ट्विशा शर्मा सुसाइड केस: हाईकोर्ट ने पूर्व जज गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द की
Neel Tiwari | May 28, 2026, 08:43 IST
twisha death case hc cancels former judge giribala singh anticipatory bail
भोपाल के चर्चित ट्विशा शर्मा सुसाइड केस में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व जज गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। सीबीआई जांच के बीच आए इस आदेश ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को दिए गए अग्रिम जमानत के आदेश को रद्द कर दिया है।
- कोर्ट ने कहा- ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की है।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर कई एंटीमॉर्टम चोटों का उल्लेख है।
- व्हाट्सएप चैट और गवाहों के बयानों में प्रताड़ना के आरोप है।
- सीबीआई को मामले में पक्षकार बनाया गया है।
News in detail
ट्रायल कोर्ट के आदेश पर HC की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला सामान्य परिस्थितियों वाला नहीं है, बल्कि विवाह के कुछ ही महीनों बाद हुई एक संदिग्ध मौत का गंभीर मामला है। इसमें जांच अभी प्रारंभिक स्तर पर है।
कोर्ट ने अपने आदेश में माना कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर भरोसा किया, जबकि केस डायरी, गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौजूद गंभीर तथ्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत जैसी असाधारण राहत का आदेश देते समय न्यायालय को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चोटों ने बढ़ाई गंभीरता
कोर्ट ने माना कि यह तथ्य जांच के लिए अहम है और ट्रायल कोर्ट को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मृतका गर्भवती थी और गर्भपात को लेकर परिवार में विवाद होने के आरोप भी रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया था कि मृतका पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया जा रहा था और उसके चरित्र पर संदेह किया जा रहा था।
व्हाट्सएप चैट, गवाहों के बयान और CCTV पर भी उठे सवाल
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि अग्रिम जमानत मिलने के बाद भी जांच में सहयोग नहीं किया गया। राज्य की ओर से नोटिसों का दिनांकवार ब्यौरा पेश किया गया और आरोप लगाया गया कि कई बार नोटिस मिलने के बावजूद बयान देने से बचा गया। सुनवाई में यह मुद्दा भी उठा कि पुलिस द्वारा सीज किए जाने के बाद भी कथित रूप से सीसीटीवी फुटेज के चयनित हिस्से मीडिया में प्रसारित किए गए, जिससे जांच प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न होती है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि प्रतिवादी एक सेवानिवृत्त जज हैं और उन्होंने साइबर फॉरेंसिक व क्राइम सीन मैनेजमेंट का प्रशिक्षण प्राप्त किया है, इसलिए साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सीबीआई जांच के बीच आया बड़ा आदेश
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि जमानत का आदेश अहम तथ्यों की अनदेखी कर दिया गया हो या वह न्याय के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत हो, तो उच्च न्यायालय उसमें हस्तक्षेप कर सकता है। अंततः कोर्ट ने 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भोपाल द्वारा 15 मई 2026 को पारित अग्रिम जमानत आदेश को रद्द करते हुए दोनों याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
इस आदेश के बाद अब पूरे मामले की नजर सीबीआई जांच और आगे की कानूनी कार्रवाई पर टिक गई है।
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