गंभीर आपराधिक आरोप तय होने पर नहीं लड़ सकते चुनाव, हाई कोर्ट ने कहा- चुनाव लड़ना मौलिक नहीं, वैधानिक अधिकार
Jageshwar prasad | Oct 08, 2026, 14:26 IST
राजस्थान हाई कोर्ट ने गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधान को वैध ठहराया।
राजस्थान हाई कोर्ट ने निकाय चुनावों में गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे आरोपियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधान को बरकरार रखा है।चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक नहीं बल्कि वैधानिक है। कोर्ट ने कहा कि निर्णय से स्थानीय संस्थाओं में जनता का विश्वास बढ़ेगा और चुनावों की गुणवत्ता में सुधार होगा।
राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) की जोधपुर मुख्यपीठ ने निकाय चुनावों में गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे आरोपियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले प्रावधान की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। साथ ही राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, 2009 (Rajasthan Municipalities Act 2009) की धारा 24 (iii) को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट के सीजे संजय के. अग्रवाल और जस्टिस मुत्रूरी लक्ष्मण की बैंच ने यह आदेश बुद्धदान की याचिका पर दिया। बैंच ने कहा कि यह प्रावधान दो चरणों में न्यायिक जांच के तौर पर दोहरी सुरक्षा देता है। यानी संज्ञान लेने के चरण में और आरोप तय करने के चरण में।
खंडपीठ ने कहा कि इस प्रावधान का विधायी उद्देश्य स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की अखंडता और उनमें जनता के विश्वास को बनाए रखना है। अगर गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके हैं तो ऐसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना उचित है।इससे जनप्रतिनिधियों में जनता का भरोसा बना रहता है। यह प्रावधान लोकतंत्र की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि विधायिका का यह कदम तर्कसंगत है।
हाई कोर्ट ने कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है। बल्कि यह कानून से प्राप्त वैधानिक अधिकार है। राज्य विधानमंडल को नगर निकाय चुनावों के लिए योग्यताएं और अयोग्यताएं निर्धारित करने का अधिकार है।
संविधान भी राज्य विधानमंडल को ऐसी अयोग्यताएं निर्धारित करने की मंजूरी देता है। इसलिए यह प्रावधान संविधान के दायरे में है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोहरे चरण की जांच से किसी के साथ अन्याय नहीं होता। यह प्रक्रिया निष्पक्ष है।
खंडपीठ ने कहा कि यह प्रावधान दो चरणों में न्यायिक जांच की व्यवस्था देता है। पहला चरण संज्ञान लेने का है। दूसरा चरण आरोप तय करने का है।
इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल गंभीर मामलों में ही आरोपी को चुनाव लड़ने से रोका जाए। मामूली या झूठे मामलों में इसका दुरुपयोग नहीं हो सकता। यह दोहरी सुरक्षा न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाती है।
बुद्धदान ने इस प्रावधान को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि यह प्रावधान उनके चुनाव लड़ने के अधिकार का हनन करता है। लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि विधानमंडल को यह अधिकार है कि वह चुनाव लड़ने के लिए शर्तें तय करे। अगर कोई व्यक्ति गंभीर आपराधिक मामले में आरोपी है तो उसे चुनाव लड़ने से रोकना जनहित में है। इसलिए याचिका खारिज की जाती है।
यह फैसला निकाय चुनावों के लिए अहम है। इससे गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का चुनाव में आना मुश्किल होगा। इससे स्थानीय संस्थाओं की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
साथ ही यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव लड़ना कोई पूर्ण अधिकार नहीं है। इस पर कानूनी शर्तें लागू हो सकती हैं। अब देखना जरूरी है कि इसका आगे क्या असर पड़ता है।
हाई कोर्ट के सीजे संजय के. अग्रवाल और जस्टिस मुत्रूरी लक्ष्मण की बैंच ने यह आदेश बुद्धदान की याचिका पर दिया। बैंच ने कहा कि यह प्रावधान दो चरणों में न्यायिक जांच के तौर पर दोहरी सुरक्षा देता है। यानी संज्ञान लेने के चरण में और आरोप तय करने के चरण में।
क्या है राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, 2009 का उद्देश्य
क्या है चुनाव लड़ने का अधिकार?
संविधान भी राज्य विधानमंडल को ऐसी अयोग्यताएं निर्धारित करने की मंजूरी देता है। इसलिए यह प्रावधान संविधान के दायरे में है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोहरे चरण की जांच से किसी के साथ अन्याय नहीं होता। यह प्रक्रिया निष्पक्ष है।
हाई कोर्ट ने दिया दोहरी सुरक्षा का तर्क
इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल गंभीर मामलों में ही आरोपी को चुनाव लड़ने से रोका जाए। मामूली या झूठे मामलों में इसका दुरुपयोग नहीं हो सकता। यह दोहरी सुरक्षा न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाती है।
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
कोर्ट ने कहा कि विधानमंडल को यह अधिकार है कि वह चुनाव लड़ने के लिए शर्तें तय करे। अगर कोई व्यक्ति गंभीर आपराधिक मामले में आरोपी है तो उसे चुनाव लड़ने से रोकना जनहित में है। इसलिए याचिका खारिज की जाती है।
फैसला निकाय चुनावों के लिए अहम
साथ ही यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव लड़ना कोई पूर्ण अधिकार नहीं है। इस पर कानूनी शर्तें लागू हो सकती हैं। अब देखना जरूरी है कि इसका आगे क्या असर पड़ता है।
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