क्रिकेटर क्रांति गौड़ के पिता की नौकरी बहाल, उर्वशी पूछती है– मेरे पापा ने क्या गुनाह किया?
Sourabh Bhatnagar | Jan 06, 2026, 12:24 IST
cricketer kranti father police service
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने क्रिकेटर क्रांति गौड़ के पिता मुन्ना सिंह की वर्षों से निलंबित नौकरी को पुनः बहाल कर दिया। यह मामला 13 साल बाद सुलझा।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेटर क्रांति गौड़ से किया अपना वादा पूरा कर लिया है। उन्होंने क्रांति के पिता मुन्ना सिंह की निलंबित नौकरी को पुनः बहाल कर दिया।
क्रांति गौड़ के पिता मुन्ना सिंह गौड़ की बहाली "नो वर्क, नो पे" के सिद्धांत पर की गई है। 8 जून 2012 से 5 जनवरी 2026 तक का लगभग 13 साल का वेतन नहीं मिलेगा।
क्या एक पिता की गलती को बेटी की उपलब्धि से तौला जा सकता है?
क्या सेवा शर्तों का उल्लंघन एक ‘राष्ट्र गौरव बेटी’ की कामयाबी से भारी पड़ा है?
हम ऐसा क्यों कह रहे हैं... चलिए बताते हैं....
यह घटना तब की है जब महिला वनडे वर्ल्ड कप में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। इसके बाद एक सम्मान समारोह आयोजित किया गया था।
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इस समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने क्रांति गौड़ को उनके शानदार प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया था। उसी दौरान, क्रांति ने अपने पिता की निलंबित नौकरी का मामला मुख्यमंत्री के सामने रखा। मुख्यमंत्री ने वादा किया कि वह इस मुद्दे को हल करेंगे। बता दें क्रांति को एमपी सरकार ने 1 करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी है।
मुख्यमंत्री के कहने पर पुलिस मुख्यालय ने मुन्ना सिंह की नौकरी फिर से बहाल करने का आदेश दे दिया।
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बता दें कि मुन्ना सिंह पहले मध्यप्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल थे, लेकिन 2012 में चुनावी ड्यूटी के दौरान लापरवाही के कारण उन्हें निलंबित कर दिया गया था। अब 13 साल बाद मुख्यमंत्री डॉ. यादव की पहल से उनका मामला हल हो गया है और उन्हें फिर से नौकरी पर वापस ले लिया गया है।
क्रांति गौड़ के पिता मुन्ना सिंह गौड़ ने बताया था कि वह वर्ष 1993 में पुलिस सेवा में बतौर सिपाही भर्ती हुए थे। वर्ष 2007 में थाना भगवां में पदस्थापना के दौरान थाने से सात किमी दूर चुनाव ड्यूटी में जाना पड़ा। ड्यूटी समय को लेकर उनका अपने साथी सिपाही मुन्नीलाल पाल से कहासुनी हुई। मुन्नीलाल ने गुस्से में आकर मुझे बंदूक की बट दे मारी।
इसकी शिकायत मैंने तत्कालीन थाना प्रभारी एलपी अहिरवार से की। उन्होंने हम दोनों सिपाहियों को मेडिकल के लिए भेजा। मेरे चेहरे पर सूजन थी। एमएलसी में तत्कालीन चिकित्सक शैकवार ने मेरी रिपोर्ट में मिलीभगत के चलते अल्कोहल सेवन लिख दिया, जबकि मैंने शराब नहीं पी थी। प्रकरण में करीब तीन साल चली विभागीय जांच के बाद हम दोनों सिपाहियों को बर्खास्त कर दिया गया।
गौड़ ने बताया कि मैंने तत्कालीन पुलिस महानिदेशक से भी अपनी बेगुनाही की गुहार लगाई। इसका परिणाम यह हुआ कि रेंज के तत्कालीन उप पुलिस महानिरीक्षक वेदप्रकाश शर्मा ने प्रकरण की सुनवाई की और दोनों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी। मुन्नीलाल पाल की सेवा को 20 साल हो चुके थे, लिहाजा पाल को तो रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाएं मिली, लेकिन मेरी सेवा सिर्फ 19 साल होने से मुझे पेंशन सुविधा का लाभ नहीं मिल सका।
क्रांति की जीत ने एक ओर जहां गर्व का माहौल बनाया है। वहीं दूसरी ओर पुलिस महकमे में यह बहस तेज है कि क्या भावनाओं के नाम पर अनुशासन का गला घोंटा जा सकता है?
वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि संवेदना जरूरी है, लेकिन सिस्टम के अपने नियम हैं। दूसरी तरफ जनता कह रही है कि जिस बेटी ने देश का मान बढ़ाया, उसके पिता को भी मान मिलना चाहिए था
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मुन्ना सिंह की ही तरह देवास जिले के टोंक खुर्द निवासी चंद्रमोहन सिंह भदौरिया मध्यप्रदेश पुलिस में थे। उन्हें सरकार ने वीआरएस देकर घर बिठा दिया। ये तब है, जब भदौरिया ने मध्यप्रदेश के लिए कई बार अपनी जान की बाजी तक लगा दी।
वे कहते हैं, ये बात 2005 की है। मैं बालाघाट जिले के लांजी में पदस्थ था। उसी दौरान ग्वालियर अंचल में एक नरसंहार हुआ था। हमें वहां जाने के लिए कहा गया। नियम के अनुसार, हमने अपने हथियार जबलपुर में जमा करा दिए थे। इसके बाद हम ग्वालियर रवाना हो गए। विवाद शांत हो गया। मैं अपनी नियमित ड्यूटी पर आ गया।
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2008 में मेरे पास विभाग से फोन आया कि आपकी पिस्टल नहीं मिल रही। इसके बाद बिना विभागीय जांच के मुझ पर एफआईआर कर दी गई। इस अवधि में मैंने विभाग के लिए कई काम किए। मुझे रिवॉर्ड भी मिले। मैडल मिले। एसटीएफ इंदौर, हॉट फोर्स बालाघाट, सीटीजी भोपाल, एटीएस, ग्वालियर डकैती उन्मूलन जैसी चुनौती पूर्ण जगहों पर काम किया।
पन्ना में मोहन एनकाउंटर और सिमी के गिरफ्तारी ऑपरेशन में शामिल रहे। फिर 2020 में इस मामले की विभागीय जांच की गई, जबकि नियम कहता है कि किसी भी मामले की जांच एक साल के भीतर होनी चाहिए। इस जांच के बाद मुझे घर बिठा दिया गया। मैंने मामला कोर्ट में लगाया है।
अब चंद्रमोहन सिंह भदौरिया की 23 साल की बिटिया उर्वशी पूछती है कि मेरे पापा ने प्रदेश के लिए इतना कुछ किया, फिर सरकार ने उनके साथ ऐसा अन्याय क्यों किया?
रिटायर्ड डीआईजी डीआर तेनीवार कहते हैं, बर्खास्तगी के मामले में संबंधित को दया याचिका लगानी होती है। यदि डीजीपी के स्तर पर यह मंजूर होती है तो संबंधित को नौकरी पर दोबारा रख लिया जाता है। हां, इसमें यह जरूर ध्यान रखा जाता है कि याचिकाकर्ता की उम्र 60 साल से कम होनी चाहिए। क्रांति गौड़ के पिता मुन्ना सिंह के मामले में तो निर्णय शासन स्तर पर हो गया था, इसलिए इस केस में वैसे भी कोई परेशानी नहीं हुई।
क्रांति गौड़ ने हमेशा अपने पिता को सम्मानित पुलिस वर्दी में देखना चाहा। इस निर्णय से उनका सपना पूरा हुआ है। यह कदम उनके परिवार के लिए बहुत मायने रखता है, और अब वे अपने पिता को सम्मानपूर्वक पुलिस वर्दी में सेवानिवृत्त होते देख पाएंगे।
क्रांति गौड़...एक नाम, जिसने मैदान पर गेंद से जो कमाल किया, उसने पूरे प्रदेश और देश को गर्व और गौरव से भर दिया है। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की यह ‘छोटी सी शेरनी’ अब हर दिल की धड़कन बन चुकी है।
महिला क्रिकेट वर्ल्डकप में उनके प्रदर्शन ने सबको दीवाना बना दिया। सोशल मीडिया पर क्रांति का नाम ट्रेंड कर रहा है। गली-गली में बच्चियां अब उन्हीं की तरह गेंद और बल्ला थामने का ख्वाब देख रही हैं।
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दाएं हाथ की तेज गेंदबाज क्रांति गौड़ मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के घुवारा नामक छोटे से गांव की निवासी हैं। उनका गांव, जो खजुराहो से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, अपने मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। क्रांति छह भाई-बहनों में एक हैं
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आईटीआई एक्टिविस्ट आनंद राय ने गौड़ को लेकर अपने फेसबुक पर एक पोस्ट किया था। राय लिखते हैं, अगर क्रांति गौड़ स्नातक (ग्रेजुएट) होतीं, तो सरकार उन्हें स्पोर्ट्स कोटे से DSP बना सकती थी। चूंकि वह अभी सिर्फ आठवीं पास हैं, इसलिए सरकार उन्हें रानी दुर्गावती सशस्त्र महिला बटालियन में फिलहाल सूबेदार या सब-इंस्पेक्टर के पद पर ही नियुक्त कर सकती है।
हालांकि, क्रांति की उम्र अभी मात्र 23 साल है। अगर वह अगले कुछ सालों में पढ़ाई जारी रखते हुए स्नातक की डिग्री हासिल कर लेती हैं, तो भविष्य में DSP बनना उनके लिए पूरी तरह संभव है।
विमेंस प्रीमियर लीग WPL में पहली बार मध्यप्रदेश की 5 खिलाड़ी, क्रांति गौड़ भी शमिल
क्रांति गौड़ के पिता मुन्ना सिंह गौड़ की बहाली "नो वर्क, नो पे" के सिद्धांत पर की गई है। 8 जून 2012 से 5 जनवरी 2026 तक का लगभग 13 साल का वेतन नहीं मिलेगा।
लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि-
क्या सेवा शर्तों का उल्लंघन एक ‘राष्ट्र गौरव बेटी’ की कामयाबी से भारी पड़ा है?
हम ऐसा क्यों कह रहे हैं... चलिए बताते हैं....
क्रिकेटर की सिफारिश पर बहाली
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इस समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने क्रांति गौड़ को उनके शानदार प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया था। उसी दौरान, क्रांति ने अपने पिता की निलंबित नौकरी का मामला मुख्यमंत्री के सामने रखा। मुख्यमंत्री ने वादा किया कि वह इस मुद्दे को हल करेंगे। बता दें क्रांति को एमपी सरकार ने 1 करोड़ रुपए की सम्मान राशि दी है।
मुख्यमंत्री ने पूरी किया वादा
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बता दें कि मुन्ना सिंह पहले मध्यप्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल थे, लेकिन 2012 में चुनावी ड्यूटी के दौरान लापरवाही के कारण उन्हें निलंबित कर दिया गया था। अब 13 साल बाद मुख्यमंत्री डॉ. यादव की पहल से उनका मामला हल हो गया है और उन्हें फिर से नौकरी पर वापस ले लिया गया है।
2012 का वो दिन...
साथी सिपाही ने चेहरे पर मारी थी बंदूक की बट
डॉक्टर की लापरवाही ने शराबी बता दिया
लगाई थी बेगुनाही की गुहार
अब प्रदेश में दो आवाज, संवेदना बनाम सख्ती
वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि संवेदना जरूरी है, लेकिन सिस्टम के अपने नियम हैं। दूसरी तरफ जनता कह रही है कि जिस बेटी ने देश का मान बढ़ाया, उसके पिता को भी मान मिलना चाहिए था
अब एक दूसरे उदाहरण से समझिए...
Chandramohan Singh Bhadauria
उर्वशी पूछती है– मेरे पापा ने क्या गुनाह किया? द सूत्र ने उठाया था मुद्दा
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इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर...
मुन्ना सिंह की ही तरह देवास जिले के टोंक खुर्द निवासी चंद्रमोहन सिंह भदौरिया मध्यप्रदेश पुलिस में थे। उन्हें सरकार ने वीआरएस देकर घर बिठा दिया। ये तब है, जब भदौरिया ने मध्यप्रदेश के लिए कई बार अपनी जान की बाजी तक लगा दी।
वे कहते हैं, ये बात 2005 की है। मैं बालाघाट जिले के लांजी में पदस्थ था। उसी दौरान ग्वालियर अंचल में एक नरसंहार हुआ था। हमें वहां जाने के लिए कहा गया। नियम के अनुसार, हमने अपने हथियार जबलपुर में जमा करा दिए थे। इसके बाद हम ग्वालियर रवाना हो गए। विवाद शांत हो गया। मैं अपनी नियमित ड्यूटी पर आ गया।
Chandramohan Singh Bhadauria
2008 में मेरे पास विभाग से फोन आया कि आपकी पिस्टल नहीं मिल रही। इसके बाद बिना विभागीय जांच के मुझ पर एफआईआर कर दी गई। इस अवधि में मैंने विभाग के लिए कई काम किए। मुझे रिवॉर्ड भी मिले। मैडल मिले। एसटीएफ इंदौर, हॉट फोर्स बालाघाट, सीटीजी भोपाल, एटीएस, ग्वालियर डकैती उन्मूलन जैसी चुनौती पूर्ण जगहों पर काम किया।
पन्ना में मोहन एनकाउंटर और सिमी के गिरफ्तारी ऑपरेशन में शामिल रहे। फिर 2020 में इस मामले की विभागीय जांच की गई, जबकि नियम कहता है कि किसी भी मामले की जांच एक साल के भीतर होनी चाहिए। इस जांच के बाद मुझे घर बिठा दिया गया। मैंने मामला कोर्ट में लगाया है।
अब चंद्रमोहन सिंह भदौरिया की 23 साल की बिटिया उर्वशी पूछती है कि मेरे पापा ने प्रदेश के लिए इतना कुछ किया, फिर सरकार ने उनके साथ ऐसा अन्याय क्यों किया?
क्या कहते हैं एक्सपर्ट...
क्रांति का सपना हुआ साकार
कौन हैं क्रांति गौड़?
महिला क्रिकेट वर्ल्डकप में उनके प्रदर्शन ने सबको दीवाना बना दिया। सोशल मीडिया पर क्रांति का नाम ट्रेंड कर रहा है। गली-गली में बच्चियां अब उन्हीं की तरह गेंद और बल्ला थामने का ख्वाब देख रही हैं।
एमपी के छोटे से गांव से आती हैं क्रांति गौड़
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दाएं हाथ की तेज गेंदबाज क्रांति गौड़ मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के घुवारा नामक छोटे से गांव की निवासी हैं। उनका गांव, जो खजुराहो से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, अपने मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। क्रांति छह भाई-बहनों में एक हैं
खेल की चैंपियन, पर शिक्षा ने DSP बनने से रोका
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आईटीआई एक्टिविस्ट आनंद राय ने गौड़ को लेकर अपने फेसबुक पर एक पोस्ट किया था। राय लिखते हैं, अगर क्रांति गौड़ स्नातक (ग्रेजुएट) होतीं, तो सरकार उन्हें स्पोर्ट्स कोटे से DSP बना सकती थी। चूंकि वह अभी सिर्फ आठवीं पास हैं, इसलिए सरकार उन्हें रानी दुर्गावती सशस्त्र महिला बटालियन में फिलहाल सूबेदार या सब-इंस्पेक्टर के पद पर ही नियुक्त कर सकती है।
हालांकि, क्रांति की उम्र अभी मात्र 23 साल है। अगर वह अगले कुछ सालों में पढ़ाई जारी रखते हुए स्नातक की डिग्री हासिल कर लेती हैं, तो भविष्य में DSP बनना उनके लिए पूरी तरह संभव है।
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