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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- 2018 में चुनाव से ठीक पहले शिलान्यास, पांच साल में पूरी होने का दावा।
- 2245 करोड़ की परियोजना ई-टेंडर घोटाले व अग्रिम भुगतान विवाद में फंसी, मामला EOW तक पहुंचा।
- ठेकेदार कंपनी के डायरेक्टर की ईडी गिरफ्तारी से काम पूरी तरह ठप।
- वन भूमि व पर्यावरणीय क्लीयरेंस वर्षों से केंद्रीय मंत्रालय में लंबित।
- हर चुनाव से पहले नए वादे,लेकिन जमीन पर न नहर बनी,न पंप हाउस।
मध्यप्रदेश में ग्वालियर–चंबल की मां रतनगढ़ बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना सात साल बाद भी अधर में है। चुनाव से पहले शिलान्यास, ई-टेंडर घोटाला, एजेंसियों की जांच और अब पर्यावरणीय मंजूरी की अड़चन के कारण 78 हजार हेक्टेयर में सिंचाई का सपना अधूरा है।
NEWS IN DETAIL
राजनीतिक दल चुनावी मौसम में विकास के किस तरह के सपने दिखाते हैं, इसकी मिसाल मध्यप्रदेश की मां रतनगढ़ सिंचाई परियोजना बन चुकी है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में आचार संहिता लागू होने से सिर्फ 24 घंटे पहले इस परियोजना के शिलान्यास के लिए नारियल फोड़ा गया।
दावा किया गया था कि 2023 के अगले चुनाव से पहले परियोजना पूरी हो जाएगी। किसानों का जीवन बदलेगा, क्षेत्र खुशहाल होगा। विडंबना यह कि सात साल में काम एक कदम भी ठोस रूप से आगे नहीं बढ़ सका।
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घोटालों में फंसी परियोजना
मध्य प्रदेश में ग्वालियर–चंबल क्षेत्र की महत्वाकांक्षी मां रतनगढ़ बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजना सात साल बाद भी जमीन पर उतर नहीं सकी है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह दावा करते हुए परियोजना का शिलान्यास किया गया था कि इससे दतिया, भिंड और ग्वालियर की 78 हजार हेक्टेयर से रकबे को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इससे क्षेत्र की तस्वीर बदल जाएगी। हकीकत यह है कि परियोजना पहले ​अग्रिम भुगतान विवाद और फिर ई-टेंडर घोटाले की भेंट चढ़ गई। अब यह परियोजना बरसों से पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार कर रही है।
सात साल में सात कदम भी नहीं
सूत्रों के मुताबिक, परियोजना के लिए आवश्यक वन भूमि व पर्यावरणीय क्लीयरेंस की फाइल लंबे समय से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में अटकी है। नहरों और पंप हाउस से जुड़े जो शुरुआती काम शुरू हुए, वे भी बजट की कमी के चलते अधूरे रह गए।
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सियासी बदलाव और घोटाले ने रोकी रफ्तार
करीब 2245 करोड़ रुपए की शुरुआती लागत वाली इस परियोजना की शुरुआत ही विवादों में रही। 2020 में दतिया जिले के सेवढ़ा क्षेत्र में पंप हाउस और नहर प्रणाली के लिए 831 करोड़ रुपए का ठेका मेंटेना विशिष्ट माइक्रो जेवी कंपनी को दिया गया। काम शुरू होने से पहले ही कंपनी को 412 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया। विभागीय जांच में आरोप सही पाए गए और मामला ईओडब्ल्यू को सौंपा गया।
इसी दौरान कंपनी के डायरेक्टर श्रीनिवास राजू को एक अन्य मामले में ईडी ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। बाद में ई-टेंडर घोटाले के खुलासे और फिर कोविड काल के चलते परियोजना से जुड़े सभी काम ठप हो गए।
नया चुनाव, पुराने वादे
2023 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर परियोजना को लेकर सियासत गरमाई। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मई 2023 में डबरा विकासखंड के देवगढ़-बिलौआ क्षेत्र में नहर प्रणाली के पंप हाउस का भूमि पूजन किया। दावा किया गया कि साल के अंत तक नहर बन जाएगी,लेकिन न नहर पूरी हुई, न पंप हाउस।
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वन भूमि और अधिग्रहण सबसे बड़ी बाधा
परियोजना के तहत दतिया में 6500 हेक्टेयर, भिंड में 49,200 हेक्टेयर और ग्वालियर में 22,784 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई प्रस्तावित है। अब तक दतिया के सेवढ़ा क्षेत्र में लगभग 35 हजार हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हो सका है, जिसमें 1248 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल है। भिंड और ग्वालियर में भी वन भूमि की अनुमति बड़ी बाधा बनी हुई है।
जमीन की अदला–बदली में पेंच
मुख्य बांध सेवढ़ा में 1248 हेक्टेयर वन भूमि पर प्रस्तावित है। इसके बदले भिंड जिले की भूमि देने का प्रस्ताव वन विभाग ने बंजर और अनुपयोगी बताकर ठुकरा दिया। बाद में शिवपुरी जिले की 1300 हेक्टेयर भूमि का प्रस्ताव रखा गया,लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के चलते मामला आज भी लंबित है।
परियोजना के मुख्य अभियंता राजेंद्र कुमार सिंह कंवर के मुताबिक,वन भूमि और पर्यावरणीय क्लीयरेंस मिलने के बाद ही परियोजना के काम को आगे बढ़ाया जा सकता है। फिलहाल मां रतनगढ़ परियोजना चुनावी घोषणाओं और फाइलों के बीच फंसी हुई है, जबकि किसान आज भी पानी का इंतजार कर रहे हैं।
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