'नाथी का बाड़ा' कांग्रेस के लिए दाग या फिर सियासी स्टंट, अब हरीश चौधरी ने शुरू की नए सिरे से ब्रांडिंग

Mukesh Sharma | Feb 07, 2026, 16:29 IST
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harish nathi
Photograph: (the sootr)

राजस्थान की राजनीति में जिस शब्द को एक-दूसरे को नीचा दिखाने या तंज कसने के लिए इस्तेमाल होता था, अब उसी शब्द की 'ब्रांडिंग' नए सिरे से की जा रही है। हम बात कर रहे हैं- 'नाथी का बाड़ा' की।

News in Short

  • राजस्थान की सियासत में 'नाथी का बाड़ा' की नए सिरे से ब्रांडिंग की कवायद
  • कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश चौधरी ने सोशल मीडिया पर उठाया बीड़ा
  • चौधरी का तर्क-परोपकार व समर्पण का प्रतीक है नाथी का बाड़ा, मजाक ना बनाएं
  • नाथी का बाड़ा जोधपुर का स्थान था, जहां कोई भी बेरोकटोक ठहर सकता था
  • नाथी का बाड़ा शब्द को लेकर पहले से कांग्रेस आ चुकी है कटघरे में

News in Detail

​राजस्थान में कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व राजस्व मंत्री हरीश चौधरी ने 'नाथी का बाड़ा' शब्द को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर न केवल इसकी तारीफ की है, बल्कि इसे 'सकारात्मक' नजरिए से देखने की वकालत भी की है। नाथी का बाड़ा शब्द कुछ वर्षों से कांग्रेस के लिए गले की फांस बना हुआ था।

​क्या है ऐतिहासिक संदर्भ में 'नाथी का बाड़ा'

आम तौर पर राजस्थानी कहावतों में 'नाथी का बाड़ा' का अर्थ ऐसी जगह से लिया जाता है, जहां किसी के आने-जाने पर कोई रोक-टोक ना हो । जहाँ कोई भी कभी भी बिना अनुमति के आ-जा सके या जहां अव्यवस्था हो। लेकिन इसका एक गौरवशाली इतिहास भी है, जिसे हरीश चौधरी ने अब जनता के सामने रखा है।

परोपकारी काम है...

नाथी बाई मारवाड़ की एक अत्यंत उदार और दानवीर महिला थीं। उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी। उनकी ​जोधपुर में त्रिपोलिया के पास एक जमीन थी। वहां बाड़ा बना हुआ था, जिसमें दूर-दराज से सब्जी, घी या अन्य कोई चीज बेचने के लिए बाहर से आना वाला व्यक्ति बेरोक-टोक ठहर सकता था। यह बाड़ा मारवाड़ में सराय के रूप् में काफी लोकप्रिय हो गया। बाद में इसका इस्तेमाल कहावत के रूप में होने लगा।

राजनीति में कैसे बना 'चुनावी हथियार'?

​पिछले कुछ बरसों में राजस्थान की राजनीति में यह शब्द एक 'तंज' या 'व्यंग्य' के रूप में उभरा। इसकी शुरुआत तब हुई,जब कांग्रेस शासन में तत्कालीन मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा के आवास पर कुछ लोग बिना अपॉइंटमेंट के ज्ञापन देने पहुंच गए। तब डोटासरा ने झुंझलाकर कहा था- इसे नाथी का बाड़ा समझ रखा है क्या ?
बस फिर क्या था,तब की विपक्ष भाजपा ने इस बयान को लपक लिया। चुनावी रैलियों से लेकर विधानसभा के सत्रों तक भाजपा नेताओं ने इस कहावत के साथ कांग्रेस सरकार पर खूब निशाना साधा। इस दौरान कहा गया कि इन्होंने तो पूरे प्रदेश को ही 'नाथी का बाड़ा' बना दिया है। जहाँ कानून का राज नहीं बल्कि अव्यवस्था है। देखते ही देखते यह शब्द 'अराजकता' का प्रतीक बन गया।

हरीश चौधरी का 'मास्टरस्ट्रोक': नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर..

​बाड़मेर में बायतू से विधायक हरीश चौधरी अक्सर लीक से हटकर राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने फेसबुक पर एक वीडियो साझा करते हुए अपनी पोस्ट में इस कहावत की व्याख्या को पूरी तरह बदलने की कोशिश की है।
उनका कहना है कि नाथी का बाड़ा शब्द राजस्थान के इतिहास में समर्पण व परोपकार का प्रतीक है। आज परोपकार व बिना किसी लालच के समर्पण की भावना से बनाये गए स्थान को “नाथी का बाड़ा” की संज्ञा दी जाती है। इस शब्द का सही अर्थ समझते हुए इसका उपयोग राजनैतिक कटाक्षों में नकारात्मक पक्ष में ना करके इसे सकारात्मक रूप में लिया जाए।

​क्यों अहम है यह बदलाव?

​राजस्थान में आगामी चुनावों और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए हरीश चौधरी का यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
​
क्षेत्रीय अस्मिता: नाथी बाई मारवाड़ से जुड़ी थीं। उनके अपमान को क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़कर चौधरी जाट बेल्ट और मारवाड़ में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
​
डैमेज कंट्रोल: डोटासरा के बयान के बाद जो नकारात्मक छवि बनी थी, उसे अब 'लोक कल्याण' के चश्मे से ढंकने की कोशिश की जा रही है।

​सोशल मीडिया नैरेटिव: आज के दौर में जो पक्ष सोशल मीडिया पर नैरेटिव सेट करता है, बाजी उसी के हाथ लगती है। चौधरी ने एक पुराने विवादित शब्द को 'पॉजिटिव ब्रांडिंग' में बदलकर भाजपा के वार को कुंद करने का प्रयास किया है।

क्या जनता इसे स्वीकार करेगी?

​राजनीति में शब्दों के मायने समय के साथ बदलते रहते हैं। जो शब्द कल तक 'अव्यवस्था' का पर्याय था, आज उसे 'उदारता' का तमगा पहनाने की कोशिश हो रही है। हरीश चौधरी की यह पोस्ट राजस्थान के सोशल मीडिया गलियारों में तेजी से वायरल हो रही है। लोग इस पर अपनी राय दे रहे हैं- कुछ इसे राजनीति का गिरता स्तर कह रहे हैं, तो कुछ इसे खोई हुई सांस्कृतिक विरासत का सम्मान मान रहे हैं।

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