भरतपुर नगर निगम में फर्जी पट्टों का खेल! 15 निरस्त, 25 को नोटिस; जेईएन पर भी कार्रवाई
Ashish Bhardwaj | Nov 04, 2026, 18:07 IST
भरतपुर में फर्जी पट्टें हुए जारी
भरतपुर नगर निगम में पट्टा वितरण के नाम पर बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। जांच में तीन दर्जन से ज्यादा पट्टे संदिग्ध पाए गए हैं। इनमें से 15 पट्टों को फर्जी तरीके से जारी होना मानते हुए निरस्त कर दिया गया है। 25 अन्य पट्टा धारकों को नोटिस देकर दस्तावेज मांगे गए हैं। अगर वे वैध दस्तावेज पेश नहीं कर पाए तो उनके पट्टे भी निरस्त किए जा सकते हैं।
भरतपुर निगम प्रशासन ने सत्यापन करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई शुरू कर दी है। पट्टा जारी करने से पहले मौके पर जांच करने वाले एक कनिष्ठ अभियंता (जेईएन) को चार्जशीट दी गई है। दूसरे जेईएन को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। इस कार्रवाई के बाद पट्टा वितरण की पूरी प्रक्रिया और इसमें शामिल कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं।
राज्य सरकार ने आम लोगों को राहत देने के लिए नगर निगम स्तर पर पट्टा वितरण शिविर लगाए थे। इन शिविरों में जारी पट्टों की जांच के दौरान दस्तावेजों में गड़बड़ी के मामले सामने आए। आरोप है कि कुछ लोगों ने दस्तावेजों में हेरफेर कर एक ही पते पर पिता और पुत्र के नाम से अलग-अलग पट्टे जारी करवा लिए।
जांच में ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें खाली भूखंडों के नाम पर पट्टे जारी कर दिए गए। मौके पर भौतिक सत्यापन के दौरान संबंधित जगहों पर केवल खाली प्लॉट मिले। इसके बावजूद पट्टा जारी होने से सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठे। शिकायतें नगर निगम आयुक्त तक पहुंचीं तो जांच कराई गई। इसके बाद अनियमित तरीके से जारी पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई शुरू हुई।
पट्टा जारी करने से पहले मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है। इस मामले में दो जेईएन की भूमिका जांच के दायरे में आई है। निगम प्रशासन ने दोनों से जवाब मांगा था। अब एक जेईएन को चार्जशीट जारी कर दी गई है, जबकि दूसरे को कारण बताओ नोटिस दिया गया है।
सवाल यह है कि अगर मौके पर सही तरीके से जांच हुई होती तो खाली भूखंडों के नाम पर पट्टे कैसे जारी हो गए? दस्तावेजों में गड़बड़ी के बावजूद फाइलें किस स्तर पर मंजूर हुईं? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
इस पूरे मामले में पट्टा जारी कराने वाले कथित दलालों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि निगम में लंबे समय से एक ऐसा नेटवर्क सक्रिय है, जो अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से पट्टों की फाइलें आगे बढ़वाता है। हालांकि, इस कथित नेटवर्क और उसकी भूमिका की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
मामले में केवल मौके पर सत्यापन करने वाले जेईएन तक जांच सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। पट्टे की फाइल तैयार करने, दस्तावेज जांचने, रिपोर्ट लगाने और अंतिम मंजूरी देने वाले हर स्तर की भूमिका की पड़ताल जरूरी है। अगर किसी दलाल या कर्मचारी की मिलीभगत सामने आती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
भरतपुर नगर निगम में फर्जी पट्टों का विवाद नया नहीं है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे। उस समय फर्जी पट्टे जारी कराने के आरोप में एक संविदा कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था। दो कर्मचारियों को निलंबित किया गया था। मथुरा गेट थाना पुलिस ने फर्जी पट्टा बनवाने वाले एक व्यक्ति और संविदा कर्मचारी को गिरफ्तार भी किया था। उस प्रकरण में 13 से अधिक एफआईआर दर्ज कराए जाने की बात सामने आई थी।
हालांकि, उस समय की जांच में अधिकारियों को क्लीन चिट दिए जाने का भी जिक्र हुआ था। अब नए मामले में एक बार फिर पट्टा जारी करने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।
फिलहाल 15 पट्टे निरस्त किए जा चुके हैं और 25 पट्टा धारकों से दस्तावेज मांगे गए हैं। आगे की कार्रवाई उनके जवाब और दस्तावेजों की जांच पर निर्भर करेगी। साथ ही, जेईएन के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फर्जी पट्टे जारी होने में क्या केवल सत्यापन की लापरवाही थी या पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर गड़बड़ी हुई? इसका जवाब तभी मिलेगा, जब निगम प्रशासन दस्तावेजों से लेकर अंतिम मंजूरी तक पूरी कड़ी की निष्पक्ष जांच करेगा।
पिता-पुत्र के नाम पर एक ही पते से पट्टे
जांच में ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें खाली भूखंडों के नाम पर पट्टे जारी कर दिए गए। मौके पर भौतिक सत्यापन के दौरान संबंधित जगहों पर केवल खाली प्लॉट मिले। इसके बावजूद पट्टा जारी होने से सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठे। शिकायतें नगर निगम आयुक्त तक पहुंचीं तो जांच कराई गई। इसके बाद अनियमित तरीके से जारी पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई शुरू हुई।
जेईएन पर कार्रवाही , दूसरे से मांगा जवाब
सवाल यह है कि अगर मौके पर सही तरीके से जांच हुई होती तो खाली भूखंडों के नाम पर पट्टे कैसे जारी हो गए? दस्तावेजों में गड़बड़ी के बावजूद फाइलें किस स्तर पर मंजूर हुईं? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
दलालों की भूमिका की भी जांच जरूरी
मामले में केवल मौके पर सत्यापन करने वाले जेईएन तक जांच सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। पट्टे की फाइल तैयार करने, दस्तावेज जांचने, रिपोर्ट लगाने और अंतिम मंजूरी देने वाले हर स्तर की भूमिका की पड़ताल जरूरी है। अगर किसी दलाल या कर्मचारी की मिलीभगत सामने आती है तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
पहले भी सामने आ चुका है फर्जी पट्टा मामला
हालांकि, उस समय की जांच में अधिकारियों को क्लीन चिट दिए जाने का भी जिक्र हुआ था। अब नए मामले में एक बार फिर पट्टा जारी करने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।
जांच का दायरा बढ़ेगा या कार्रवाई यहीं रुकेगी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फर्जी पट्टे जारी होने में क्या केवल सत्यापन की लापरवाही थी या पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर गड़बड़ी हुई? इसका जवाब तभी मिलेगा, जब निगम प्रशासन दस्तावेजों से लेकर अंतिम मंजूरी तक पूरी कड़ी की निष्पक्ष जांच करेगा।
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