जमीन पर कब्जे करने से नहीं मिलता कानूनी अधिकार, BSP की जमीन पर सालों से दुकान चलाने वालों की सभी याचिकाएं खारिज
Harrison Masih | Nov 04, 2026, 17:14 IST
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, BSP जमीन से जुड़ी 9 याचिकाएं खारिज
किसी सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर सालों तक कब्जा करके दुकान चलाने से उस जमीन पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता। भले ही वहां पक्का निर्माण करा लिया गया हो। बिजली बिल, किराया और दूसरे शुल्क भी नियमित रूप से जमा किए जा रहे हों, तब भी कब्जे को कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह अहम टिप्पणी की है।
हाईकोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद ने भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की जमीन से जुड़े मामले में यह बात कही। कोर्ट ने लंबे समय से इन जमीनों पर दुकान और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलाने वाले लोगों को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने ऐसी 9 याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में दुकानदारों और कारोबारियों ने बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने साफ कहा कि जमीन के मूल आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करके किसी दूसरे व्यक्ति को कब्जा देने से उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता। केवल लंबे समय तक कारोबार करने से भी जमीन पर हक नहीं बनता।
यह पूरा मामला भिलाई स्टील प्लांट की जमीन से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, BSP ने साल 1976 में खुर्सीपार इलाके में कारोबार करने के लिए कुछ भूखंड आवंटित किए थे। इन भूखंडों को कारोबारियों को तय शर्तों के आधार पर दिया गया था।
बाद में इन भूखंडों के मूल आवंटियों ने दूसरे लोगों को वहां कब्जा दे दिया। इसके बाद उन जगहों पर दुकानें और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुल गए। धीरे-धीरे वहां कारोबार शुरू हो गया। कई लोग लंबे समय से इन परिसरों में दुकानें चला रहे थे।
हालांकि, BSP ने इस तरह कब्जा लेने को नियमों के खिलाफ माना। प्लांट प्रबंधन का कहना था कि जमीन का इस्तेमाल मूल आवंटन की शर्तों के अनुसार ही किया जा सकता है।
BSP ने इन परिसरों में हुए कब्जे को अवैध माना। इसके बाद सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई शुरू की गई। इस कानून के माध्यम से अनधिकृत कब्जा करने वालों को परिसर से हटाने की प्रक्रिया अपनाई गई।
इस कार्रवाई के खिलाफ दुकानदारों और कारोबारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि वे कई सालों से इन परिसरों में कारोबार कर रहे हैं। वे नियमित रूप से किराया, लाइसेंस फीस, बिजली बिल और संपत्ति कर भी जमा करते रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जब वे लंबे समय से इन जगहों पर कारोबार कर रहे हैं और सभी जरूरी शुल्क जमा कर रहे हैं, तो अब उन्हें वहां से हटाना उचित नहीं है। उन्होंने पुराने बेदखली आदेशों को इतने समय बाद लागू किए जाने पर भी सवाल उठाए।
दूसरी ओर, BSP ने दुकानदारों की दलीलों का विरोध किया। प्लांट प्रबंधन ने कोर्ट को बताया कि साल 1976 में जब भूखंड आवंटित किए गए थे, तब कुछ शर्तें भी तय की गई थीं।
इन शर्तों के मुताबिक, मूल आवंटी किसी दूसरे व्यक्ति को भूखंड का कब्जा नहीं दे सकता था। इसके अलावा जमीन को किराए पर देने और साझेदारी में कारोबार करने पर भी रोक थी।
BSP का कहना था कि मूल आवंटियों ने इन शर्तों का पालन नहीं किया। उन्होंने दूसरे लोगों को जमीन पर कब्जा दे दिया। ऐसे में बाद में कब्जा लेने वाले लोगों को किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने BSP की दलीलों को स्वीकार किया। जस्टिस एके प्रसाद ने कहा कि सार्वजनिक जमीन पर नियमों के खिलाफ कब्जा करने से किसी को कानूनी अधिकार नहीं मिलता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति भले ही उस जमीन पर पक्का निर्माण करा ले। वहां कई सालों से कारोबार करता रहे। बिजली बिल, किराया और दूसरे शुल्क भी जमा करता रहे। इसके बावजूद उसे जमीन पर कानूनी हक नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने माना कि मूल आवंटन की शर्तों के खिलाफ जमीन का कब्जा दूसरे व्यक्ति को देने से उसे कोई कानूनी अधिकार हासिल नहीं होता। इसी आधार पर कोर्ट ने दुकानदारों और व्यावसायिक संस्थानों की 9 याचिकाएं खारिज कर दीं।
इसी विवाद से जुड़ा एक और मामला हाईकोर्ट के सामने आया था। इसमें एक कारोबारी ने BSP के अधिकारी के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी।
कारोबारी का आरोप था कि हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल 2022 को परिसर की स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद 19 अप्रैल को उसे परिसर से बाहर कर दिया गया। उसने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताते हुए अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश की जानबूझकर अनदेखी किए जाने की बात साबित नहीं हुई। अवमानना के लिए आदेश का जानबूझकर उल्लंघन साबित होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
इसी वजह से कोर्ट ने अवमानना याचिका भी खारिज कर दी। इस तरह BSP की जमीन पर कब्जे और कारोबार से जुड़े 9 मामलों में याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि सार्वजनिक जमीन पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना अपने आप में कानूनी अधिकार का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद ने भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की जमीन से जुड़े मामले में यह बात कही। कोर्ट ने लंबे समय से इन जमीनों पर दुकान और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलाने वाले लोगों को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने ऐसी 9 याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में दुकानदारों और कारोबारियों ने बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने साफ कहा कि जमीन के मूल आवंटन की शर्तों का उल्लंघन करके किसी दूसरे व्यक्ति को कब्जा देने से उसे कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता। केवल लंबे समय तक कारोबार करने से भी जमीन पर हक नहीं बनता।
क्या है पूरा मामला?
बाद में इन भूखंडों के मूल आवंटियों ने दूसरे लोगों को वहां कब्जा दे दिया। इसके बाद उन जगहों पर दुकानें और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान खुल गए। धीरे-धीरे वहां कारोबार शुरू हो गया। कई लोग लंबे समय से इन परिसरों में दुकानें चला रहे थे।
हालांकि, BSP ने इस तरह कब्जा लेने को नियमों के खिलाफ माना। प्लांट प्रबंधन का कहना था कि जमीन का इस्तेमाल मूल आवंटन की शर्तों के अनुसार ही किया जा सकता है।
BSP ने शुरू की बेदखली की कार्रवाई
इस कार्रवाई के खिलाफ दुकानदारों और कारोबारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि वे कई सालों से इन परिसरों में कारोबार कर रहे हैं। वे नियमित रूप से किराया, लाइसेंस फीस, बिजली बिल और संपत्ति कर भी जमा करते रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जब वे लंबे समय से इन जगहों पर कारोबार कर रहे हैं और सभी जरूरी शुल्क जमा कर रहे हैं, तो अब उन्हें वहां से हटाना उचित नहीं है। उन्होंने पुराने बेदखली आदेशों को इतने समय बाद लागू किए जाने पर भी सवाल उठाए।
आवंटन की शर्तों में दूसरे को कब्जा देने पर थी रोक
इन शर्तों के मुताबिक, मूल आवंटी किसी दूसरे व्यक्ति को भूखंड का कब्जा नहीं दे सकता था। इसके अलावा जमीन को किराए पर देने और साझेदारी में कारोबार करने पर भी रोक थी।
BSP का कहना था कि मूल आवंटियों ने इन शर्तों का पालन नहीं किया। उन्होंने दूसरे लोगों को जमीन पर कब्जा दे दिया। ऐसे में बाद में कब्जा लेने वाले लोगों को किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज कीं 9 याचिकाएं?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति भले ही उस जमीन पर पक्का निर्माण करा ले। वहां कई सालों से कारोबार करता रहे। बिजली बिल, किराया और दूसरे शुल्क भी जमा करता रहे। इसके बावजूद उसे जमीन पर कानूनी हक नहीं मिल जाता।
हाईकोर्ट ने माना कि मूल आवंटन की शर्तों के खिलाफ जमीन का कब्जा दूसरे व्यक्ति को देने से उसे कोई कानूनी अधिकार हासिल नहीं होता। इसी आधार पर कोर्ट ने दुकानदारों और व्यावसायिक संस्थानों की 9 याचिकाएं खारिज कर दीं।
अवमानना याचिका भी खारिज
कारोबारी का आरोप था कि हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल 2022 को परिसर की स्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद 19 अप्रैल को उसे परिसर से बाहर कर दिया गया। उसने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताते हुए अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
इस मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश की जानबूझकर अनदेखी किए जाने की बात साबित नहीं हुई। अवमानना के लिए आदेश का जानबूझकर उल्लंघन साबित होना जरूरी है। इस मामले में ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया।
इसी वजह से कोर्ट ने अवमानना याचिका भी खारिज कर दी। इस तरह BSP की जमीन पर कब्जे और कारोबार से जुड़े 9 मामलों में याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि सार्वजनिक जमीन पर लंबे समय तक कब्जा बनाए रखना अपने आप में कानूनी अधिकार का आधार नहीं बन सकता।
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