सुप्रीम कोर्ट में मप्र सरकार का हलफनामा रहस्य: पेश हुआ या नहीं, जिम्मेदार अंजान

एमपी सरकार का हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं। 8 जनवरी को शपथ पत्र प्रस्तुत होना था। अधिकारियों का कहना है कि हलफनामा नहीं पहुंचा।

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Ravi Awasthi
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BHOPAL. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निजी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर मांगी गई। इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार की तैयारी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालात यह हैं कि 8 जनवरी को शपथ पत्र पेश होना था। लेकिन हलफनामा वास्तव में पेश हुआ या नहीं इसकी आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है।

यह पूरा मामला रिट याचिका WP (Civil) 531/2025, आयशा जैन बनाम एमिटी यूनिवर्सिटी एंड ओआरएस से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को राज्यों से निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना, संचालन और निगरानी की जानकारी मांगी। यह जानकारी शपथ पत्र के माध्यम से मांगी गई थी। यह शपथ पत्र राज्यों के मुख्य सचिव की ओर से पेश किया जाना हैं। इसकी पहली सुनवाई आज गुरुवार को तय थी। इसमें यह शपथ पत्र पेश किया जाना था।

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शपथ पत्र को लेकर एक दिन पहले जागा विभाग

हैरत की बात यह कि मुख्य सचिव अनुराग जैन का यह शपथ पत्र सुप्रीम कोर्ट पहुंचा या नहीं। इसे लेकर जिम्मेदार अधिकारी असमंजस में हैं। दरअसल,उच्च शिक्षा विभाग की ओर से अपने ही आयुक्त के नाम एक दिन पहले यानी 7 जनवरी को एक पत्र जारी किया गया। इसमें बताया गया कि प्रकरण में मप्र निजी विवि विनियामक आयोग के सचिव डॉ. डीएस गुर्जर को ओआईसी (ऑफिसर इनचार्ज) बनाया गया है।

हलफनामा पेश हुआ या नहीं,जिम्मेदार अंजान

कोर्ट के आदेश के मुता​बिक,मध्य प्रदेश मुख्य सचिव की ओर से यह हलफनामा न्यायालय में पेश हुआ या नहीं,इसे ​लेकर जिम्मेदार अधिकारी अंजान हैं। अब जिम्मेदारों के बयानों की बानगी जानिए...

  • ओआईसी बनाए गए आयोग के अध्यक्ष प्रो.कमलेश डहरिया ने दो टूक कहा-यह काम उच्च शिक्षा विभाग का है। आयोग का इससे लेना-देना नहीं। जो जानकारी हमारे पास थी,वह हमने विभाग को भेज दी। हमारे यहां से कोई कहीं नहीं गया।
  • वहीं आयोग के सचिव एवं प्रकरण के ओआईसी डॉ डी एस गुर्जर ने कहा-मैं तो गया नहीं,लेकिन इसे वकील तक भिजवा दिया। कैसे? जवाब में पहले कहा मेल से,फिर बताया कर्मचारी के हाथों। कर्मचारी का नाम पूछा तो कहा-अभी बताना ठीक नहीं,आप मेरा ही नाम मान लो। वकील का नाम भी वह नहीं बता सके।
  • इधर,उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त प्रबल सिपाहा,इस समूचे मामले से ही अंजान नजर आए। विभागीय अवर सचिव के पत्र व प्रकरण का ब्योरा बताने पर उन्होंने कहा- यह सब मैं नहीं देखता। फिलहाल मैं एक बैठक के सिलसिले में अहमदाबाद में हूं। संबंधित अधिकारी से पूछकर ही कुछ कह पाऊंगा।

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शपथ पत्र तो दूर,वकालात नामा भी पेश नहीं: सूत्र

इधर,जानकार सूत्रों का दावा है कि प्रकरण में शपथ पत्र पेश होना तो दूर की बात,​अभी तो  मध्य प्रदेश की ओर से वकालतनामा भी पेश नहीं हुआ। हालांकि इसकी अधिकृत तौर पर पुष्टि नहीं हो सकी। बताया जाता है कि प्रकरण में मध्य प्रदेश का नाम पांचवे नंबर पर दर्ज है। इस केस की अगली सुनवाई 28 जनवरी तय होना बताया जाता है। 

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हलफनामा देने में कई अड़चनें

दरअसल,निजी व डीम्ड विश्वविद्यालयों की जानकारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त है। कोर्ट ने गत 20 नवंबर के अपने आदेश में साफ कहा कि गलत,अधूरी या भ्रामक जानकारी देने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह मामला पूरे देश की निजी विश्वविद्यालय व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा है। इधर, कई तरह की गड़ब​ड़ियों के चलते उच्च शिक्षा अनुदान आयोग पहले ही मप्र के 10 विश्वविद्यालयों को डिफाल्टर घोषित कर चुका है। इनमें अधिकांश अब तक इस दाग से उबर नहीं सके। मामला सीधे मुख्य सचिव व सुप्रीमकोर्ट से जुड़ा है। इसके चलते सही जानकारी के साथ हलफनामा तैयार करने में जिम्मेदारों के हाथ पैर फूल रहे हैं।

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