शिवराज सिंह चौहान की MP में सक्रियता: नई राजनीति या पुरानी जमीन बचाने की रणनीति?
Ram Krishna Gautam | Aug 18, 2026, 20:32 IST
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शिवराज सिंह चौहान केंद्र में कृषि मंत्री हैं, फिर भी मध्य प्रदेश की राजनीति में लगातार एक्टिव हैं। जानिए क्या यह नई रणनीति है या पुरानी जमीन बचाने की जंग।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की नजर आज भी भोपाल पर टिकी हुई है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की कमान अचानक मोहन यादव को सौंप दी गई। शिवराज भले ही दिल्ली चले गए, लेकिन उनका मन आज भी मध्य प्रदेश की राजनीति में बसा है।
सोशल मीडिया पर मामा के दर्जनों पेज आज भी बहुत तेजी से प्रमोट किए जा रहे हैं। इन डिजिटल पेजों के जरिए प्रदेश की जनता के बीच मामा की मौजूदगी लगातार बनी हुई है। हर छोटे-बड़े मुद्दे पर शिवराज का बयान तुरंत आता है और सोशल मीडिया पर छा जाता है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि शिवराज अपनी बनी-बनाई जमीन को किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं।
शिवराज करीब डेढ़ दशक तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर मजबूती से काबिज रहे थे। राज्य के हर गांव और कस्बे में उनका एक मजबूत सियासी नेटवर्क बना हुआ है। किसान, महिलाएं और ग्रामीण वोटर शिवराज सिंह चौहान का सबसे वफादार और बड़ा वोट बैंक रहे हैं। ऐसे में दिल्ली जाने के बाद भी राज्य से उनका यह खास जुड़ाव कोई हैरानी की बात नहीं।
लेकिन अब राज्य की कमान मोहन यादव के पास है, जिससे तुलना होना स्वाभाविक सी बात है। जब भी शिवराज एमपी आते हैं, तो नए और पुराने नेतृत्व के बीच चर्चाएं बहुत तेज हो जाती हैं।
शिवराज के आधिकारिक हैंडल्स के अलावा कई अनौपचारिक पेज भी राज्य में दिन-रात एक्टिव चल रहे हैं। इन सभी पेजों पर एक ही समय में शिवराज के भाषण और दौरे प्रमोट किए जा रहे हैं। यह महज समर्थकों का प्यार है या फिर एमपी में एक्टिव ब्रांड बने रहने की सोची-समझी रणनीति? अगर पेड प्रमोशन के जरिए कंटेंट फैलाया जा रहा है, तो इसके सियासी मायने जरूर निकाले जाएंगे।
क्या
सूत्रों के मुताबिक शिवराज ने पीएम मोदी से राज्य के कृषि कार्यक्रमों की शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि केंद्रीय कृषि मंत्री होने के बाद भी उन्हें राज्य में तवज्जो नहीं मिल रही। इस शिकायत के बाद से ही बीजेपी के भीतर दो पावर सेंटर बनने की खबरें काफी तेज हो गईं।
मुख्यमंत्री मोहन यादव को अपनी एक नई और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की बेहद सख्त जरूरत है। अगर हर बड़े किसान मंच पर शिवराज छाए रहेंगे, तो मोहन यादव का सियासी स्पेस खत्म हो जाएगा।
हाल ही में मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों ने एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया था। तब केंद्रीय मंत्री शिवराज ने कहा कि केंद्र सरकार सिर्फ एक सीमित मात्रा में ही मूंग खरीदेगी। बाकी बची हुई फसल को खरीदने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार यानी मोहन सरकार को उठानी होगी। शिवराज के इस बयान से गेंद सीधे मुख्यमंत्री मोहन यादव के पाले में जाकर अचानक गिर पड़ी।
किसान को सिर्फ अपनी फसल बेचने से मतलब है, भुगतान कौन सरकार करती है इससे फर्क नहीं पड़ता। शिवराज के इस तकनीकी जवाब ने मोहन सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाकर खड़ा कर दिया।
फिलहाल शिवराज सिंह चौहान और मोहन यादव के बीच कोई खुला टकराव सामने नजर नहीं आ रहा। पर मोहन यादव के पास सरकार की ताकत है और शिवराज के पास जनता का जबरदस्त प्यार। जब भी किसान नाराज होते हैं, लोग यही पूछते हैं कि शिवराज सीएम होते तो क्या करते? लाड़ली बहना योजना का जिक्र आते ही जनता के जुबान पर आज भी मामा का नाम आ जाता है। मोहन यादव के सामने असली चुनौती शिवराज के इस विशाल सियासी साये से खुद को बाहर निकालना है।
शिवराज के पास आज 1.40 लाख करोड़ के विशाल बजट वाला केंद्रीय कृषि जैसा बड़ा मंत्रालय है। राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद और दायरा अब पहले से काफी ज्यादा बड़ा और मजबूत हो चुका है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि वह तुरंत वापस मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल होना चाहते हैं। लेकिन वह मध्य प्रदेश की अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन को भी खाली बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे।
कांग्रेस इस स्थिति का पूरा फायदा उठाकर बीजेपी के अंदरूनी मतभेदों को लगातार भुनाने में जुटी है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि डबल इंजन सरकार में भी मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन क्यों कर रहा? मामा दिल्ली में भले बैठ जाएं, पर उनका दिल और राजनीति हमेशा मध्य प्रदेश में ही धड़केगी।
जबलपुर के सीनियर जर्नलिस्ट रवींद्र दुबे ने कहा, मध्य प्रदेश शिवराज का घर है। यहां से उनका भावनात्मक लगाव हमेशा रहेगा। वो करीब 18 साल मुख्यमंत्री रहे। इसीलिए दिल्ली रहने के बावजूद वो भोपाल और दूसरी जगहों के चक्कर लगाते रहते हैं। लेकिन हाल के कुछ सियासी घटनाक्रमों के बाद कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। लगता है कि शिवराज मप्र में अपना पॉलिटिकल चार्म नहीं खोना चाहते। इसीलिए कुछ मामलों में सख्ती से पेश आ रहे हैं।
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सोशल मीडिया पर मामा के दर्जनों पेज आज भी बहुत तेजी से प्रमोट किए जा रहे हैं। इन डिजिटल पेजों के जरिए प्रदेश की जनता के बीच मामा की मौजूदगी लगातार बनी हुई है। हर छोटे-बड़े मुद्दे पर शिवराज का बयान तुरंत आता है और सोशल मीडिया पर छा जाता है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि शिवराज अपनी बनी-बनाई जमीन को किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं।
एमपी ही क्यों है मामा की राजनीतिक ताकत?
लेकिन अब राज्य की कमान मोहन यादव के पास है, जिससे तुलना होना स्वाभाविक सी बात है। जब भी शिवराज एमपी आते हैं, तो नए और पुराने नेतृत्व के बीच चर्चाएं बहुत तेज हो जाती हैं।
सोशल मीडिया का ये खेल आखिर क्या इशारा कर रहा है?
क्या पीएम मोदी से हुई शिकायत ने बढ़ा दी मोहन यादव की चिंता?
मुख्यमंत्री मोहन यादव को अपनी एक नई और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की बेहद सख्त जरूरत है। अगर हर बड़े किसान मंच पर शिवराज छाए रहेंगे, तो मोहन यादव का सियासी स्पेस खत्म हो जाएगा।
मूंग खरीदी का विवाद: क्या अपने ही बयान में घिरी सरकार?
किसान को सिर्फ अपनी फसल बेचने से मतलब है, भुगतान कौन सरकार करती है इससे फर्क नहीं पड़ता। शिवराज के इस तकनीकी जवाब ने मोहन सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाकर खड़ा कर दिया।
मध्य प्रदेश में दो पावर सेंटर! मोहन यादव के सामने असली चुनौती
क्या शिवराज फिर से लौटेंगे मध्य प्रदेश की सत्ता की ओर?
कांग्रेस इस स्थिति का पूरा फायदा उठाकर बीजेपी के अंदरूनी मतभेदों को लगातार भुनाने में जुटी है। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि डबल इंजन सरकार में भी मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन क्यों कर रहा? मामा दिल्ली में भले बैठ जाएं, पर उनका दिल और राजनीति हमेशा मध्य प्रदेश में ही धड़केगी।
मध्य प्रदेश शिवराज का घर..
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