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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- सुप्रीम कोर्ट ने MP सरकार को धारा 196 BNS के तहत अभियोजन स्वीकृति पर 2 हफ्ते में निर्णय का आदेश दिया।
- मंत्री विजय शाह की माफी को कोर्ट ने “मगरमच्छ के आंसू” बताया।
- SIT जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंप चुकी है, कोर्ट खुद मामले की निगरानी कर रहा है।
- तत्काल गिरफ्तारी या बर्खास्तगी की संभावना फिलहाल नहीं।
- जनता और विपक्ष का आरोप-“यदि आम आदमी होता तो अब तक कड़ी कार्रवाई हो चुकी होती।”
News in detail
मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए गए विवादित बयान ने देशभर में तीखी बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अभियोजन स्वीकृति पर दो सप्ताह में फैसला लेने का स्पष्ट निर्देश देकर मामला निर्णायक मोड़ पर ला दिया है। अब बड़ा सवाल यही है। क्या विजय शाह पर वास्तव में कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
मंत्री विजय शाह ने 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में सेना की वरिष्ठ अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। बयान में कर्नल सोफिया को “आतंकियों की बहन” जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया। यह बयान न केवल सेना के सम्मान से जुड़ा बताया गया, बल्कि इसे सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाला भी माना गया।
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सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले SIT जांच के आदेश दिए और मंत्री की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाई। हालांकि, जब विजय शाह ने माफी मांगी तो शीर्ष अदालत ने उसे स्वीकार करने से इनकार करते हुए तीखी टिप्पणी की और इसे “मगरमच्छ के आंसू” करार दिया। 18-19 जनवरी 2026 की सुनवाई में कोर्ट ने साफ कहा कि अब राज्य सरकार अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय लेने में और देरी नहीं कर सकती।
अब कानूनी तौर पर क्या हो सकता है
यदि मध्य प्रदेश सरकार धारा 196 BNS के तहत अभियोजन स्वीकृति देती है, तो मंत्री विजय शाह के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलेगा। उन पर सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, सेना के सम्मान को ठेस पहुंचाने और सार्वजनिक शांति भंग करने से जुड़ी धाराएं लग सकती हैं। SIT की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के चलते यह मुकदमा सामान्य मामलों की तुलना में अधिक सख्ती से आगे बढ़ सकता है।
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दोष सिद्ध होने पर ही बर्खास्तगी
फिलहाल विजय शाह की तत्काल गिरफ्तारी या मंत्री पद से स्वतः बर्खास्तगी की संभावना नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत बर्खास्तगी तभी संभव है, जब दोष सिद्ध हो या राजनीतिक स्तर पर मुख्यमंत्री ऐसा निर्णय लें। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि वह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अभियोजन स्वीकृति: असली अड़चन
इस पूरे मामले का सबसे अहम कानूनी पहलू है अभियोजन स्वीकृति। अधिवक्ता मोहित वर्मा के अनुसार, “भारतीय दंड संहिता की धारा 196 के तहत मंत्री जैसे जनप्रतिनिधि पर मुकदमा चलाने से पहले राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य है। यहीं पर अक्सर राजनीतिक संरक्षण और देरी की गुंजाइश बनती है।” हालांकि, इस बार सुप्रीम कोर्ट की सख्त समय-सीमा सरकार की मुश्किलें बढ़ा रही है।
क्या सरकार मामला दबा सकती है?
कानूनी मामलों की जानकारी अधिवक्ता मोहित वर्मा ने बताया कि सैद्धांतिक रूप से सरकार अभियोजन स्वीकृति से इनकार कर सकती है, लेकिन ऐसा करना अब आसान नहीं होगा।
क्योंकि SIT की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने है और पूरा मामला न्यायिक निगरानी में चल रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार टालमटोल करती है, तो अदालत और सख्त रुख अपना सकती है।
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जनता की राय: कानून सबके लिए बराबर?
जब इस मुद्दे पर आम नागरिकों से बात की गई तो नाराजगी साफ दिखी। पेरेंट्स एसोसिएशन के सचिन गुप्ता का कहना है, “ऐसे मामलों में अक्सर देखा गया है कि बड़े नेताओं के केस आगे चलकर दबा दिए जाते हैं। यदि यही बयान किसी आम व्यक्ति ने दिया होता, तो अब तक उसके घर पर बुलडोजर चल चुका होता।” उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर्वमान्य है, लेकिन राजनीति न्यायपालिका पर भी भारी पड़ती दिखती है।
राजनीति बनाम न्याय का टकराव
विपक्ष ने मंत्री विजय शाह के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है, वहीं सत्तापक्ष इसे बयान की “गलत व्याख्या” बताने की कोशिश करता रहा है।
सोशल मीडिया पर सेना के सम्मान और संवैधानिक जिम्मेदारी को लेकर तीखी बहस चल रही है। यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ बयान का नहीं, बल्कि कानून की निष्पक्षता और राजनीतिक जवाबदेही की कसौटी बन चुका है।
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आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद गेंद अब पूरी तरह मध्य प्रदेश सरकार के पाले में है। अगले दो सप्ताह में यह तय हो जाएगा कि मंत्री विजय शाह पर कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा या सरकार राजनीतिक जोखिम उठाकर अभियोजन स्वीकृति से इनकार करेगी।
फिलहाल इतना तय है कि इस बार मामला आसानी से दब जाना उतना सरल नहीं दिखता। क्योंकि नजरें सिर्फ सरकार पर नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी टिकी हैं।
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