सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की MP के जज निर्भय सुलिया की बर्खास्तगी

सुप्रीम कोर्ट ने निर्भय सिंह सुलिया की 2014 में हुई बर्खास्तगी को अवैध ठहराया है। साथ ही यह भी कहा कि केवल गलत फैसले के आधार पर जज पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

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Anjali Dwivedi
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supreme court rejects dismissal nirbhay sulya
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पांच प्वाइंट में समझें पूरा मामला

  • SC ने पूर्व जज निर्भय सिंह सुलिया की 2014 में हुई बर्खास्तगी को अवैध ठहराया।
  • कोर्ट ने कहा कि केवल गलत फैसले के आधार पर जज पर कार्रवाई नहीं हो सकती।
  • प्रशासनिक डर से जजों के विवेक को प्रभावित करना गलत है।
  • जजों के खिलाफ फर्जी शिकायत करने वालों और वकीलों पर सख्ती के निर्देश।
  • कदाचार साबित होने पर कार्रवाई जरूरी, लेकिन मानवीय चूक और भ्रष्टाचार में अंतर हो।

सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी सोमवार को मध्य प्रदेश के जज निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ गलत या गलती से दिया गया न्यायिक आदेश ही किसी जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का कारण नहीं बन सकता है। सुलिया को 2014 में उनके पद से हटा दिया गया था, तब वे खरगोन में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर काम कर रहे थे।

2014 का फैसला पलटा

सुलिया पर आरोप था कि उन्होंने भ्रष्टाचार और आबकारी अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत याचिकाओं पर दोहरा मापदंड अपनाया था। कहा गया कि कुछ मामलों में, जहां 50 बल्क लीटर से अधिक शराब जब्ती वाले कुछ मामलों में उन्होंने जमानत दी थी। जबकि कुछ और मामलों में उसी आधार पर जमानत खारिज कर दी थी। विभागीय जांच के बाद हाई कोर्ट ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था।

 क्या कहना है सुप्रीम कोर्ट का-

जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने बताया कि 27 साल तक बेदाग सेवा देने वाले जज को बिना ड्यू प्रोसेस अपनाए हटाया गया, जो न्यायसंगत नहीं। उन्हें सामान्य सेवानिवृत्ति आयु तक सेवा में माना जाए। पूर्ण बकाया वेतन सहित सभी लाभ दिए जाएं। सभी लाभ 8 सप्ताह में 6% ब्याज के साथ जारी हों।

सुप्रीम कोर्ट की सलाह: न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजमेंट की गलती और भ्रष्टाचार को एक जैसा नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने यह भी सलाह दी कि बिना सोचे-समझे कार्रवाई से बचना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई में हाई कोर्ट को बहुत सतर्क रहना चाहिए। सिर्फ गलत आदेश या निर्णय की गलती पर बिना सोचे-समझे कार्रवाई करना न्यायिक स्वतंत्रता और विवेकाधिकार को कमजोर करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई का डर निचली अदालतों में जमानत देने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इससे कई सही मामलों में जमानत नहीं मिल पाती है। इसके कारण जमानत याचिकाएं उच्च अदालतों तक पहुंचती हैं। हाई कोर्ट को यह समझना चाहिए कि जिला न्यायाधीशों के सामने कितनी दबावपूर्ण परिस्थितियां होती हैं और बिना ठोस आधार के कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

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झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत

कोर्ट ने झूठी और निराधार शिकायतों पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे शिकायतकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और अगर शिकायतकर्ता वकील है, तो मामले को बार काउंसिल को भेजा जाए। 

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस फैसले से भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। अगर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कदाचार की पहली नजर में पुष्टि होती है, तो तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। क्योंकि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को सहन नहीं किया जा सकता।

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