फसल बीमा योजना की खुली पोल, 300 में से 227 किसानों को नुकसान के हिसाब से नहीं मिला क्लेम
Mukesh Sharma | Nov 04, 2026, 17:32 IST
किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का नहीं मिल रहा लाभ
किसानों को फसल खराब होने पर आर्थिक सुरक्षा देने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सवालों के घेरे में है। राजस्थान सरकार के मूल्यांकन विभाग की एक रिपोर्ट में योजना से जुड़ी कई कमियां सामने आई हैं। फसल नुकसान का सही आकलन नहीं होना, क्लेम की रकम कम मिलना, भुगतान में देरी और बीमा कंपनियों की कमजोर निगरानी जैसी समस्याएं योजना को प्रभावित कर रही हैं।
इस रिपोर्ट में सबसे अहम यह है कि सर्वे में शामिल 300 लाभार्थी किसानों में से 227 ने कहा कि उन्हें फसल नुकसान के अनुपात में उचित क्लेम नहीं मिला। यानी करीब 75.67 फीसदी किसान भुगतान से संतुष्ट नहीं थे। केवल 73 किसानों ने माना कि उन्हें नुकसान के हिसाब से क्लेम मिला। वहीं, 198 किसानों ने फसल नुकसान की शिकायत दर्ज कराने की बात कही।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 से 2024 के दौरान राजस्थान में 1 करोड़ 60 लाख 62 हजार 740 किसानों ने फसल बीमा कराया। इनमें से 47 लाख 97 हजार 45 किसानों को क्लेम मिला। यह कुल बीमित किसानों का करीब 29.86 फीसदी है।
अध्ययन में शामिल 10 जिलों में 47 लाख 56 हजार 571 किसानों ने बीमा कराया था। इनमें से 18 लाख 90 हजार 181 किसानों को क्लेम मिला। यह संख्या करीब 39.74 फीसदी है।
हालांकि, क्लेम पाने वाले किसानों की संख्या को ही योजना की सफलता या विफलता का पैमाना नहीं माना जा सकता। हर बीमित किसान को क्लेम मिलना जरूरी नहीं है। भुगतान फसल नुकसान, बीमा की शर्तों और तय मानकों के आधार पर होता है। रिपोर्ट की चिंता मुख्य रूप से उन किसानों को लेकर है, जिन्होंने वास्तविक नुकसान के मुकाबले कम भुगतान मिलने की शिकायत की।
मूल्यांकन के लिए चूरू, बाड़मेर, हनुमानगढ़, जोधपुर, सीकर, दौसा, सिरोही, राजसमंद, करौली और धौलपुर को चुना गया। हर जिले से 30 लाभार्थी किसानों को शामिल किया गया। इस तरह कुल 300 किसानों से जानकारी ली गई। इसके अलावा 100 सरकारी और गैर-सरकारी उत्तरदाताओं से भी योजना के क्रियान्वयन पर राय जुटाई गई।
रिपोर्ट में फसल कटाई प्रयोग यानी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट की प्रक्रिया, सिंचित और असिंचित जमीन के लिए उपज के मानक, शिकायत निवारण और निगरानी व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई गई है।
समय पर हो नुकसान का सर्वे: किसान की शिकायत मिलने के बाद तय समय में फसल नुकसान का आकलन किया जाए। पात्र किसानों को बिना देरी भुगतान मिले। देरी होने पर बीमा कंपनियों पर जुर्माने का प्रावधान हो।
क्रॉप कटिंग में पारदर्शिता: फसल कटाई प्रयोग समय पर हों। नमूनों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती की जाए। आंकड़ों की जांच और बीमा कंपनियों के कर्मचारियों की भूमिका पर निगरानी बढ़े।
सिंचित-असिंचित जमीन के अलग मानक: दोनों तरह की जमीन के लिए अलग-अलग गारंटीकृत उपज तय की जाए। इससे एक जैसे मानकों के कारण किसानों को नुकसान उठाने की स्थिति कम होगी।
खड़ी फसल का नुकसान भी आंके: अत्यधिक बारिश, तूफान और जलभराव से खड़ी फसल की मात्रा या गुणवत्ता खराब होने पर नुकसान का सही आकलन हो। पात्र किसानों को उचित क्लेम दिया जाए।
क्लेम खारिज करने का कारण बताएं: बीमा कंपनियां क्लेम खारिज करने की वजह किसान के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर भेजें। इसकी जानकारी कृषि विभाग को भी दी जाए। बीमित और लाभान्वित किसानों की सूची जिला कृषि कार्यालयों को मिले।
आकलन की कॉपी किसान को मिले: खेत में नुकसान का सर्वे करने के बाद तैयार प्रपत्र की एक प्रति किसान को दी जाए। इससे उसे पता चलेगा कि नुकसान किस आधार पर दर्ज किया गया है।
पोर्टल और शिकायत व्यवस्था सुधरे: नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल और मोबाइल ऐप को सुचारु रखा जाए। आवेदन में फसल, जमीन या अधिसूचित इकाई से जुड़ी गलतियां सुधारने का मौका मिले। टोल फ्री नंबर 14447 पर परेशानी होने पर दूसरे शिकायत माध्यम भी उपलब्ध कराए जाएं।
रिपोर्ट में बीमा कंपनियों के एजेंटों की खेतों में मौजूदगी और फसल की तस्वीरें लेने की प्रक्रिया पर भी निगरानी बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। किसानों की शिकायत है कि तस्वीरों और सर्वे के आधार पर नुकसान कम दिखने से क्लेम प्रभावित हो सकता है। रिपोर्ट में एजेंटों की भूमिका को फसल कटाई प्रयोग के समय तक सीमित रखने का सुझाव भी दिया गया है।
इसके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर पर निगरानी समितियों की नियमित बैठकें कराने, नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाने या उन्हें ब्लैकलिस्ट करने पर विचार करने की बात कही गई है। राजस्व विभाग को समय पर गिरदावरी कराने और कृषि विभाग को बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायतों की जांच का अधिकार देने की सिफारिश भी की गई है।
रिपोर्ट मानती है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और फसल नुकसान के आर्थिक जोखिम से बचाने में मददगार हो सकती है। लेकिन इसके लिए सर्वे निष्पक्ष होना चाहिए और पात्र किसान को वास्तविक नुकसान के अनुरूप भुगतान मिलना चाहिए।
योजना में पारदर्शिता, समय पर क्लेम और बीमा कंपनियों की जवाबदेही मजबूत करना जरूरी है। वरना बीमा कराने के बाद भी किसान को अपने नुकसान की भरपाई के लिए शिकायतों और दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
2022 से 2024 के आंकड़ों में क्या तस्वीर?
अध्ययन में शामिल 10 जिलों में 47 लाख 56 हजार 571 किसानों ने बीमा कराया था। इनमें से 18 लाख 90 हजार 181 किसानों को क्लेम मिला। यह संख्या करीब 39.74 फीसदी है।
हालांकि, क्लेम पाने वाले किसानों की संख्या को ही योजना की सफलता या विफलता का पैमाना नहीं माना जा सकता। हर बीमित किसान को क्लेम मिलना जरूरी नहीं है। भुगतान फसल नुकसान, बीमा की शर्तों और तय मानकों के आधार पर होता है। रिपोर्ट की चिंता मुख्य रूप से उन किसानों को लेकर है, जिन्होंने वास्तविक नुकसान के मुकाबले कम भुगतान मिलने की शिकायत की।
10 जिलों के किसानों से जुटाई जानकारी
रिपोर्ट में फसल कटाई प्रयोग यानी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट की प्रक्रिया, सिंचित और असिंचित जमीन के लिए उपज के मानक, शिकायत निवारण और निगरानी व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट में सुधार के लिए ये सुझाव
क्रॉप कटिंग में पारदर्शिता: फसल कटाई प्रयोग समय पर हों। नमूनों की संख्या के हिसाब से पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती की जाए। आंकड़ों की जांच और बीमा कंपनियों के कर्मचारियों की भूमिका पर निगरानी बढ़े।
सिंचित-असिंचित जमीन के अलग मानक: दोनों तरह की जमीन के लिए अलग-अलग गारंटीकृत उपज तय की जाए। इससे एक जैसे मानकों के कारण किसानों को नुकसान उठाने की स्थिति कम होगी।
खड़ी फसल का नुकसान भी आंके: अत्यधिक बारिश, तूफान और जलभराव से खड़ी फसल की मात्रा या गुणवत्ता खराब होने पर नुकसान का सही आकलन हो। पात्र किसानों को उचित क्लेम दिया जाए।
क्लेम खारिज करने का कारण बताएं: बीमा कंपनियां क्लेम खारिज करने की वजह किसान के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर भेजें। इसकी जानकारी कृषि विभाग को भी दी जाए। बीमित और लाभान्वित किसानों की सूची जिला कृषि कार्यालयों को मिले।
आकलन की कॉपी किसान को मिले: खेत में नुकसान का सर्वे करने के बाद तैयार प्रपत्र की एक प्रति किसान को दी जाए। इससे उसे पता चलेगा कि नुकसान किस आधार पर दर्ज किया गया है।
पोर्टल और शिकायत व्यवस्था सुधरे: नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल और मोबाइल ऐप को सुचारु रखा जाए। आवेदन में फसल, जमीन या अधिसूचित इकाई से जुड़ी गलतियां सुधारने का मौका मिले। टोल फ्री नंबर 14447 पर परेशानी होने पर दूसरे शिकायत माध्यम भी उपलब्ध कराए जाएं।
कंपनियों की जवाबदेही तय करने पर जोर
इसके अलावा जिला और ब्लॉक स्तर पर निगरानी समितियों की नियमित बैठकें कराने, नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माना लगाने या उन्हें ब्लैकलिस्ट करने पर विचार करने की बात कही गई है। राजस्व विभाग को समय पर गिरदावरी कराने और कृषि विभाग को बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायतों की जांच का अधिकार देने की सिफारिश भी की गई है।
योजना का मकसद तभी पूरा होगा जब क्लेम सही मिले
योजना में पारदर्शिता, समय पर क्लेम और बीमा कंपनियों की जवाबदेही मजबूत करना जरूरी है। वरना बीमा कराने के बाद भी किसान को अपने नुकसान की भरपाई के लिए शिकायतों और दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
FAQs
- राजस्थान में किसानों को
फसल बीमा क्लेम में कितने प्रतिशत संतोष नहीं था?
राजस्थान में किए गए सर्वे के अनुसार, 75.67 प्रतिशत किसान फसल नुकसान के अनुपात में उचित क्लेम न मिलने से संतुष्ट नहीं थे। - वर्ष 2022 से 2024 के दौरान राजस्थान में कितने किसानों ने फसल बीमा कराया?
वर्ष 2022 से 2024 के दौरान राजस्थान में 1 करोड़ 60 लाख 62 हजार 740 किसानों ने फसल बीमा कराया था। - राजस्थान में किसानों की शिकायतों के निवारण के लिए रिपोर्ट में क्या सुझाव दिए गए हैं?
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि किसानों की शिकायत पर समय पर फसल नुकसान का आकलन किया जाए, पात्र किसानों को बिना देरी भुगतान मिले, और बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायतों की निगरानी की जाए।
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