बेणेश्वर मेला 2026: आदिवासियों का कुंभ, यहां है अस्थि विसर्जन की अनूठी परम्परा

Purshottam Kumar Joshi | Jan 27, 2026, 14:07 IST
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beneswar fair
Photograph: (the sootr)

राजस्थान के डूंगरपुर में बेणेश्वर मेला 28 जनवरी से 1 फरवरी तक होगा। इसमें आदिवासी समुदाय यहां अस्थि विसर्जन कर मोक्ष की कामना करता है। इस बार मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को टोल में भी छूट दी गई है।

News In Short

  • राजस्थान के डूंगरपुर में लगने वाला बेणेश्वर मेला आदिवासियों का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है।
  • बेणेश्वर मेला 2026 का आयोजन 28 जनवरी से 1 फरवरी तक किया जाएगा।
  • सोम, माही और जाखम नदियों के संगम पर लाखों श्रद्धालु जुटते हैं।
  • आदिवासी समुदाय यहां दिवंगत परिजनों की अस्थियों का विसर्जन करता है।
  • भील जनजाति की आस्था, संस्कृति और परंपराओं की जीवंत झलक मेले में दिखाई देती है।

News In Detail

राजस्थान के डूंगरपुर में प्रसिद्ध बेणेश्वर मेले 2026 का आयोजन 28 जनवरी से 1 फरवरी तक किया जाएगा। इसे आदिवासियों के कुंभ के नाम से भी जाना जाता है। इस बार मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को बड़ी राहत देते हुए ग्राम पंचायत बिछवाड़ा ने वाहनों से टोल टैक्स नहीं लेने का निर्णय लिया है। इस बार आस्था और जन सुविधा को प्राथमिकता देते हुए यह फैसला लिया गया है। मेला क्षेत्र में पानी, बिजली और सफाई की व्यवस्था निःशुल्क रहेगी, हालांकि वाहनों के लिए निर्धारित पार्किंग शुल्क लागू होंगे।

बेणेश्वर मेला 2026 का महत्व

राजस्थान में आदिवासी आस्था और परंपरा का सबसे बड़ा पर्व बेणेश्वर मेला 2026 में फिर से आयोजित होने जा रहा है। इसे “आदिवासियों का कुंभ” कहा जाता है, जहां हजारों श्रद्धालु आस्था के साथ एकत्र होते हैं।

यह मेला सदियों पुरानी परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और जनजातीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। हर वर्ष यह मेला आदिवासी समाज के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।

कहां और कब लगेगा बेणेश्वर मेला

बेणेश्वर मेला राजस्थान के डूंगरपुर जिले में सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर आयोजित होता है।
वर्ष 2026 में यह मेला 28 जनवरी से 1 फरवरी तक चलेगा और माघ शुक्ल पूर्णिमा तक श्रद्धालुओं की भीड़ रहेगी।

इस मेले में राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा और सुविधाओं के विशेष इंतजाम किए जाते हैं।

बेणेश्वर मेला 2026 – एक नजर में

  • स्थान: डूंगरपुर, राजस्थान
  • तिथि: 28 जनवरी से 1 फरवरी 2026
  • मुख्य परंपरा: अस्थि विसर्जन
  • 3 नदियों का संगम: सोम, माही, जाखम

अस्थि विसर्जन की अनूठी परंपरा

बेणेश्वर मेले की सबसे खास परंपरा अस्थि विसर्जन है। आदिवासी समुदाय अपने दिवंगत पूर्वजों की अस्थियां पवित्र त्रिवेणी संगम में प्रवाहित करता है।

मान्यता है कि यहां अस्थि विसर्जन करने से मृत आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि यह मेला आदिवासी समाज के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।

बेणेश्वर नाम का अर्थ और धार्मिक मान्यता

बेणेश्वर नाम डूंगरपुर स्थित प्राचीन शिवलिंग से लिया गया है। स्थानीय वागड़ी भाषा में “बेणेश्वर” का अर्थ होता है “डेल्टा का स्वामी”। यह स्थान नदियों से बने डेल्टा पर स्थित है, जहां भगवान शिव और भगवान विष्णु (वामन अवतार) के मंदिर भी हैं। श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा के लिए बड़ी संख्या में आते हैं।

आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक

बेणेश्वर मेला भील जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। यहां लोक नृत्य, लोक संगीत और पारंपरिक वेशभूषा देखने को मिलती है। यह मेला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि आदिवासी विरासत को सहेजने का माध्यम भी है। देश का यह सबसे बड़ा आदिवासी मेला माना जाता है।

मेले की ऐतिहासिक कथा

मान्यता के अनुसार संत मावजी महाराज के शिष्यों अजे और वाजे ने सोम और माही नदियों के संगम पर लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण कराया था। माघ शुक्ल एकादशी को मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ इस मेले की शुरुआत हुई थी। तभी से हर वर्ष माघ शुक्ल एकादशी से यह मेला पांच दिनों तक आयोजित होता है। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जाती है।

बनेश्वर महादेव की विशेष पूजा

मेले के पहले दिन मठाधीश सबला से विशाल जुलूस के साथ मेले स्थल पर पहुंचते हैं। मावजी महाराज की 16 सेंटीमीटर की चांदी की प्रतिमा घोड़े पर सवार होकर लाई जाती है। मान्यता है कि मठाधीश के स्नान से नदी का जल पवित्र हो जाता है। इसी कारण श्रद्धालु उनके साथ सामूहिक स्नान करते हैं।

भील समाज की आस्था

बेणेश्वर मेला मुख्य रूप से भील जनजाति का पर्व है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर जिलों से सबसे अधिक श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यह मेला सामाजिक एकता, धार्मिक आस्था और परंपराओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

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