हाईकोर्ट के बाद अब जीएडी के पाले में 100 फीसदी सैलरी का निर्णय

हाईकोर्ट के फैसले से मध्यप्रदेश में कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने का रास्ता खुला। सरकार को अब जीएडी के तहत सैलरी की विसंगतियां सुधारनी होंगी।

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Sanjay Sharma
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After the High Court, now the decision of 100% salary is in the favor of GAD

Photograph: (the sootr)

BHOPAL. कर्मचारियों की सैलरी में नियुक्ति के बाद तीन साल तक कटौती के आदेश पर अब सरकार पूरी तरह घिरती नजर आ रही है। विधि विभाग के कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने के बाद कटौती के आदेश पर लगी रोक के खिलाफ सरकार की अपील जबलपुर हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने समान कार्य के लिए कर्मचारी को समान वेतन पाने का हकदार माना है।

हांलाकि हाईकोर्ट से केवल याचिकाकर्ताओं को राहत मिली है। लेकिन अब यही फैसला मध्य प्रदेश के हजारों कर्मचारियों के लिए मील का पत्थर बनेगा। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब पूरा वेतन देने का मामला एक बार फिर सामान्य प्रशासन विभाग के पाले में आ गया है।

एक्सपर्ट का मानना है सरकार को कर्मचारियों को समान वेतन देने आदेश जारी करना होगा। कर्मचारी हाईकोर्ट जाकर परेशानी बढ़ा सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को किरकिरी का सामना करना पड़ेगा। हाईकोर्ट ने जिन तर्क और तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है उससे सरकार की मंशा और पक्षपात भी साफ हो गया है। 

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कांग्रेस की सरकार ने बदला था परिवीक्षा नियम 

साल 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा परिवीक्षा नियमों में बदलाव किया था। मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती किए गए चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों की परिवीक्षा अवधि दो से बढ़ाकर तीन साल की गई थी। वहीं उन्हें नियुक्ति के बाद पहले साल 70, दूसरे साल 80 और तीसरे साल 90 फीसदी वेतन देने का प्रावधान किया गया था।

साल 2019 के बाद नियुक्त हजारों कर्मचारी लगातार इस नियम का विरोध कर रहे हैं। हांलाकि सरकार नियुक्ति के बाद पूरा वेतन देने से पड़ने वाले आर्थिक भार से बचने के लिए इस नियम को बदलने से बचती आ रही है। जबलपुर हाईकोर्ट के 6 जनवरी को दिए फैसले ने पूरी सैलरी के लिए संघर्षरत हजारों कर्मचारियों की उम्मीदें जगा दी हैं। 

ESB से भर्ती कर्मचारी भी समान वेतन के हकदार 

दरअसल मध्य प्रदेश में दिसम्बर 2019 के बाद विधि विभाग में हुई ईएसबी के माध्यम से भर्ती कुछ कर्मचारियों को 100 फीसदी वेतन का भुगतान किया गया था। पूरा वेतन देने की भूल सामने आने पर कर्मचारियों से इस राशि की वसूली के आदेश सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी किए गए थे। इस आदेश के खिलाफ कर्मचारियों ने जबलपुर हाईकोर्ट के अलावा इंदौर बेंच में भी याचिका लगाई थीं।

इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने वसूली पर रोक लगा दी थी। जिसके खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अपील पेश की गई थी। सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान कर्मचारियों को नियुक्ति के बाद तीन स्लैब में कटौती को हाईकोर्ट ने गलत माना है। इस वेतन भुगतान को हाईकोर्ट ने अतार्किक पाकर समान कार्य समान वेतन का हककार बताया है।   

जागरुकता ने कर्मचारियों को दिलाई जीत

हाईकोर्ट एडवोकेट दिनेश सिंह चौहान का कहना है एमपीपीएससी और ईएसबी से नियुक्ति के आधार पर कर्मचारियों को वेतन देने में भेदभाव किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने समान कार्य कराने के बावजूद नवनियुक्त कर्मचारियों को तीन साल तक पूरा वेतन न देना तर्कसंगत नहीं माना है। हांलाकि हाईकोर्ट के फैसले के माध्यम से केवल याचिकाकर्ता कर्मचारियों को ही राहत दी गई है।

ऐसे कर्मचारियों से अब पुराने आदेश के आधार पर पूर्व में किए गए वेतन भुगतान की वसूली नहीं हो सकेगी। साथ ही उन्हें एरियर के साथ वेतन का भुगतान करना होगा। न्यायालयीन प्रक्रिया में जागरुकता का बड़ा महत्व है। इसलिए जो अपने हक के लिए न्यायालय पहुंचे हैं हाईकोर्ट ने उनहें राहत दी है। लेकिन यह राहत दूसरे कर्मचारियों के लिए भी पूरा वेतन पाने का रास्ता खोलने वाली है। 

पहले आग्रह फिर तेज होगी कानूनी लड़ाई 

मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के महामंत्री मनोहर गिरि ने बताया कि भले ही हाईकोर्ट ने फैसला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में दिया है लेकिन यह अन्य कर्मचारियों के संघर्ष को नया जोश देगा। जिन तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया गया है उससे सरकार बैकफुट पर आ गई है। अब जीएडी को इस निर्णय के आधार पर ईएसबी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के लिए परिवीक्षा नियमों की विसंगति दूर करना होगा।

जीएडी इस संबंध मे सर्कुलर जारी कर कर्मचारियों को शत प्रतिशत सैलरी का अधिकार देकर सरकार के पक्ष को मजबूत रख सकता है। ऐसा न होने पर हजारों कर्मचारी इस फैसले को आधार बनाकर हाईकोर्ट की शरण लेंगे। इससे सरकार को किरकिरी का सामना करना पड़ेगा। कर्मचारी संगठन कानून के जानकारों से हाईकोर्ट के निर्णय के आधार पर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। इस संबंध में सरकार से भी सैलरी भुगतान और परिवीक्षा नियमों में संशोधन की अपील करेंगे। 

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हाईकोर्ट ने याचिकाओं पर सुनाया फैसला 

हाईकोर्ट जबलपुर के अलावा जीएडी के इस आदेश के खिलाफ इंदौर बेंच में भी कर्मचारियों द्वारा याचिकाएं पेश की गई थी। जिन पर लगातार सुनवाई जारी थी। हाईकोर्ट ने स्वाति जैन, आदित्य मिश्रा और वसीम अकरम एंव अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश की गई याचिका की समान प्रकृति को देखते हुए उन पर एक साथ फैसला दिया है।

जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोट ने सुनवाई के दौरान तीन साल की परिवीक्षा अवधि में नियमित कार्य लेने के बावजूद तीन स्लैब में वेतन से कटौती को अतार्किक माना है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट के सामने जीएडी के 12 दिसम्बर 2019 के परिपत्र का भी उल्लेख किया गया। यह परिपत्र ऐसे कर्मचारियों के लिए है जिनकी नियुक्ति मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम 1961 के अंतर्गत की गई है। जबकि परिपत्र के खंड 2 में वेतन कटौती की शर्तों से लोक सेवा आयोग द्वारा नियुक्त कर्मचारियों को बाहर रखा गया है।

सुनवाई के दौरान यह तर्क भी दिया गया कि वित्त विभाग को मौलिक नियमों में संशोधन का अधिकार दिया गया है। लेकिन एमपीपीएससी और राज्य की अन्य एजेंसियों द्वारा नियुक्त तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।

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