दो कलेक्टरों के अलग-अलग आंकड़ों से गरमाया आदिवासियों की जमीन का मामला, 151 केस का हिसाब नहीं, हाईकोर्ट नाराज
Sourabh Bhatnagar | Oct 08, 2026, 11:09 IST
श्योपुर में आदिवासियों की जमीन के रिकॉर्ड में खेल।
मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों पर कब्जे का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। इस मामले में अब दो कलेक्टरों की रिपोर्ट पर सवाल उठ रहे हैं। पूर्व कलेक्टर ने जमीन से जुड़े 600 मामले लंबित बताए थे। वहीं वर्तमान कलेक्टर की रिपोर्ट में केवल 449 मामले सामने आए हैं। दोनों रिपोर्टों में 151 मामलों का अंतर है।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस अंतर पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आखिर ये 151 मामले कहां गए।
श्योपुर जिले में आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों पर अवैध कब्जे के आरोप लगे हैं। आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किए गए थे।
मामला केवल जमीनों पर कब्जे तक सीमित नहीं है। इसमें सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। हाईकोर्ट में पेश दो अलग-अलग रिपोर्टों से यह विवाद और बढ़ गया है।
दरअसल, तत्कालीन कलेक्टर (आईएएस संजय कुमार) ने 07 फरवरी 2024 को राज्य सरकार को एक पत्र भेजा था। इसमें जमीन से जुड़े 600 मामले लंबित होने की जानकारी दी गई थी।
इसके बाद वर्तमान कलेक्टर (आईएएस शीला दाहिमा) की ओर से हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश की गई है। इस रिपोर्ट में केवल 449 मामले दर्ज बताए गए है।
अब सवाल यह है कि जब पहले 600 मामले लंबित थे तो बाद की रिपोर्ट में केवल 449 मामले क्यों बताए गए? बाकी 151 मामलों की स्थिति क्या है?
इस मामले की सुनवाई 06 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट में हुई थी। सुनवाई के दौरान Collector Report में सामने आए अंतर पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एक आईएएस अधिकारी ने सरकार को आधिकारिक पत्र भेजकर 600 मामलों की जानकारी दी थी तो दूसरे अधिकारी की रिपोर्ट में अलग आंकड़े कैसे सामने आ गए?
कोर्ट ने यह भी पूछा कि वर्तमान जिला प्रशासन ने पूर्व कलेक्टर से संपर्क क्यों नहीं किया था। उनसे यह क्यों नहीं पूछा गया कि 600 मामलों की जानकारी किस आधार पर दी गई थी?
न्यायालय के अनुसार इतने गंभीर मामले में दोनों रिपोर्टों के बीच अंतर की जांच होना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में एक और गंभीर आशंका जताई है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि कहीं कलेक्ट्रेट या तहसील कार्यालय के कर्मचारियों की मिलीभगत से कुछ मामलों को सरकारी पोर्टल पर दर्ज ही नहीं किया गया हो।
न्यायालय ने आशंका जताई कि ऐसा प्रभावशाली लोगों या जमीन पर कब्जा करने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया हो सकता है।
कोर्ट ने इस संभावना की जांच करने को कहा है।
यह मामला Revenue Record Manipulation यानी राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर के आरोपों से भी जुड़ा है।
हालांकि 151 मामलों को जानबूझकर हटाए जाने या दर्ज नहीं किए जाने की बात अभी साबित नहीं हुई है। हाईकोर्ट ने इस आशंका की जांच करने के लिए कहा है।
इस पूरे विवाद में तत्कालीन कलेक्टर संजय कुमार का 07 फरवरी 2024 का पत्र महत्वपूर्ण है।
इस पत्र में जिले की जमीनों से जुड़े मामलों की जानकारी दी गई थी। इसमें राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए थे।
हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2025 के अपने आदेश में इस पत्र का उल्लेख किया था।
पत्र के अनुसार तहसीलदार, नायब तहसीलदार और पटवारियों के स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ियां सामने आई थीं।
आरोप था कि आदिवासियों को पट्टे पर मिली जमीनों और उनके स्वामित्व वाली जमीनों के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए थे। इसके जरिए प्रभावशाली लोगों के नाम जमीन दर्ज करने के मामले सामने आए थे।
इस तरह की गड़बड़ियों से जमीन के वास्तविक हकदारों के अधिकार प्रभावित होने का सवाल उठता है।
श्योपुर का यह मामला राजस्व विभाग के कामकाज से भी जुड़ा है।
जमीन का रिकॉर्ड तैयार करने और उसे अपडेट करने में पटवारी और राजस्व अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
किस जमीन का मालिक कौन है, किसके नाम पट्टा है और सरकारी रिकॉर्ड में किसका नाम दर्ज है, इन जानकारियों के आधार पर जमीन से जुड़े अधिकार तय होते हैं।
ऐसे में यदि रिकॉर्ड में गलत बदलाव किया जाए तो जमीन के वास्तविक मालिक को परेशानी उठानी पड़ सकती है।
पूर्व कलेक्टर के पत्र में इसी तरह की अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था।
हाईकोर्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इस बात पर भी सख्त रुख दिखाया कि ऐसी गड़बड़ियों से आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोग प्रभावित हो रहे हैं।
हाईकोर्ट में दोनों कलेक्टरों की रिपोर्ट के बीच अंतर सामने आने के बाद राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडकर ने अपना पक्ष रखा है।
उन्होंने न्यायालय से पहले दाखिल किए गए जवाब को वापस लेने की अनुमति मांगी है।
सरकार अब 600 और 449 मामलों के बीच आए अंतर की पड़ताल करेगी। इसके बाद विस्तृत जानकारी के साथ नया जवाब दाखिल किया जाएगा।
इस मामले में High Court Hearing के दौरान सामने आए सवालों का जवाब देना सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा।
खास तौर पर यह स्पष्ट करना होगा कि 151 मामलों का अंतर क्यों आया और सरकारी रिकॉर्ड में उनकी क्या स्थिति है।
इस पूरे मामले में तीन प्रमुख सवाल सामने आए हैं।
पहला सवाल यह है कि पूर्व कलेक्टर ने 600 मामले लंबित बताए थे तो वर्तमान रिपोर्ट में 449 मामले ही क्यों दिखाए गए?
दूसरा सवाल यह है कि क्या बाकी 151 मामलों को सरकारी पोर्टल पर दर्ज नहीं किया गया? यदि ऐसा हुआ तो इसके पीछे कौन जिम्मेदार था?
तीसरा सवाल यह है कि आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों से जुड़े रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की जांच किस स्तर तक हुई?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही रिपोर्ट में आए अंतर और जमीन से जुड़ी गड़बड़ियों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
श्योपुर जिले में जमीनों के रिकॉर्ड से जुड़े इस मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर 2026 को तय की गई है।
राज्य सरकार को अब दोनों रिपोर्टों के बीच सामने आए अंतर की पड़ताल कर न्यायालय में नया जवाब पेश करना है।
सबसे बड़ा सवाल उन 151 मामलों का है जिनका आंकड़ा दोनों रिपोर्टों में मेल नहीं खाता है।
इसके साथ ही आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों के रिकॉर्ड में कथित बदलाव का मुद्दा भी बना हुआ है।
अब देखना होगा कि अगली सुनवाई में सरकार इन मामलों को लेकर क्या जानकारी पेश करती है और हाईकोर्ट आगे क्या निर्देश देता है।
क्या है श्योपुर की जमीनों का पूरा मामला?
मामला केवल जमीनों पर कब्जे तक सीमित नहीं है। इसमें सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। हाईकोर्ट में पेश दो अलग-अलग रिपोर्टों से यह विवाद और बढ़ गया है।
दरअसल, तत्कालीन कलेक्टर (आईएएस संजय कुमार) ने 07 फरवरी 2024 को राज्य सरकार को एक पत्र भेजा था। इसमें जमीन से जुड़े 600 मामले लंबित होने की जानकारी दी गई थी।
इसके बाद वर्तमान कलेक्टर (आईएएस शीला दाहिमा) की ओर से हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश की गई है। इस रिपोर्ट में केवल 449 मामले दर्ज बताए गए है।
अब सवाल यह है कि जब पहले 600 मामले लंबित थे तो बाद की रिपोर्ट में केवल 449 मामले क्यों बताए गए? बाकी 151 मामलों की स्थिति क्या है?
हाईकोर्ट में आमने-सामने आईं दो कलेक्टरों की रिपोर्ट
कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एक आईएएस अधिकारी ने सरकार को आधिकारिक पत्र भेजकर 600 मामलों की जानकारी दी थी तो दूसरे अधिकारी की रिपोर्ट में अलग आंकड़े कैसे सामने आ गए?
कोर्ट ने यह भी पूछा कि वर्तमान जिला प्रशासन ने पूर्व कलेक्टर से संपर्क क्यों नहीं किया था। उनसे यह क्यों नहीं पूछा गया कि 600 मामलों की जानकारी किस आधार पर दी गई थी?
न्यायालय के अनुसार इतने गंभीर मामले में दोनों रिपोर्टों के बीच अंतर की जांच होना जरूरी है।
क्या 151 मामलों को जानबूझकर रिकॉर्ड से हटाया गया?
न्यायालय ने आशंका जताई कि ऐसा प्रभावशाली लोगों या जमीन पर कब्जा करने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया हो सकता है।
कोर्ट ने इस संभावना की जांच करने को कहा है।
यह मामला Revenue Record Manipulation यानी राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर के आरोपों से भी जुड़ा है।
हालांकि 151 मामलों को जानबूझकर हटाए जाने या दर्ज नहीं किए जाने की बात अभी साबित नहीं हुई है। हाईकोर्ट ने इस आशंका की जांच करने के लिए कहा है।
पूर्व कलेक्टर के पत्र में क्या बताया गया था?
इस पत्र में जिले की जमीनों से जुड़े मामलों की जानकारी दी गई थी। इसमें राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए थे।
हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2025 के अपने आदेश में इस पत्र का उल्लेख किया था।
पत्र के अनुसार तहसीलदार, नायब तहसीलदार और पटवारियों के स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ियां सामने आई थीं।
आरोप था कि आदिवासियों को पट्टे पर मिली जमीनों और उनके स्वामित्व वाली जमीनों के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए थे। इसके जरिए प्रभावशाली लोगों के नाम जमीन दर्ज करने के मामले सामने आए थे।
इस तरह की गड़बड़ियों से जमीन के वास्तविक हकदारों के अधिकार प्रभावित होने का सवाल उठता है।
तहसीलदार और पटवारियों की भूमिका पर सवाल
जमीन का रिकॉर्ड तैयार करने और उसे अपडेट करने में पटवारी और राजस्व अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
किस जमीन का मालिक कौन है, किसके नाम पट्टा है और सरकारी रिकॉर्ड में किसका नाम दर्ज है, इन जानकारियों के आधार पर जमीन से जुड़े अधिकार तय होते हैं।
ऐसे में यदि रिकॉर्ड में गलत बदलाव किया जाए तो जमीन के वास्तविक मालिक को परेशानी उठानी पड़ सकती है।
पूर्व कलेक्टर के पत्र में इसी तरह की अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था।
हाईकोर्ट ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इस बात पर भी सख्त रुख दिखाया कि ऐसी गड़बड़ियों से आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोग प्रभावित हो रहे हैं।
सरकार ने पिछला जवाब वापस लेने की अनुमति मांगी
उन्होंने न्यायालय से पहले दाखिल किए गए जवाब को वापस लेने की अनुमति मांगी है।
सरकार अब 600 और 449 मामलों के बीच आए अंतर की पड़ताल करेगी। इसके बाद विस्तृत जानकारी के साथ नया जवाब दाखिल किया जाएगा।
इस मामले में High Court Hearing के दौरान सामने आए सवालों का जवाब देना सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा।
खास तौर पर यह स्पष्ट करना होगा कि 151 मामलों का अंतर क्यों आया और सरकारी रिकॉर्ड में उनकी क्या स्थिति है।
हाईकोर्ट के सामने तीन बड़े सवाल
पहला सवाल यह है कि पूर्व कलेक्टर ने 600 मामले लंबित बताए थे तो वर्तमान रिपोर्ट में 449 मामले ही क्यों दिखाए गए?
दूसरा सवाल यह है कि क्या बाकी 151 मामलों को सरकारी पोर्टल पर दर्ज नहीं किया गया? यदि ऐसा हुआ तो इसके पीछे कौन जिम्मेदार था?
तीसरा सवाल यह है कि आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों से जुड़े रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की जांच किस स्तर तक हुई?
इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही रिपोर्ट में आए अंतर और जमीन से जुड़ी गड़बड़ियों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अब 21 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
राज्य सरकार को अब दोनों रिपोर्टों के बीच सामने आए अंतर की पड़ताल कर न्यायालय में नया जवाब पेश करना है।
सबसे बड़ा सवाल उन 151 मामलों का है जिनका आंकड़ा दोनों रिपोर्टों में मेल नहीं खाता है।
इसके साथ ही आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों की जमीनों के रिकॉर्ड में कथित बदलाव का मुद्दा भी बना हुआ है।
अब देखना होगा कि अगली सुनवाई में सरकार इन मामलों को लेकर क्या जानकारी पेश करती है और हाईकोर्ट आगे क्या निर्देश देता है।
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