समझें क्या है पूरा मामला
- बांसवाड़ा का उमराखाल गांव 40 साल से चुन रहा निर्विरोध वार्ड पंच।
- 150 परिवार जाजम पर बैठकर करते हैं उम्मीदवार का फैसला।
- गांव में इस बार भी सतवीर निनामा के नाम पर सहमति।
- शराब, डीजे और तंबाकू जैसी बुराइयों से गांव ने बनाई दूरी।
- सर्वसम्मति की परंपरा से उमराखाल बना मिसाल।
बांसवाड़ा जिले का उमराखाल गांव 40 साल से वार्ड पंच निर्विरोध चुन रहा है। यहां 150 परिवार एक साथ बैठकर सर्वसम्मति से फैसला करते हैं। इस बार भी ग्रामीणों ने एक नाम पर सहमति बना ली है। सतवीर निनामा या उनकी पत्नी को निर्विरोध वार्ड पंच बनाने का प्रस्ताव पास हुआ है। गांव शराब, डीजे और तंबाकू जैसी बुराइयों से भी दूरी बनाए हुए है।
चुनाव आते ही गांवों में अक्सर गुटबाजी और खींचतान शुरू हो जाती है। पर बांसवाड़ा का उमराखाल गांव इससे बिल्कुल अलग है। यहां चुनाव में शह-मात का खेल नहीं खेला जाता। केसरपुरा पंचायत का यह गांव जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर दूर है। यहां के 150 परिवार एक जाजम पर बैठते हैं। फिर सब मिलकर अपना वार्ड पंच चुन लेते हैं।
40 साल पुरानी परंपरा
गांव में यह परंपरा पिछले 40 साल से चल रही है। इस दौरान न कोई राजनीतिक कड़वाहट दिखी, न कोई रंजिश। हर पांच साल में गांव फिर से एक नाम पर सहमति बनाता है। इस बार भी निर्विरोध चुनाव की तैयारी पूरी हो चुकी है। गांव में 150 परिवारों के करीब 450 मतदाता हैं।
राजस्थान में मुख्यमंत्री कृषक साथी सहायता योजना: जानें किसानों को कैसे मिलती है आर्थिक सहायता?25 Sept 2026 ,
By Jageshwar prasad
राजस्थान सरकार ने किसानों और खेत मजदूरों के लिए मुख्यमंत्री कृषक साथी सहायता योजना शुरू की है, जो उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। यह योजना आकस्मिक परिस्थितियों में होने वाली मृत्यु या गंभीर चोट के लिए वित्तीय सहायता देती है, जिसमें राशि ₹5,000 से लेकर ₹2,00,000 तक हो सकती है।
राजस्थान सरकार ने किसानों और खेत मजदूरों के लिए मुख्यमंत्री कृषक साथी सहायता योजना शुरू की है, जो उन्हें आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है। यह योजना आकस्मिक परिस्थितियों में होने वाली मृत्यु या गंभीर चोट के लिए वित्तीय सहायता देती है, जिसमें राशि ₹5,000 से लेकर ₹2,00,000 तक हो सकती है।
मंदिर पर हुई बैठक
हाल ही में गांव के माताजी मंदिर पर एक बैठक हुई। यह बैठक एकता ग्राम संगठन उमराखाल ने बुलाई थी। इसकी अध्यक्षता दिनेश मईड़ा ने की।बैठक में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया। इसके मुताबिक सतवीर निनामा या उनकी पत्नी निर्विरोध वार्ड पंच बनेंगे। हर बार की तरह इस बार भी फैसला सामूहिक बैठक में ही हुआ।
निर्विरोध चुनाव का मतलब
वार्ड पंच ग्राम पंचायत का सदस्य होता है। वह अपने वार्ड के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। गांव की समस्याएं पंचायत तक पहुंचाना उसकी अहम जिम्मेदारी होती है। जब किसी वार्ड से सिर्फ एक ही उम्मीदवार मैदान में हो, तो मतदान नहीं होता। उस उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है। उमराखाल में ग्रामीण आपसी सहमति से यही रास्ता अपनाते हैं।
कौन-कौन रहे वार्ड पंच
पिछले 40 साल में गांव ने कई वार्ड पंच निर्विरोध चुने हैं। सबसे पहले वालू पुत्र केरेंग मईड़ा पांच साल के लिए चुने गए। इसके बाद मांगू पुत्र पुंजा 10 साल तक वार्ड पंच रहे। कालूराम पुत्र शंभु मईड़ा सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहे। वे 15 साल तक निर्विरोध वार्ड पंच रहे। शारदा पुत्र कन्हैयालाल पांच साल वार्ड पंच रहीं। रमिया पत्नी विकास डोडियार भी पांच साल के लिए निर्विरोध चुनी गईं। इन सभी का कुल कार्यकाल जोड़ें तो यह 40 साल बनता है। यानी चार दशक में एक बार भी यहां वार्ड पंच के लिए वोटिंग नहीं हुई।
सरपंच ने भी देखी परंपरा
कालूराम मईड़ा अब केसरपुरा ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने बचपन से यह परंपरा देखी है। अब वे खुद इसे आगे बढ़ा रहे हैं। कालूराम खुद तीन बार निर्विरोध वार्ड पंच चुने जा चुके हैं। उनका कहना है कि गांव इसी तरह आगे भी सर्वसम्मति से फैसले करता रहेगा।
बुराइयों से भी दूरी
उमराखाल की पहचान सिर्फ निर्विरोध चुनाव से नहीं है। गांव ने समाज सुधार के लिए भी कई फैसले लिए हैं।गांव के समाजसेवी दिनेश मईड़ा के मुताबिक यहां शराबबंदी लागू की गई है। डीजे, तंबाकू और अंधविश्वास पर भी लगाम लगाई गई है। उनका कहना है कि निर्विरोध चुनाव भी इन्हीं सामूहिक फैसलों का हिस्सा है।
परंपरा तोड़ने पर जुर्माना
दिनेश मईड़ा के अनुसार गांव के नियम तोड़ने पर आर्थिक जुर्माना लगता है। इस राशि से गांव में सामूहिक विकास के काम कराए जाते हैं। गांव में माताजी का मंदिर भी सबके मिलेजुले प्रयास से बनाया गया है।
दूसरे गांवों के लिए मिसाल
पंचायत चुनाव में कई बार छोटी बातों पर विवाद हो जाते हैं। कई जगह रिश्तों में दरार तक आ जाती है। ऐसे माहौल में उमराखाल का तरीका अलग दिखता है।यहां फैसला बैठकर, बातचीत से और सबकी मौजूदगी में होता है। ग्रामीणों का मानना है कि इससे गांव में एकता बनी रहती है। चुनाव का खर्च और तनाव भी बचता है।