समझें क्या है पूरा मामला
- पेड़ों की कटाई रोकने के लिए हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगी थी।
- याचिका में 2015 की पेड़ कटाई वाली छूट को चुनौती दी गई।
- हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में वह अधिसूचना रद्द कर दी थी।
- सड़क परियोजनाओं में कटे पेड़ों का पूरा डेटा नहीं मिला।
- अब याचिकाकर्ताओं को डेटा जुटाकर फिर कोर्ट आना होगा।
पेड़ों की कटाई पर लगी जनहित याचिकाएं खत्म
जबलपुर हाईकोर्ट ने गुरुवार को दोनों याचिकाएं खत्म कर दीं। मामला पेड़ों की कटाई और उनके संरक्षण से जुड़ा था। सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया की बेंच में हुई। जस्टिस प्रदीप मित्तल भी इस बेंच में शामिल रहे। कोर्ट ने पुराने मामलों को आगे चलाने से इनकार किया। हालांकि, नए आंकड़ों के साथ लौटने का रास्ता खुला है।
अब याचिकाकर्ता ही जुटाएंगे डेटा
इस आदेश का सबसे अहम पहलू डेटा से जुड़ा है। जनहित में मामला कोर्ट तक पहुंचाने वाले याचिकाकर्ता ही डेटा जुटाएंगे। उन्हें सड़क परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई की जानकारी जुटानी होगी। उन्हें नए लगाए गए पेड़ों का रिकॉर्ड भी जुटाना होगा। इसके बाद वे जरूरत पड़ने पर फिर कोर्ट जा सकते हैं। यानी अब दावे के साथ आंकड़े भी सामने रखने होंगे। हालांकि यहां पर अब यह सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि साल 2015 से पेड़ कटाई के खिलाफ लड़ाई के बाद, अब डाटा सरकार को नहीं बल्कि याचिकाकर्ताओं को इकट्ठा करना होगा।
पहले ठोस आंकड़े लेकर आइए
कोर्ट ने माना कि सालों में काफी बदलाव हुआ है। इस दौरान कई नए हाईवे बनाए गए हैं। कई सड़कों को चौड़ा भी किया गया है। लेकिन कटे पेड़ों का पूरा आंकड़ा सामने नहीं है। नए लगाए पेड़ों की संख्या भी साफ नहीं है। इसलिए कोर्ट ने पहले डेटा जुटाने का रास्ता बताया।
कितने पेड़ कटे और कितने लगाए
विवेक कुमार शर्मा ने साल 2019 में याचिका लगाई थी। उन्होंने सड़क चौड़ीकरण में पेड़ों की कटाई पर सवाल उठाए थे। उन्होंने नए हाईवे निर्माण में भी पेड़ों की चिंता जताई। याचिका में पेड़ों के बदले नए पेड़ लगाने की मांग थी। अब इसी मुद्दे पर ठोस आंकड़े जुटाने होंगे।।यही आंकड़े आगे की कानूनी कार्रवाई का आधार बनेंगे।
फलदार पेड़ भी लगाने होंगे
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को एक और जिम्मेदारी दी। दोनों याचिकाकर्ताओं को 25-25 फलदार पेड़ लगाने होंगे। पेड़ उनके संबंधित क्षेत्रों में लगाए जाने हैं। इन क्षेत्रों की पहचान नगर निगम ने की है। पेड़ लगाने के बाद इसकी रिपोर्ट भी देनी होगी।
विवेक कुमार शर्मा ने यह रखी थी मांग
विवेक कुमार शर्मा ने जनहित याचिका साल 2019 में लगाई थी। उनकी याचिका डब्ल्यू.पी. 13864/2019 के रूप में दर्ज हुई। उन्होंने पेड़ों की कटाई रोकने की मांग की थी। उन्होंने लकड़ी के परिवहन पर पास जरूरी करने को कहा। कटे पेड़ों का रिकॉर्ड रखने की मांग भी की थी। उन्होंने सड़क परियोजनाओं में पेड़ बचाने की मांग की थी।
2015 की अधिसूचना से शुरू हुआ पूरा विवाद
एमपी सरकार ने 24 सितंबर 2015 को अधिसूचना जारी की थी। इससे 53 पेड़ प्रजातियों को नियमों से छूट मिली थी। इस सूची में पीपल और बरगद जैसे पेड़ शामिल थे। नीम, पाखड़, गूलर और जामुन भी सूची में थे। बबूल, करंज, बेर और महुआ भी इसमें शामिल थे। याचिकाकर्ता ने इस छूट से पेड़ों पर खतरा बताया था।
हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में ही अधिसूचना रद्द कर दी थी
इस विवाद में बड़ा फैसला 1 मार्च 2025 को आया था। हाईकोर्ट की फुल बैंच ने अधिसूचना रद्द कर दी थी। यह फैसला दोनों जुड़ी याचिकाओं पर आया था। इससे 24 सितंबर 2015 वाली छूट खत्म हो गई। कोर्ट ने पुराने नियम लागू करने का रास्ता साफ किया। इस फैसले से पेड़ों की सुरक्षा को मजबूती मिली।
आनंद की याचिका भी इसी विवाद से जुड़ी थी
इस मामले में आनंद ने भी याचिका दायर की थी। उनकी याचिका संख्या डब्ल्यू.पी. 26802/2018 थी। उन्होंने पेड़ों की कटाई रोकने की मांग की थी। उन्होंने हरे पेड़ों की सुरक्षा की मांग रखी थी। उन्होंने 2015 की अधिसूचना रद्द करने को कहा था। दोनों याचिकाओं को साथ सुनकर आदेश दिया गया।
फिर हाईकोर्ट कैसे जा सकते हैं
कोर्ट ने दोनों मामलों को फिलहाल खत्म कर दिया है। लेकिन नए तथ्य मिलने पर रास्ता बंद नहीं हुआ। याचिकाकर्ता सड़क परियोजनाओं से जुड़े आंकड़े जुटा सकते हैं। उन्हें कटे पेड़ों की संख्या का रिकॉर्ड चाहिए। उन्हें लगाए गए पेड़ों का भी रिकॉर्ड चाहिए। ठोस डेटा मिलने पर वे फिर हाईकोर्ट जा सकते हैं।
जनहित याचिका के लिए डाटा जरूरी
जनहित याचिका आम लोगों के मुद्दे कोर्ट तक पहुंचाती है। इस मामले में पेड़ों की सुरक्षा मुख्य मुद्दा था। अब कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को डेटा जुटाने को कहा। इससे मामले में तथ्य आधारित लड़ाई की जरूरत बढ़ी है। सिर्फ पेड़ कटने का दावा काफी नहीं होगा। कटाई और पौधरोपण का आंकड़ा भी सामने रखना होगा।
पेड़ों की कटाई पर आगे की लड़ाई...
अब इस मामले में आंकड़े सबसे अहम होंगे। कहां कितने पेड़ काटे गए, यह पता करना होगा। कहां कितने नए पेड़ लगाए गए, यह भी देखना होगा। सड़क और हाईवे परियोजनाओं का रिकॉर्ड जुटाना होगा। इसके बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई संभव होगी। हाईकोर्ट ने नए मामले के लिए दरवाजा खुला रखा है।
पूरे मामले की टाइमलाइन एक नजर में
साल 2015 में सरकार ने 53 पेड़ प्रजातियों को छूट दी। साल 2018 में आनंद ने हाईकोर्ट का रुख किया। साल 2019 में विवेक कुमार शर्मा ने याचिका लगाई। एक मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने अधिसूचना रद्द की। 13 अगस्त 2026 को दोनों याचिकाएं खत्म कर दी गईं। अब ठोस आंकड़ों के साथ फिर कोर्ट आने का विकल्प है।
याचिका खत्म, लेकिन सवाल बाकी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुरानी जनहित याचिकाएं खत्म कर दी हैं। लेकिन पेड़ों की कटाई का सवाल अभी बाकी है। अब याचिकाकर्ताओं को ही खुद ठोस डेटा जुटाना होगा। उन्हें अपने क्षेत्रों में 25-25 फलदार पेड़ लगाने होंगे। पेड़ लगाने के बाद कोर्ट को रिपोर्ट भी देनी होगी। नए आंकड़ों के साथ मामला फिर उठ सकता है।
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