UGC के नए नियमों पर दिग्विजय सिंह का बयान, बोले- जरूरी सिफारिश को यूजीसी ने किया नजरअंदाज

UGC के नए नियमों पर विवाद और बढ़ गया है। इस बीच, कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने इस पूरे विवाद पर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि संसदीय स्थाई समिति की सिफारिशों को लेकर लोगों में गलतफहमी फैलाई जा रही है।

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Aman Vaishnav
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UGC के नए नियमों पर बोले दिग्विजय सिंह

देशभर के विश्वविद्यालयों में UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के नए इक्विटी रेगुलेशंस 2026 (UGC Equity Rule) को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। खासकर जनरल कैटेगरी छात्रों और शिक्षकों का एक बड़ा हिस्सा इन नए नियमों के खिलाफ है। साथ ही उन्होंने विरोध शुरू कर दिया है।

इस बीच, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अपने X अकाउंट पर पोस्ट के जरिए इस मामले में सफाई दी है। उन्होंने कहा कि संसदीय समिति की कुछ अहम सिफारिशों को यूजीसी ने नजरअंदाज कर दिया है।

दिग्विजय सिंह ने ये भी कहा कि यूजीसी ने झूठे मामले दर्ज करने वाले विद्यार्थियों को सजा देने का जो प्रावधान हटाया गया है, इसका संसदीय समिति से कोई लेना देना नहीं था। उन्होंने कहा कि इस मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय की है।

और क्या बोले दिग्विजय सिंह

दिग्विजय सिंह के मुताबिक, फरवरी 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की पहल के बाद, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर केंद्र सरकार और UGC ने नया ड्राफ्ट इक्विटी रेगुलेशंस जारी किया था। इसका मकसद था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि और दूसरे कारणों से होने वाला भेदभाव खत्म किया जाए।

फिर दिसंबर 2025 में शिक्षा पर संसद की स्थाई समिति ने इन नियमों की समीक्षा की और एक रिपोर्ट संसद में पेश की। समिति ने कहा कि ये नियम सही दिशा में हैं, लेकिन इन्हें और सख्त और साफ-साफ किया जाना चाहिए।

ये थी संसदीय समिति की सिफारिश

  • ओबीसी छात्रों और अन्य हितधारकों के उत्पीड़न को जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया जाए।

  • दिव्यांगता को भी भेदभाव के एक आधार के रूप में माना जाए।

  • इक्विटी कमेटी की संरचना में बदलाव किया जाए, ताकि 10 सदस्यों वाली समिति में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत से ज्यादा हो और निर्णय निष्पक्ष हों।

  • भेदभाव की स्पष्ट पहचान और उदाहरण नियमों में दिए जाएं, ताकि संस्थान मनमाने ढंग से किसी मामले को सही या गलत न ठहरा सके।

  • हर साल जातिगत भेदभाव के मामलों का सार्वजनिक खुलासा किया जाए, फैकल्टी और प्रशासन के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए, और छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता व कानूनी मदद सुनिश्चित की जाए।

सिफारिशों को UGC ने नजरअंदाज किया

जनवरी 2026 में UGC ने अंतिम इक्विटी रेगुलेशंस जारी किए। दिग्विजय सिंह के मुताबिक, UGC ने ओबीसी को शामिल करने, दिव्यांगता को भेदभाव के आधार मानने और वार्षिक रिपोर्ट, ट्रेनिंग व सहायता जैसे प्रावधानों को मंजूरी दे दी।

लेकिन, इक्विटी कमेटी में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ाने और भेदभाव की विस्तृत परिभाषा तय करने जैसी सिफारिशों को UGC ने नजरअंदाज कर दिया।

झूठे मामलों पर सजा हटाने का फैसला UGC का

 दिग्विजय सिंह ने आगे कहा कि झूठे मामलों पर सजा हटाने का फैसला UGC का अपना था, इसका संसदीय समिति से कोई लेना-देना नहीं है। जनरल कैटेगरी को सूची से बाहर रखने पर भी समिति ने कोई टिप्पणी नहीं की थी, और यह फैसला भी पूरी तरह UGC का है।

उन्होंने कहा कि अगर UGC ने भेदभाव की साफ परिभाषा और उदाहरण तय कर दिए होते, तो इससे वंचित वर्गों को सुरक्षा मिलती और फर्जी मामलों की संभावना भी कम हो जाती। यह बात संसदीय समिति ने भी कही थी, लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया गया।

पूरी जिम्मेदारी UGC और शिक्षा मंत्रालय की 

दिग्विजय सिंह के मुताबिक, अब मौजूदा गतिरोध को खत्म करने की पूरी जिम्मेदारी UGC और शिक्षा मंत्रालय पर है। उन्होंने कहा कि जो भ्रम इन नियमों को लेकर फैलाया गया है। उसे साफ किए बिना कैंपस का माहौल सामान्य नहीं हो सकता।

समझें UGC Regulations 2026 आखिर क्या है?

क्या है UGC और उसका नया रेगुलेशन?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026 लागू कर दिए हैं। इस नियम का मकसद कैंपस में जातिगत भेदभाव को रोकना और सभी वर्गों के लिए समान, सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करना बताया गया है। (UGC Regulations 2026 का राजपत्र देखिए)

सख्त कार्रवाई का डर

जीसी ने नए नियमों का पालन नहीं करने वाले कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कड़ी चेतावनी दी है। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो उस पर कार्रवाई की जाएगी। इसमें UGC की योजनाओं से बाहर करना, कोर्स बंद करना, ऑनलाइन और डिस्टेंस एजुकेशन पर रोक लगाना, और संस्थान की मान्यता रद्द करना शामिल है।

क्या है विरोध के पीछे की असली वजह?

इन नियमों में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जातियों से आने वाले छात्रों को भी शामिल किया गया है। जनरल कैटेगरी से आने छात्रों के साथ भेदभाव बताया जा रहा है। विरोध करने वालों का मानना है कि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है। सिर्फ जनरल कैटेगरी भर के होने से ही वो दोषी हो जाएंगे।

जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4) का गठन किया है, ताकि रेगुलेशन के खिलाफ संगठित विरोध किया जा सके। दुविधा यह है कि अब तक सरकार की ओर से कोई बड़ा नेता इस मसले पर बोलने को तैयार नहीं है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं और जिस UGC ने इस नियम को लागू किया है, उसके चेयरमैन विनीत जोशी हैं।

कैसे बनाई जाएंगी कमेटी

विवाद का मुख्य कारण इस कमेटी की संरचना है। सोशल मीडिया और जनरल कैटेगरी के कुछ समूहों का आरोप है कि इस कमेटी में आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC) के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य किया गया है, लेकिन जनरल कैटेगरी के लिए ऐसी कोई स्पष्ट अनिवार्यता नहीं लिखी गई है। इससे जनरल कैटेगरी को आशंका है कि उनकी सुनवाई निष्पक्ष नहीं होगी। आइए इसे बिंदुवार समझते हैं…

1. इक्विटी कमेटी (Equity Committee) जिस पर विवाद है

यूजीसी के नए 2026 के नियमों के अनुसार, हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी को भेदभाव की शिकायतों (जाति, धर्म, लिंग आदि) को सुनने के लिए एक कमेटी बनानी होगी। इसमें निम्नलिखित लोग अनिवार्य रूप से शामिल होने चाहिए। जैसे,
अध्यक्ष (Chairperson): संस्थान का प्रमुख (जैसे वाइस चांसलर या प्रिंसिपल)।
सदस्य (Members): नियमों के मुताबिक, कमेटी में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व होना ही चाहिए:

  • OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) के सदस्य
  • SC (अनुसूचित जाति) के सदस्य
  • ST (अनुसूचित जनजाति) के सदस्य
  • महिलाएं (Women)
  • दिव्यांगजन (Persons with Disabilities)
  • एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर: एक सीनियर फैकल्टी मेंबर

विवाद का बिंदु: आलोचकों का कहना है कि नियमों में यह स्पष्ट नहीं लिखा है कि कमेटी में अनारक्षित (General) वर्ग का कोई सदस्य अनिवार्य होगा या नहीं। इसे लेकर डर है कि कमेटी एकतरफा हो सकती है।

2. राष्ट्रीय निगरानी समिति (National Monitoring Committee)

इन नियमों को लागू करवाने के लिए यूजीसी राष्ट्रीय स्तर पर भी एक कमेटी बनाएगी। इसमें ये लोग होंगे:

  • यूजीसी के प्रतिनिधि।
  • वैधानिक परिषदों (जैसे AICTE, NMC) के प्रतिनिधि।
  • सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) के सदस्य।

3. वह लोग जिन्होंने यह नियम बनाया (UGC Commission)

इस विवाद के संदर्भ में केंद्रीय स्तर पर मुख्य रूप से दो कमेटियों की भूमिका है। पहली वह जो यूजीसी का संचालन करती है (UGC Commission) और जिसने इन नियमों को मंजूरी दी है। दूसरी वह राष्ट्रीय निगरानी समिति जो नए नियमों के तहत अब बनाई जाएगी। चूंकि राष्ट्रीय निगरानी समिति अभी हाल ही में (जनवरी 2026) अधिसूचित हुई है, इसलिए उसके सभी सदस्यों के नाम अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।

जातिगत भेदभाव की शिकायत कैसे करें

यूजीसी ने जातिगत भेदभाव की शिकायत करने के तरीके भी बताए हैं। यदि कोई छात्र, शिक्षक, या कर्मचारी भेदभाव का शिकार होता है, तो वह हेल्पलाइन, ईमेल या ऑनलाइन पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज कर सकता है। लिखित शिकायत भी दी जा सकती है। अगर मामला गंभीर होता है, तो उसे पुलिस के पास भेजा जाएगा।

अगर शिकायतकर्ता इक्विटी कमेटी की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होता, तो वह एक महीने के अंदर कॉलेज या विश्वविद्यालय में बनाए गए ऑम्बड्समैन के पास अपील कर सकता है। वहां तय समय में निर्णय लिया जाएगा। इसके अलावा, यूजीसी इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा और रैंडम इंस्पेक्शन करके यह सुनिश्चित करेगा कि नियम सही तरीके से लागू हो रहे हैं।

यह नियम किसकी सिफारिश पर लागू हुआ?

यह नियम संसद की शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की संसदीय समिति की सिफारिश पर लागू हुआ है। इस समिति ने 8 दिसंबर 2025 को यूजीसी के ड्राफ्ट रेगुलेशंस की समीक्षा करने के बाद रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। समिति के चेयरमैन, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह हैं। इसी समिति ने यूजीसी को कुछ सिफारिशें दीं, जिसके आधार पर भेदभाव वाले नियम में ओबीसी को भी जाति आधारित डिस्क्रिमिनेशन में शामिल किया गया।

इससे पहले ओबीसी जातियों को यूजीसी के ड्राफ्ट में शामिल नहीं किया गया था। इसके अलावा, इस समिति ने सिफारिश की कि Equity Committee में SC/ST/OBC से आधे से ज्यादा प्रतिनिधि होने चाहिए। इन सिफारिशों के बाद यूजीसी ने जनवरी 2026 में फाइनल रेगुलेशंस में बदलाव करते हुए इसे नोटिफाई किया, जिसमें ओबीसी को शामिल किया गया और झूठी शिकायत पर जुर्माने का प्रावधान हटा दिया गया।

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