जेलों के भीतर की सच्चाई: बढ़ती भीड़, कमजोर निगरानी और कठघरे में कारागार व्यवस्था
Ramanand Tiwari | Feb 25, 2026, 23:21 IST
truth inside jails
मध्यप्रदेश की जेल व्यवस्था में सुधार के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन बढ़ती भीड़, आत्महत्या और फरारी की घटनाओं से स्पष्ट होता है कि कारागार सिस्टम में गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं।
BHOPAL. मध्यप्रदेश की जेल व्यवस्था को लेकर सरकार सुरक्षा, प्रशिक्षण और नई जेलों के निर्माण के दावे कर रही है। लेकिन विधानसभा में दिए गए आधिकारिक जवाब से यह साफ हुआ कि हालात संतुलित नहीं हैं। बंदियों की मौतें, आत्महत्या, फरारी की घटनाएं और क्षमता से ज्यादा भीड़ ये सब कारागार सिस्टम पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
प्रदेश में 11 केंद्रीय जेल, 41 जिला जेल, 73 उपजेल और 8 खुली जेल संचालित हैं। कागजों पर ढांचा मजबूत दिखता है, लेकिन कई जेलें निर्धारित क्षमता से ज्यादा कैदियों को संभाल रही हैं। इससे सुरक्षा, स्वास्थ्य और निगरानी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
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मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधायक उमाकांत शर्मा के सवाल के जवाब में बताया कि 1 अप्रैल 2020 से अब तक 70 महीनों में 715 कैदियों की मौत हुई है। इनमें 36 मामलों को आत्महत्या बताया गया है और 54 कैदी फरार हुए हैं। ये आंकड़े जेल प्रबंधन की चुनौतियों को दर्शाते हैं।
सरकार के अनुसार, सुरक्षा को आधुनिक बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। 15 जेलों में बाउंड्रीवाल पर इलेक्ट्रिक वायर फेंसिंग लगाई गई है। अन्य जेलों में यह कार्य प्रक्रियाधीन है। सभी जेलों को सीसीटीवी नेटवर्क से जोड़ा गया है। मकसद है फरारी रोकना और हर गतिविधि पर नजर रखना।
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क्षमता से ज्यादा बंदी होना सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं है। भीड़ बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होती हैं। मानसिक तनाव बढ़ता है। निगरानी तंत्र कमजोर हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आत्महत्या जैसे मामलों के पीछे मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी एक अहम कारण हो सकती है।
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सरकार ने सुधारात्मक कदमों की जानकारी भी दी है। 13 सर्किल जेलों और 11 जिला जेलों में उद्योग संचालित हैं। हजारों बंदियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। 3 जेलों में आईटीआई के जरिए तकनीकी शिक्षा दी जा रही है। शिक्षा और साक्षरता अभियान के तहत बड़ी संख्या में बंदियों को पढ़ाया गया। सरकार का कहना है कि उद्देश्य बंदियों को कौशल देकर मुख्यधारा से जोड़ना है।
बढ़ती संख्या को देखते हुए सीहोर, शिवपुरी, अनूपपुर, भिंड, बुरहानपुर, इंदौर और छिंदवाड़ा समेत कई जिलों में नई जेलों का निर्माण जारी है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ नई इमारतें बना देने से समस्या हल हो जाएगी, या सिस्टम में संरचनात्मक बदलाव भी जरूरी हैं?
सुरक्षा में तकनीकी सुधार, व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण, शिक्षा पर जोर दिया गया है। नई जेलों का निर्माण किया जा रहा है। बड़ी संख्या में मौतें और आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। फरारी की घटनाएं और ओवरक्राउडिंग एक समस्या बन गई है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष का कहना है कि सुधार सिर्फ निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। काउंसलिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और जवाबदेही तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
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मध्यप्रदेश की जेलों में सुधार के प्रयास जारी हैं, लेकिन सामने आए तथ्य बताते हैं कि चुनौतियां अभी भी गंभीर हैं। सवाल यह नहीं कि जेलों की संख्या कितनी है, बल्कि यह है कि उनके भीतर व्यवस्था कितनी संवेदनशील, सुरक्षित और जवाबदेह है। अब जरूरत सिर्फ दीवारें मजबूत करने की नहीं, बल्कि पूरे कारागार सिस्टम को मानवीय और पारदर्शी बनाने की है।
प्रदेश में 11 केंद्रीय जेल, 41 जिला जेल, 73 उपजेल और 8 खुली जेल संचालित हैं। कागजों पर ढांचा मजबूत दिखता है, लेकिन कई जेलें निर्धारित क्षमता से ज्यादा कैदियों को संभाल रही हैं। इससे सुरक्षा, स्वास्थ्य और निगरानी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
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विधानसभा के जवाब में क्या सामने आया?
सरकार के अनुसार, सुरक्षा को आधुनिक बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। 15 जेलों में बाउंड्रीवाल पर इलेक्ट्रिक वायर फेंसिंग लगाई गई है। अन्य जेलों में यह कार्य प्रक्रियाधीन है। सभी जेलों को सीसीटीवी नेटवर्क से जोड़ा गया है। मकसद है फरारी रोकना और हर गतिविधि पर नजर रखना।
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सुधार और पुनर्वास की पहल
नई जेलें बन रहीं, लेकिन क्या इतना काफी है?
सुरक्षा में तकनीकी सुधार, व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण, शिक्षा पर जोर दिया गया है। नई जेलों का निर्माण किया जा रहा है। बड़ी संख्या में मौतें और आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। फरारी की घटनाएं और ओवरक्राउडिंग एक समस्या बन गई है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष का कहना है कि सुधार सिर्फ निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। काउंसलिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और जवाबदेही तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
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