 2025 में निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि सभी निगमों को बाहरी अमले को वापस भेजना है। इसके बावजूद, हालात वैसी की वैसी बने हुए हैं। कोई बदलाव नहीं आया है।

फेस रिकग्निशन से उम्मीद की किरण

आयुक्त संकेत भोंडवे का कहना है कि स्थापना से जुड़ी अव्यवस्था विभाग की पुरानी समस्या है। फेस रिकग्निशन जैसे तकनीकी उपायों से यह सामने आएगा कि कौन अधिकारी कहां पदस्थ है। इसके बाद ठोस कार्रवाई की जाएगी।

सवाल सरकार से

एक तरफ सरकार सिस्टम सुधारने के प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर रसूखदार अफसर उन प्रयासों को जी का जंजाल बना रहे हैं। बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार डेप्युटेशन व्यवस्था पर कब निर्णायक प्रहार करेगी? या फिर आदेश यूं ही निकलते रहेंगे और मलाईदार कुर्सियों पर वही चेहरे जमे रहेंगे?

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