क्यों उखड़े रहते हैं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जानिए उनके सियासी मिजाज का पूरा ब्योरा
The Sootr | Mar 27, 2026, 13:45 IST
Photograph: (the sootr)
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत फिर चर्चा में हैं। इस बार वे अधिकारियों के खिलाफ अमर्यादित बोल से विपक्ष के निशाने पर हैं। जानिए उनके सियासी मिजाज पर पूरी स्टोरी।
योगेन्द्र योगी@जयपुर
राजस्थान की राजनीति में इन दिनों केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का एक वीडियो चर्चा में हैं। वे एक कार्यक्रम में अधिकारियों को हिदायत दे रहे हैं कि अगर किसी कार्यकर्ता के साथ बदतमीजी करोगे तो मैं उससे डबल बदतमीजी करूंगा। उसकी नौकरी और जिंदगी दोनों बर्बाद कर दूंगा। इसके लिए कागज लिखने की जरूरत नहीं, बस एक फोन ही काफी है। उनके इस तीखे तेवर ने न केवल विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया, बल्कि खुद की भजनलाल सरकार के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर दी।
शेखावत का फलोदी में एक जनसुनवाई का यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। विपक्ष ने इसे हाथों-हाथ लिया। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने पलटवार करते हुए पूछा कि क्या यह एक मंत्री की भाषा होनी चाहिए। उन्होंने इसे पूरे प्रशासनिक सिस्टम का अपमान बताया और सवाल किया कि क्या यह गुस्सा मुख्यमंत्री न बन पाने की हताशा का नतीजा है।
दरअसल, केंद्र में पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे शेखावत का विवादित बयानों से पुराना नाता रहा है। शेखावत ने पिछली सर्दी में जोधपुर ग्रामीण के एसपी बने आईपीएस अधिकारी नारायण टोगस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनके खिलाफ 13 सितंबर 2025 को सीएम को लिखी चिट्ठी खूब वायरल हुई थी, जिसमें शेखावत ने टोगस की यह कहकर शिकायत की कि जब से आए हैं, तब वे उनसे मिलने नहीं आए।
केंद्रीय मंत्री का यह भी कहना था कि टोगस को कानून व्यवस्था और प्रोटोकॉल से जुड़ी बैठकों के लिए कई बार बुलाया गया है, लेकिन ना तो वह बैठकों में शामिल हुए और ना ही उनसे मिलने घर आए। उन्होंने एसपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश भी की। हालांकि, इस मामले में आईपीएस नारायण टोगस का कुछ नहीं बिगड़ा। वे लगातार काम करते रहे।
सितंबर 2024 में लोहावट के ही एक अन्य कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री शेखावत ने अधिकारियों को 'पेरासिटामोल' देने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था कि डबल इंजन की सरकार होने के बावजूद अगर कोई तहसीलदार भाजपा कार्यकर्ता की उपेक्षा करता है, तो उसका बुखार उतारना जरूरी है।
शेखावत और राजस्थान की पिछली गहलोत सरकार के बीच की जंग जगजाहिर है। जुलाई 2020 के सियासी संकट के दौरान फोन टैपिंग का मामला सामने आया था। शेखावत ने एक साक्षात्कार में दहाड़ते हुए कहा था कि जो लोग फोन टैपिंग के पीछे हैं, वे दुआ करें कि मेरा वक्त न आए। अगर आया तो पांच आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को जेल जाना पड़ेगा।
इस बयान पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कड़ी आपत्ति जताई थी। गहलोत ने इसे शेखावत की बौखलाहट करार दिया था। हालांकि, जुलाई 2024 में भजनलाल सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए शेखावत के खिलाफ चल रहे फोन टैपिंग केस को वापस लेने का आवेदन किया। सरकार का तर्क था कि इस मामले में कोई मेरिट नहीं है। यह शेखावत के लिए एक बड़ी कानूनी राहत तो थी, लेकिन नैतिक रूप से विवाद थमा नहीं।
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सितंबर 2023 में कांग्रेस शासन के समय बीकानेर की एक सभा में शेखावत का गुस्सा सातवें आसमान पर था। राजस्थान में बढ़ते अपराधों और तत्कालीन मंत्री शांति धारीवाल के 'मर्दों का प्रदेश' वाले बयान पर शेखावत ने कहा कि ऐसे लोगों को उठाकर अरब सागर में फेंक देना चाहिए। हालांकि धारीवाल का बयान निंदनीय था, लेकिन एक केंद्रीय मंत्री द्वारा उन्हें समुद्र में फेंकने की बात कहना राजनीति के गिरते स्तर की ओर इशारा कर रहा था।
पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) राजस्थान का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। जून 2023 में सवाई माधोपुर का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें शेखावत स्थानीय नेताओं से कह रहे थे-राजेंद्र राठौड़ का राज लाओ और 46 हजार करोड़ ले जाओ।कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केंद्र सरकार राजस्थान की प्यासी जनता के साथ राजनीति कर रही है।
राजस्थान भाजपा में दो शक्ति केंद्र हमेशा चर्चा में रहे। एक पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और दूसरे गजेंद्र सिंह शेखावत। यह जगजाहिर है कि शेखावत को केंद्रीय नेतृत्व का करीबी माना जाता है। 2023 के विधानसभा चुनाव में शेखावत को सीएम फेस के तौर पर देखा जा रहा था। चर्चा थी कि शेखावत ने राजे के नाम का विरोध किया। यही कारण है कि राजे समर्थक आज भी शेखावत को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन मानते हैं।
उनके बीच की कड़वाहट होली मिलन जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी छलक आती है। शेखावत ने खुद स्वीकार किया था कि 2013-18 के बीच मैडम (वसुंधरा राजे) के साथ उनके रिश्ते ठीक नहीं थे, जिसकी वजह से विकास कार्य प्रभावित हुए।
जोधपुर की राजनीति में शेखावत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनों से ही मिली। शेरगढ़ विधायक बाबू सिंह राठौड़ ने शेखावत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। राठौड़ का आरोप था कि शेखावत केवल बातें करते हैं, काम नहीं। चर्चा तो यहां तक थी कि शेखावत की वजह से ही वरिष्ठ होने के बावजूद बाबू सिंह को भजनलाल मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।
लोकसभा चुनाव के दौरान शेखावत का जोधपुर में भारी विरोध हुआ, पोस्टर फाड़े गए और काले झंडे दिखाए गए। अंततः मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को दोनों के बीच मध्यस्थता करानी पड़ी और जयपुर में राजीनामा हुआ।
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राजस्थान की राजनीति में इन दिनों केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का एक वीडियो चर्चा में हैं। वे एक कार्यक्रम में अधिकारियों को हिदायत दे रहे हैं कि अगर किसी कार्यकर्ता के साथ बदतमीजी करोगे तो मैं उससे डबल बदतमीजी करूंगा। उसकी नौकरी और जिंदगी दोनों बर्बाद कर दूंगा। इसके लिए कागज लिखने की जरूरत नहीं, बस एक फोन ही काफी है। उनके इस तीखे तेवर ने न केवल विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया, बल्कि खुद की भजनलाल सरकार के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर दी।
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केंद्रीय मंत्री का यह भी कहना था कि टोगस को कानून व्यवस्था और प्रोटोकॉल से जुड़ी बैठकों के लिए कई बार बुलाया गया है, लेकिन ना तो वह बैठकों में शामिल हुए और ना ही उनसे मिलने घर आए। उन्होंने एसपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश भी की। हालांकि, इस मामले में आईपीएस नारायण टोगस का कुछ नहीं बिगड़ा। वे लगातार काम करते रहे।
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इस बयान पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कड़ी आपत्ति जताई थी। गहलोत ने इसे शेखावत की बौखलाहट करार दिया था। हालांकि, जुलाई 2024 में भजनलाल सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए शेखावत के खिलाफ चल रहे फोन टैपिंग केस को वापस लेने का आवेदन किया। सरकार का तर्क था कि इस मामले में कोई मेरिट नहीं है। यह शेखावत के लिए एक बड़ी कानूनी राहत तो थी, लेकिन नैतिक रूप से विवाद थमा नहीं।
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उनके बीच की कड़वाहट होली मिलन जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी छलक आती है। शेखावत ने खुद स्वीकार किया था कि 2013-18 के बीच मैडम (वसुंधरा राजे) के साथ उनके रिश्ते ठीक नहीं थे, जिसकी वजह से विकास कार्य प्रभावित हुए।
शेखावत को राठौड़ से चुनौती
लोकसभा चुनाव के दौरान शेखावत का जोधपुर में भारी विरोध हुआ, पोस्टर फाड़े गए और काले झंडे दिखाए गए। अंततः मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को दोनों के बीच मध्यस्थता करानी पड़ी और जयपुर में राजीनामा हुआ।
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